आभार

बहुआयामी परिवर्तन का आज का यह रूप, तीन से चार दशकों के अनुभव का निचोड़ है। इन दशकों के दौरान, हजारों व्यक्तियों के ऊपर बहुआयामी परिवर्तन को आजमाया गया है। इन दशकों के दौरान, बहुआयामी परिवर्तन खुद भी अनेक बदलावों में से गुजरा है, और निरतर आगे बढ़ा है। इस विकास में उन हजारों व्यक्तियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिन्होने इसे बेझिझक अपनाया है। बहुआयामी परिवर्तन की नवजात अवस्था में यह योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय था, क्योंकि उस दौर में लोग नये और मुश्किल सवाल पूछ रहे थे, और मेरे पास बहुत सारे ऐसे सवालों के जवाब नहीं थे। जो लोग सवाल पूछ रहे थे, और उन सवालों के जवाब ढूंढने में मेरी मदद कर रहे थे, उनका आभार व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। यह योगदान अति विशिष्ट इसलिए भी बन जाता है, क्योंकि बहुआयामी परिवर्तन किसी वैज्ञानिक सिद्धांत की बैसाखी पर खड़ा होकर आगे नहीं बढ़ा है। यह परिवर्तन केवल अनुभव की मिट्टी में ही उपजा है, और अनुभवों के आधार पर ही आगे बढ़ा है। जाहिर है कि इस परिवर्तन को सीखने वाले व्यक्तियों के अनुभवों का उतना ही महत्व है, जितना कि सिखाने वाले व्यक्ति के अनुभवों का हो सकता है।

पिछले तीन-चार दशकों के दौरान ही, चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में अनेक खोजें हुई हैं। और इन खोजों ने कई बीमारियों के बारे में हमारी सोच को उलट-पलट दिया है। इन खोजों ने डिप्रैशन के उपचार में दवाइयों की उपयोगिता को नकारा है। इन खोजों ने हृदय रोग के उपचार में ऐंजियोप्लास्टी और बाईपास सर्जरी की उपयोगिता पर गम्भीर प्रश्नचिन्ह लगाए हैं। इन खोजों से जाहिर हुआ है कि कमरदर्द अधिकतर मामलों में सामाजिक और मानसिक कारणों से पैदा होता है, और सामाजिक और मानसिक कारणों से ही जारी रहता है—इसलिए कमरदर्द का उपचार भी अधिकतर मामलों में सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तरीकों से ही किया जाना चाहिए। इन खोजों ने कमरदर्द के अधिकतर मामलों में, एम आर आई और सीटी स्कैन जैसी जांचें न करने की जोरदार ढंग से वकालत की है। इन खोजों ने तनाव और बीमारियों के रिश्ते को बहुत मजबूत और गहरा बना दिया है। इन खोजों ने तम्बाकू और बीमारियौं के रिश्ते को भी और अधिक मजबूत बना दिया है। जिन डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने यह खोजें कीं, उन सभी शोधकर्ताओं का भी मैं आभारी हूँ—क्योंकि इन खोजों ने बहुआयामी परिवर्तन को एक मजबूत सैद्धांतिक और वैज्ञानिक आधार प्रदान किया है। और इन खोजों के कारण ही आज मैं यह कह सकता हूँ कि यह वैज्ञानिक आधार पर खड़ा बहुआयामी परिवर्तन आज के वक्त की जरूरत है—इसलिए यह जरूरी है कि हम बहुआयामी परिवर्तन को अपनाऐं, और इसे आगे ले जाने में अपना सम्पूर्ण योगदान करें।


अतुल अग्रवाल
नागपुर





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