जीवन में स्थिरता और शांति का व्यावहारिक महत्व

इस मार्गदर्शिका का लाभ उठाने के लिए, जीवन में शांति और स्थिरता का महत्व समझना जरूरी है। जीवन में हम अक्सर स्थिरता के साथ बदलाव (stability with change) की बात करते हैं, और सुनते हैं। यह बदलाव दो तरह का हो सकता है—एक वह जो हम अपनी मर्जी और अपने प्रयत्नों से लाते हैं। जिसके बारे में हम यह कह सकते हैं, यह परिवर्तन हमने लाया है, और जिससे हम खुश हैं। दूसरा वह जो हमारे जीवन में हो रहा है। जिसके बारे में हम नहीं जानते हैं कि क्यों हो रहा है? या कैसे हो रहा है? या ऐसा बदलाव जिसे हम नहीं चाहते, जो हमारी मर्जी के खिलाफ है।

माना हमें परिवर्तन की जरूरत है, परंतु क्या हमें स्थिरता की भी जरूरत है?

बहुआयामी परिवर्तन अपनाने जा रहे लोगों से दो सवाल पूछे गए। पहला—क्या हमें परिवर्तन की जरूरत है? और दूसरा—क्या हमें अपने जीवन में स्थिरता की जरूरत है? परिवर्तन की जरूरत सभी लोगों ने स्वीकार की, लेकिन स्थिरता की जरूरत स्वीकार करने वाले इक्का-दुक्का लोग ही थे।

कुछ दिनों के बाद, जब वे लोग बहुआयामी परिवर्तन के दूसरे चरण में पहुंचे, उनसे लगभग वही सवाल फिर पूछा गया। पहला—क्या हमें परिवर्तन की जरूरत थी? और दूसरा—क्या हमें अपने जीवन में स्थिरता की जरूरत थी? अबकी बार सबने स्थिरता की जरूरत स्वीकार की। इसके तुरंत बाद एक तीसरा सवाल पूछा गया—जीवन में मनचाहा परिवर्तन लाना हो, तो क्या स्थिरता जरूरी है? कुछ लोगों ने मुसकराकर अपनी सहमति जताई, तो कुछ ने जोरदार शब्दों में कहा—हाँ बिल्कुल जरूरी है। केवल कुछ दिन बीतने के बाद, इस बात से सभी पूरी तरह से सहमत थे, कि स्थिरता के बिना मनचाहा परिवर्तन संभव नहीं है।

हम स्थिरता के महत्व पर एक लेख लिख सकते हैं—और एक भाषण भी दे सकते हैं

हममें से बहुत सारे ऐसे लोग, जिन्हें नींद नहीं आती हैं और जो अनेक तनाव-जन्य बीमारियों से ग्रस्त हैं, या जो तंबाकू का भी प्रयोग करते हैं। वे शांति और स्थिरता के महत्व पर लेख लिखने के लिए, या भाषण देने के लिए तैयार हो जाएंगे। लेकिन वही लोग अपने जीवन में स्थिरता की जरूरत को नहीं स्वीकारेंगे। इसका कारण हो सकता है कि हम स्थिरता के व्यावहारिक महत्व से अपरिचित हैं।

बहुआयामी परिवर्तन और स्थिरता

बहुआयामी परिवर्तन के पहले चरण के उपरान्त अनुभव होने वाली स्थिरता का यह वीडियो क्लिप देखिए
The referenced media source is missing and needs to be re-embedded.

हम शायद सोच रहे होंगे, यह मार्गदर्शिका (बहुआयामी) परिवर्तन के बारे में है—फिर इसमें स्थिरता को इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है? अगर हमने इस मार्गदर्शिका को पढ़ लिया होगा, हमें लगेगा—यह पुस्तक स्थिरता के बारे में ही अधिक है। पहले चरण में स्थिरता की प्राप्ति है। दूसरे चरण में स्थिरता को आगे बढ़ाया गया है। केवल तीसरे चरण में स्थिरता का उपयोग परिवर्तन लाने के लिए कैसे करें—यह बताया है। दोहरा देता हूँ—हम इस मार्गदर्शिका को अपनाएंगे, तब समझ सकेंगे कि स्थिरता के बाद ही मनचाहा परिवर्तन संभव है।

शांति और स्थिरता की प्राप्ति

पहले चरण का समापन—इस अध्याय में पहले चरण के उपरांत अनुभव की जा सकने वाली स्थिरता का विवरण है|यह स्थिरता की दिशा में बढ़ाया गया बहुत बड़ा कदम है| हम छोटी-छोटी बातों से कम विचलित होते हैं| छोटी समस्याओं को बड़ा करके आंकना कम कर देते हैं| बड़ी परेशानियों से मुख मोड़ने के बदले उनके समाधान का प्रयत्न करने की बात मन में आने लगती है| जीवन शैली में सुधार की ओर कदम बढ़ाते हैं| तम्बाकू और नशे की आदतें छोड़ देते हैं| संबंधों में सुधार लाने का रास्ता भी हमें मिल जाता है| यह एक सप्ताह में आ जाने वाला परिवर्तन हैं|

☞ शांति और स्थिरता को फिर से पाना

ऐसा हो सकता है कि हम बहुआयामी परिवर्तन को अपनाएँ और इसका लाभ लेने के बाद इसे भूल जाएं, या इस परिवर्तन के बारे में सोचना बंद कर दें। कुछ महीने या साल बीतने के बाद, हमें फिर से शांति और स्थिरता पाने की जरूरत हो सकती है, और हम इस मार्गदर्शिका के पहले चरण में दिए गए मार्ग का अनुसरण करके फिर से वही शांति और स्थिरता पा सकते हैं।

शांति और स्थिरता को बढ़ाना

बहुआयामी परिवर्तन के दूसरे चरण में प्रवेश—स्थिरता का विस्तृत अर्थ: दूसरे चरण के इस अध्याय में हम स्थिरता का विस्तृत अर्थ समझते हैं, और दूसरे चरण के दौरान हम एक बड़ी स्थिरता पाने की कोशिश करते हैं|

शांति और स्थिरता एक गुण है, जो घट-बढ़ सकता है। शांति और स्थिरता को प्राप्त करने के बाद, इन गुणों को कैसे बढ़ाना या आगे ले जाना हैं? इसकी चर्चा दूसरे अध्याय में की गई है। दूसरे अध्याय में ही स्थिरता का विस्तृत अर्थ बताया गया है। इस विस्तृत स्थिरता में परिवार, समाज, और पर्यावरण की स्थिरता शामिल हो जाती है। और हम पूरे विश्व की स्थिरता के बारे में सोचने लगते हैं।

शांति और स्थिरता का उपयोग

शांति और स्थिरता का उपयोग—अपने उद्देश्यों को पा लेना: तीसरे चरण के इस अध्याय में हम स्थिरता के उपयोग की बात करते हैं, और तीसरे चरण के दौरान हम अपने उद्देश्यों को पाने की और एक और भी बड़ी स्थिरता पाने की कोशिश करते हैं|

क्या इस शांति और स्थिरता का कोई उपयोग हो सकता है? यह प्रश्न तीसरे चरण के शुरू में उठाया गया है। जहां यह बात सामने आती है कि शांति और स्थिरता का उपयोग विकास के लिए किया जा सकता है। लेकिन यह भी सामने आता है कि विकास भी शांति और स्थिरता पाने के लिए ही होता है। क्या शांति और स्थिरता ही हमारे जीवन का अंतिम लक्ष्य है?

स्थिरता को और अधिक गहराई से समझने की जरूरत है

इन दो रेखाओं की मदद से शांति और स्थिरता का महत्व समझिए

बहुआयामी परिवर्तन की शुरूआत में, स्थिरता का महत्व समझाने के लिए यह चित्र दिखाया जाता है। पहली लाइन (Line 1) में उतार-चढ़ाव है| यानी हमें कभी अच्छा लगता है और कभी खराब लगता है। मतलब स्थिरता नहीं है| कल्पना करें, यह हमारे जीवन की रेखा है। बिन्दु एच-1 पर हमें अच्छा लग रहा है, और हम कुछ करने का तय करते हैं। कुछ घंटों, दिनों, या हफ्तों के बाद हम बिन्दु एल-1 पर पहुँचते हैं—जहां हमें यह लगता है कि एच-1 पर हमें जो करना शुरू किया था, वह हमारे लिए संभव नहीं हैं। और हम उसे छोड़ देते हैं। इसी प्रकार हम एच-2 पर कुछ करने का तय करते हैं, उसे एल-2 पर छोड़ देते हैं। एच-3 पर जो तय करते हैं, उसे एल-3 पर छोड़ देते हैं। एच-4 पर जो तय करते हैं, उसे एल-4 पर छोड़ देते हैं। यह क्रम चलता रहता है, और हमारे अंदर का विश्वास कम होता जाता है। हम कहने लगते हैं, “मैं ज्यादा टैंशन नहीं लेता हूँ।” इसका मतलब होता है, हम बार-बार किसी काम को करने का प्रयत्न नहीं करते हैं। थोड़े प्रयत्न के बाद कोई काम नहीं हुआ तो उसे छोड़ देना ही हम ठीक समझने लगते हैं—पर वास्तविकता है, हमारा अपने में विश्वास कम होता है।

हम अस्थिरता का अर्थ कभी अच्छा लगना और कभी खराब लगना समझ सकते है, परंतु ऐसा नहीं है। अस्थिरता का अर्थ लगातार खराब लगना भी हो सकता है। और इस प्रकार की लगातार खराब लगने वाली अस्थिरता अधिक हानिकारक हो सकती है। इस प्रकार की लगातार बनी रहने वाली अस्थिरता के और भी उदाहरण दिये जा सकते हैं। हो सकता है, हम अपने जीवनसाथी को बेहद नापसंद करते हों, लेकिन उसके साथ जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर हों। हम किसी असाध्य बीमारी या अपंगता से पीड़ित हो सकते हैं। भाषा या धर्म के आधार पर भेदभाव का शिकार हो सकते हैं। और भी बहुत सारे उदाहरण दिये जा सकते हैं।

सुकेशी के जीवन में भी उतार-चढ़ाव था

सुकेशी बारहवीं में पढ़ती थी। वह गोरी और सुंदर थी और माता-पिता की अकेली संतान थी। उसके पिता का पैट्रोल-पंप था, और माँ कम पढ़ी लिखी लेकिन समझदार महिला थीं। घर में पैसे की कोई कमी नहीं थी, और माता-पिता सुकेशी की हर बात मानते थे—फिर भी सुकेशी खुश नहीं रहती थी। अपना कमरा अंदर से बंद कर घंटों बैठी रहती थी। माँ खटखटाती तो कह देती कि उसके सिर में दर्द है। माँ-पिता को दोष देती, “मेरा कोई भाई-बहन नहीं, इसलिए मैं अकेलापन महसूस करती हूँ।”

डॉक्टर ने बताया, सुकेशी को कोई बीमारी नहीं थी। उसे अपने आप को व्यस्त रखना चाहिए। घर के काम करे। किसी खेल-कूद में हिस्सा ले। दोस्तों के साथ कुछ समय बिताए। और जीवन में कोई लक्ष्य बनाए—उस हिसाब से पढ़ाई करे।

लेकिन सुकेशी को कोई काम अच्छा नहीं लगता था। वह सब करके देख चुकी थी। उसने कुछ दिन माँ के साथ शाम का खाना बनाया। एक दिन सुकेशी का मूड खाना बनाने का नहीं था, पर माँ ने आग्रह करके उसे रसोई में बुलाया। उस दिन सुकेशी के हाथ से सब्जी जल गई—सुकेशी माँ पर खूब गुस्सा हुई, और उसने किचन में घुसना बंद कर दिया। सुकेशी कार चलाना सीखने के लिए कुछ दिन गई। फिर उसने सिखाने वाले इंस्ट्रक्टर से झगड़ा कर लिया, और सीखना छोड़ दिया। वह कुछ दिन डांस क्लास भी जाकर देख चुकी थी। कुछ दिन उस पर क्रिकेट खेलने का भूत भी सवार हुआ था।

सुकेशी किसी के साथ दोस्ती निभा नहीं पाती थी। एक मुँहफट लड़की ने, एक दिन सबके सामने सुकेशी से कह दिया, “कोई तेरे साथ दोस्ती क्यों करेगा? किसी को भी तेरा विश्वास नहीं है। तू कहती कुछ है, और करती कुछ है।” सुकेशी घर आकर खूब रोई। वह बार-बार कह रही थी, “मेरा कोई साथ देने वाला नहीं है। मेरी तबीयत ठीक नहीं रहती है, फिर भी मेरी हालत नहीं समझते, और सभी मुझे ही दोष देते हैं।”

इसके बाद सुकेशी ने आत्महत्या करने की कोशिश की, और उसे बहुआयामी परिवर्तन के लिए लाया गया। पहले कुछ दिनों में ही, सुकेशी को अपने अंदर की कमी का अहसास हो गया। उसने बताया, उसके जीवन में उतार-चढ़ाव था। उसे कभी अच्छा लगता था कभी खराब। बहुआयामी परिवर्तन से उसके जीवन में स्थिरता आ गई, और उसकी समस्याएँ सुलझ गईं।

सुशीला उदास रहने लगी थी

सुशीला पचपन वर्ष की प्रौढ़ महिला थी। उसके पति अशोक की बिजली के सामान की दुकान थी। बच्चे अलग रहते थे। अशोक ग्यारह बजे दुकान चला जाता था, और रात को नौ बजे लौटता था| सुशीला घर में अकेली पड़ जाती थी। सारे दिन उसके पास कुछ भी काम नहीं रहता था| उसे उदास लगता था। कई बार रात को नींद नहीं आती थी। डॉक्टर ने डिप्रैशन की दवाई शुरू कर दी, लेकिन उससे कोई लाभ नहीं हुआ। सुशीला को पूजा-पाठ में विश्वास था। वह धार्मिक गुरुओं को घर में बुलाती, उन्हें भोजन कराती, दक्षिणा देती, और उनसे अपने मन की अशांति दूर करने का उपाय पूछती। उसके पति अशोक को इन सब बातों पर विश्वास नहीं था। तीर्थयात्रा के लिए, अशोक एक बार सुशीला को लेकर हरिद्वार गया था। पर जब वाराणसी जाने की बात हुई तो अशोक ने मना कर दिया।

एक रात जब अशोक घर आया, उसने देखा सुशीला अपने कमरे में सिर झुकाकर चुपचाप बैठी थी। उसने रसोईघर में झाँका, खाना नहीं बना था। “खाना क्यों नहीं बनाया है?” अशोक ने पूछा। सुशीला ने तबीयत ठीक न होने की बात की, पर इस बात को अशोक ने नहीं माना। परिणामस्वरूप सुशीला को मर्जी के खिलाफ खाना बनाना पड़ा। उसने खुद खाना नहीं खाया।

उस रात से, सुशीला का अपने पति पर से विश्वास समाप्त हो गया। ‘मेरे पति को मेरी चिंता नहीं है। तबीयत खराब होने पर भी मुझे काम करना पड़ेगा। मेरी हालत पर अशोक कभी रहम नहीं करेगा,’ ऐसे विचार सुशीला के मन को घेरने लगे। तबीयत खराब लगने पर एक बार सुशीला ने अशोक को घर बुलाया, पर अशोक दुकान छोड़कर नहीं आया। पति के साथ शारीरिक संबंध सुशीला को पहले भी अच्छे नहीं लगते थे। इन घटनाओं के बाद, उसने पति के साथ शारीरिक संबंध रखना बिलकुल बंद कर दिया। पति-पत्नी के बीच मनमुटाव बढ़ गया।

एक दिन सुशीला ने अशोक को किसी और स्त्री के साथ देख लिया। उसे इतनी ग्लानि हुई कि वह अशोक को छोड़कर किसी आश्रम में जाने के लिए तैयार हो गई। उसने अपना सामान बांध लिया, पर उसके छोटे बेटे ने उसे न जाने के लिए समझाया। धर्मगुरुओं और महात्माओं पर सुशीला का विश्वास और अधिक बढ़ गया था, पर वह मान गई। इसके बाद सुशीला ने बहुआयामी परिवर्तन को अपनाया। तब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ, उसके बेटे ने उसे किसी बड़े संकट से बचा लिया था।

विश्वास बहुत अधिक कमजोर हो सकता है

☞ हमारा अपने पर से विश्वास हटने लगता है।

❐ स्पष्टीकरण—हम अपनी तुलना दूसरों से करते हैं। अक्सर हमारे आस-पास के लोगों में भी विश्वास की कमी होती है। हमारी कमजोरी, आस-पास के लोगों की तुलना में, कम हो सकती है—और हम सोचेंगे, हम दूसरों से बेहतर हैं। अगर हमारी कमजोरी दूसरों के बराबर है, हम सोचेंगे कि हम नॉर्मल हैं। अगर हमारी कमजोरी दूसरों से अधिक है, हमें खराब लगेगा—और हम उस कमजोरी को दूर करने के लिए कुछ करने की कोशिश करेंगे।

अगले पृष्ठ पर सुकेशी का उदाहरण दिया गया है। उसकी कमजोरी सामान्य से अधिक थी। जिसके कारण, उसे खराब लगने लगा था—और उसने आत्महत्या की कोशिश की। यह सच है, हममें से अधिकतर लोग सुकेशी जैसे नहीं हैं। पर हम भी टीवी देखकर अपना समय गुजारते हैं। कोई भी शारीरिक व्यायाम, नियमित रूप से, करना हमारे लिए भी मुश्किल है। इसका अर्थ हुआ, हम बाकी लोगों जैसे हैं। हममें यह विश्वास नहीं है कि हम टीवी देखने में लगाए गए समय का कोई बेहतर उपयोग कर सकते हैं—या कोई जरूरी काम नियमित रूप से कर सकते हैं। पर सच्चाई है कि हम बाकी लोगों से ऊपर उठ सकते हैं। और अपने में कुछ कर पाने का एक बहुत बड़ा विश्वास पैदा कर सकते हैं।

❐ स्पष्टीकरण—हम सोच सकते हैं—हम दूसरों जैसे हैं, और हम दूसरों जैसे ही बने रहना चाहते हैं। मतलब हम “नॉर्मल” बने रहना चाहते हैं। पर यह धारणा भविष्य में हमारे लिए समस्या पैदा कर सकती है। नार्मल की तुलना में अच्छा होना इस बात को सुनिश्चित करेगा कि हम भविष्य में बीमार नहीं होंगे। नॉर्मल की तुलना में अच्छा होना ही इस बात को भी सुनिश्चित करेगा कि भविष्य में हमारा विश्वास और कमजोर नहीं होगा, और हम सुकेशी जैसी हालत में नहीं पहुंचेंगे।

☞ बाकी लोग भी हम जैसे ही हैं, केवल इससे संतोष कर लेना ठीक नहीं है।

❐ स्पष्टीकरण—उसी अस्थिरता का प्रभाव हमारे ऊपर दूसरों से भिन्न हो सकता है। उसी अस्थिरता के प्रभाव से किसी को दमा हो जाता है, किसी को माईग्रेन, तो किसी को कमर-दर्द होता है। किसी को कोई भी तकलीफ नहीं होती है। भविष्य में अस्थिरता का हमारे ऊपर क्या प्रभाव होगा? यह हम अभी नहीं जान सकते हैं। इसलिए दूसरों से अपनी तुलना करना, और हम दूसरों जैसे ही हैं, यह सोचकर संतोष कर लेना ठीक नहीं है।

☞ करीबी लोग भी हमारा विश्वास करना बंद कर देते हैं।

❐ स्पष्टीकरण—अगर हमारे जीवन में उतार-चढ़ाव है, हमें कभी अच्छा लगता है और कभी खराब लगता है। जब हमें खराब लगता है, हम दूसरों के लिए जरूरी काम नहीं कर पाते हैं। दूसरे लोग हमें दोष देते हैं, और समझते हैं कि हम भरोसे के काबिल नहीं हैं। लेकिन हमें लगता है कि हमारी परेशानी को कोई नहीं समझ रहा है। और हम किसी पर भरोसा नहीं कर सकते हैं।

हमारा पास के लोगों पर से विश्वास हटने लगता है, और अंधविश्वास बढ़ सकता है।

☞ हमारा पास के लोगों पर से विश्वास हटने लगता है, और अंधविश्वास बढ़ सकता है।

हम अपने जीवन में हर किसी पर विश्वास नहीं करते हैं। हमें पता है, लोग हाँ-हाँ कर देते हैं, पर बाद में अपना वायदा पूरा नहीं करते हैं। हर किसी का विश्वास कर लेना एक कमजोरी माना जाता है। लेकिन कुछ लोगों पर हम विश्वास करते हैं, और कुछ लोगों पर तो आँख मूँद कर विश्वास कर लेते हैं। जितने अधिक लोगों पर हम विश्वास कर सकते हैं, हमें उतना अधिक अच्छा लगता है।

हमारे जीवन में तनाव बढ़ जाता है।

✓ भैरवी की लड़की की शादी पाँच महीने बाद होने वाली थी। उसके दो बड़े-बड़े लड़के थे। पति की वकालत अच्छी चलती थी। लड़की भी नौकरी कर रही थी। चिंता की कोई भी बात नहीं थी। फिर भी भैरवी परेशान थी, “हाय मैं कैसे यह सब करूंगी? मुझे ही सब कुछ करना है, और मेरी तो तबीयत ही ठीक नहीं रहती है।”

जैसे-जैसे विवाह की तारीख निकट आती जाती थी, भैरवी की परेशानियाँ बढ़ती जाती थीं। विवाह से पंद्रह दिन पहले, वह सचमुच बीमार हो गई, उसे हॉस्पिटल ले जाना पड़ा। वहाँ डॉक्टर ने कहा कि टैंशन के अलावा कोई बीमारी नहीं है।

❐ स्पष्टीकरण—माना हमें ठीक एक महीने बाद कोई महत्वपूर्ण काम करना है। काम भले ही केवल एक दिन का हो, लेकिन उसका टैंशन हमें पूरे महीने बना रह सकता है, अगर हमें अपने ऊपर विश्वास नहीं है कि हम उस काम को ठीक से कर लेंगे—या हमें विश्वास नहीं है कि हमें उस काम को करने के लिए बाकी लोगों की मदद मिलेगी। इस प्रकार से, विश्वास की कमी और तनाव का सीधा संबंध है।

मनोज को हार्ट अटैक हुआ।

✓ मनोज एक प्राईवेट फर्म में नौकरी करता था। काम जिम्मेदारी का था, लेकिन पैसे अच्छे मिलते थे। मनोज देर रात घर लौटता, और खाना खाकर सो जाता। वह सवेरे उठकर थोड़ा व्यायाम भी करता था। उसे कोई बुरी आदत भी नहीं थी, और वह घर का बना सादा खाना खाता था। उसे कोई बीमारी नहीं थी, लेकिन एक दिन अचानक उसे छाती में दर्द हुआ। हॉस्पिटल में डॉक्टर ने हार्ट अटैक घोषित किया। उस समय मनोज की उम्र केवल चालीस वर्ष थी।

बहुआयामी परिवर्तन के दौरान, मनोज ने बताया, उसे अपना काम पसंद नहीं था। वह अपने सहकर्मियों को भी पसंद नहीं करता था। उसे बारह घंटे के लगभग ऑफिस में रहना पड़ता था, और कोई छुट्टी भी नहीं मिलती थी। उसने दो बार उस फर्म को छोड़ा, लेकिन पेट पालने के लिए फिर से उसी नौकरी को पकड़ लिया।

❐ स्पष्टीकरण—हम ऐसे काम में लग जाते हैं, जो हमें पसंद नहीं होता है। इसके बाद हमें खराब लगता रहता है, लेकिन हम उस काम को छोड़ नहीं पाते हैं। हमें लगातार खराब लगता रहता है, और इसका प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है—इसके लिए हमारी जीवन-शैली का खराब होना जरूरी नहीं है।

इस सबके मिले-जुले प्रभाव से, हमें अनेक बीमारियाँ लग सकती हैं।

❐ स्पष्टीकरण—हमें अपने ऊपर विश्वास नहीं है, और अगर हमें अपने आस-पास के लोगों पर भी विश्वास नहीं हैं, इसका बहुत गहरा असर हमारे जीवन पर पड़ता है। हमारी कुछ करने की इच्छा नहीं होती है। छोटा सा काम, जैसे उठकर पानी का गिलास लेना, यह भी एक बोझ जैसा लग सकता है। निराशा, चिंता, और तनाव का प्रभाव नींद और भूख पर पड़ता है। नींद बढ़ सकती है या घट सकती है। भूख कम हो सकती है। तला-भुना, मीठा, या नमकीन खाने की इच्छा बढ़ सकती है। सिगरेट या शराब की आदत पड़ सकती है। हम टीवी के सामने बैठे रहते हैं, और शारीरिक व्यायाम मन को नहीं भाता है। जाहिर है, इस सबके मिले-जुले प्रभाव से अनेक प्रकार की बीमारियाँ पैदा हो सकती हैं।

स्थिरता आने पर अनेक बीमारियाँ पलट कर ठीक हो सकती हैं।

❐ स्पष्टीकरण—ऊपर का चित्र हमें कुछ अजीब लग सकता है| इसी प्रकार से इस मार्गदर्शिका में लिखी गई बहुत सी बातें भी हमें अजीब लग सकती हैं। खास तौर पर यह बात, स्थिरता लाने से बीमारियाँ पलटकर ठीक हो सकती हैं। अजीब लगने का कारण है, शायद हमें व्यक्तिगत रूप से बहुआयामी परिवर्तन से होने वाले लाभों का अभी पूरा पता नहीं है। बहुआयामी परिवर्तन से आने वाली स्थिरता की गुणवत्ता का अभी हमें पूरा पता नहीं है।

स्वस्थ शब्द का अर्थ

क्या हम ‘स्वस्थ’ शब्द कैसे बना है, यह जानते हैं? यह शब्द दो धातुओं से मिलकर बना है—स्व + स्थ। मतलब जो व्यक्ति अपने में स्थिर है, वही स्वस्थ है। स्वास्थ्य की इतनी व्यावहारिक परिभाषा किसी भी और भाषा के किसी भी शब्द में निहित नहीं है।

पूर्वी सभ्यताओं से जुड़े ध्यान और प्राणायाम जैसे विचारों का उद्देश्य इस स्थिरता को पाना ही है। बहुआयामी परिवर्तन इसी स्थिरता को आगे ले जाता है। इस अध्याय में इसी स्थिरता के महत्व को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया गया है।





मार्गदर्शिका