क्या अस्थमा एक असाध्य रोग है?

अस्थमा के आधुनिक उपचार पर, और अस्थमा के बारे में हमारी आज की सोच पर, बहुआयामी परिवर्तन कई गम्भीर सवालिया निशान लगाता है। आज अस्थमा को असाध्य माना जाता है, और निकट भविष्य में इस रोग को साध्य बना पाना असंभव माना जा रहा है। पश्चिम के धनी देशों में ही अस्थमा के रोगियों की संख्या अधिक है, जहां अस्थमा के बारे में जानकारी का प्रसार और इसके आधुनिक उपचार की सुविधाएं बहुतायत में हैं। इसके विपरीत आर्थिक रूप से कमजोर देशों में अस्थमा का प्रतिशत कम है, जबकि वहां पर आधुनिक उपचार कम लोग लेते हैं। माना जाता है कि अस्थमा अलर्जी से होता है, परंतु विकसित देशों में अलर्जी अधिक होने का कोई स्पष्ट कारण दिखाई नहीं देता है। वैज्ञानिकों के लिए विकसित देशों में अस्थमा की अधिकता का कारण बता पाना असंभव है। जाहिर है कि अस्थमा के बारे में हमारी आज की सोच में कुछ भारी कमी है।


आधुनिक चिकित्सा शास्त्र के अनुसार अस्थमा असाध्य है

आधुनिक चिकित्सा-शास्त्र एकमत से अस्थमा को एक असाध्य रोग मानता है। आधुनिक चिकित्सा-शास्त्र के अनुसार, अस्थमा को केवल काबू में रखा जा सकता है, और किसी भी उपचार के द्वारा इसे ठीक कर पाना नामुमकिन है। लेकिन अस्थमा को असाध्य मानने की यह सोच, तथ्यों की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है।


अस्थमा असाध्य है: यह धारणा तथ्यों के परे है|

पूरी आबादियों पर किए गए शोध

मान लीजिए हमारे शहर में पांच साल की उम्र वाले तीन हजार बच्चे हैं। और इन तीन हजार बच्चों की जांच करने पर उनमें से तीन सौ बच्चों को अस्थमा निकलता है। अब इन तीन सौ बच्चों की जांच, हम हर पांच साल पर कर सकते हैं। तीस, चालीस, और पचास साल के बाद भी हम देखेंगे कि तीन सौ में से बहुत सारे बच्चे (जो तब बड़े हो गए होंगे), अपने बचपन के अस्थमा को पूरी तरह से भूल चुके होंगे—मतलब उनका अस्थमा पूरी तरह से ठीक हो चुका होगा। इसका अर्थ निकलेगा कि अस्थमा प्राकृतिक रूप से ठीक होने वाला रोग है।

कुछ शहरों की पूरी आबादियों पर ऐसे शोध पचासों वर्षों से किए जा रहे हैं, और उनके परिणामों से हम पूरी तरह से अवगत हैं। ये परिणाम यही बताते हैं कि एक बहुत बड़ी संख्या में लोगों का अस्थमा प्राकृतिक रूप से पूरी तरह से ठीक हो जाता है।

मेलबोर्न अस्थमा स्टडी 1964 में शुरू हुई| वर्ष 1964 में जिन बच्चों को अस्थमा था, उनमें से बहुतों का अस्थमा 35 वर्ष बीतने के बाद शांत था| ऐसे लोगों को पीले रंग से चिन्हित किया गया है|

अस्थमा के उपचार में स्टीरॉयड्स का प्रयोग आम होने से पहले की गई शोध

अस्थमा के उपचार में स्टीरॉयड्स का आम प्रयोग पिछली शताब्दी के मध्य में सत्तर के दशक में शुरू हुआ था। और आज स्टीरॉयड्स अस्थमा के मानक उपचार का प्रमुख हिस्सा हैं। कह सकते हैं कि अस्थमा का मानक उपचार आज स्टीरॉयड्स के ऊपर पूरी तरह से आधारित है, और स्टीरॉयड्स को एक ताकतवर औषधि माना जाता है, लेकिन यह ताकतवर औषधि भी अस्थमा को ठीक करने में सक्षम नहीं है, इसलिए अस्थमा को असाध्य रोग मान लिया गया है।

लेकिन सत्तर के दशक से पहले स्थिति कुछ अलग थी। अस्थमा के लिए अनेक प्रकार की दवाओं का प्रयोग होता था, और शोधकर्ता अस्थमा के लिए अनेक उपचारों पर खोज कर रहे थे। इस दौरान कई शोधकर्ता अस्थमा के ठीक होने की रिपोर्ट देते थे, और ऐसी रिपोर्ट मेडिकल साइंस के जर्नलों में छपती थीं। जाहिर है कि साठ के दशक तक बहुत से लोग अस्थमा को साध्य मानते थे।

सत्तर के दशक से यह स्थिति बदल गई। माना जाने लगा कि स्टीरॉयड्स का प्रयोग जीवन भर करना पड़ेगा। इस सोच के बाद यह लाजमी हो गया कि हम अस्थमा को एक असाध्य रोग घोषित कर दें। इस प्रकार से अस्थमा एक असाध्य रोग माना जाने लगा।

अस्थमा असाध्य है: यह धारणा पैदा कैसे हुई?

बीसवीं शताब्दी के शुरू में यह धारणा बनी और बलवती हुई कि अस्थमा असाध्य है| उन दिनों में अस्थमा के अनेक प्रकार के उपचार प्रचलित थे (जैसे कि आज भी हैं) इन अवैज्ञानिक उपचारों से आम आदमी को बचाने के लिए, उस समय के कुछ अग्रणी चिकित्सकों ने अस्थमा का प्रचार एक असाध्य रोग के रूप में करना शुरू किया| इन चिकित्सकों में ब्रिटिश चिकित्सक सर आर्थर हर्स्ट का नाम सबसे पहले लिया जाएगा| वर्ष १९२९ की अस्थमा रिसर्च कौंसिल की रिपोर्ट में लिखा गया:

The only thing [Hurst] felt sure about with regard to asthma was that there was still no cure for it. He gave the audience some account of his own experiences with various treatments, including an intranasal treatment which was said to have led to disappearance of asthma from Chicago. He had also been invited to a clinic in America where a cure by dieting was promised, but a friend who had undergone the treatment said that he preferred asthma to the diet.

 

उस समय के चिकित्सकों ने अस्थमा के इलाज के बारे में लोगों को गुमराह होने से बचाने के लिए, अस्थमा को "असाध्य रोग" का नाम दे दिया| असाध्य रोग का यह ठप्पा, अस्थमा के ऊपर, एक शताब्दी बीत जाने के बाद अभी भी चिपका हुआ है| विडंबना है कि हम कैंसर को साध्य रोग मानने की सिफारिश करते हैं|


अस्थमा के रोगी बहुआयामी परिवर्तन अपनाएं

क्या-क्या लाभ मिलने की संभावना है?

अस्थमा के सभी रोगियों को नीचे लिखे ये सभी लाभ मिलेंगे:

  • अस्थमा के लक्षणों में सुधार होगा: जैसे कि सांस फूलना और खांसी आना| इन लक्षणों के कारण रोगी की पूरी दिनचर्या बिगड़ सकती है, जैसे कि रात को ठीक से नींद न आना|
  • अस्थमा से जुड़ा परहेज कम होगा: अस्थमा के रोगी कई तरह की रोक-टोक अपने ऊपर लगते हैं| सबसे अधिक रोक खाने-पीने पर और रोजमर्रा के काम-काज पर लगाई जाती है| एक महिला रसोईघर में नहीं घुसती थी, और उसका बेटा और पति खाना पकाते थे|
  • अस्थमा की दवाइयां कम होंगी: मुख्य रूप से दो प्रकार की दवाएं प्रयोग की जाती हैं|बहुआयामी परिवर्तन का इन दवाइयों के प्रयोग पर क्या प्रभाव होगा? इसका विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है|

अस्थमा नियंत्रण और रोगमुक्ति की दिशा में बड़ा कदम

मौसम पर आधारित, यानी सीजनल अस्थमा, बहुआयामी परिवर्तन द्वारा ठीक हो जाता है। रुक-रुक कर होने वाला अस्थमा भी इस परिवर्तन द्वारा ठीक होने की प्रबल संभावना होती है। रुक-रुक कर होने वाले अस्थमा का अर्थ है कि अस्थमा के दो दौरों के बीच एक अंतराल होता है, जिस अंतराल में मरीज अस्थमा के लक्षणों से पूरी तरह से मुक्त होता है, और दवाओं की जरूरत भी नहीं होती है।

अगर हमारे अस्थमा के लक्षण साल भर लगातार बने रहते हैं, तब भी बहुआयामी परिवर्तन अपनाना हमारे लिए अच्छा है। बहुआयामी परिवर्तन से अस्थमा के लिए ली जाने वाली दवाओं की मात्रा कम होगी, और अस्थमा के लक्षण काबू में रहेंगे। कुल मिलाकर अस्थमा ठीक न होगा, फिर भी हम एक बेहतर जीवन जी सकेंगे।

बहुआयामी परिवर्तन अस्थमा में कैसे लाभ पहुंचाता है?

बहुआयामी परिवर्तन अस्थमा में निचले सभी स्तरों पर मदद करता है:

  • बेहतर जीवनशैली: नियमित शारीरिक व्यायाम करने और धूम्रपान बंद कर देने जैसे जीवनशैली में किए गए परिवर्तनों से अस्थमा के रोगियों को लाभ मिलता है|
  • धीमा और गहरा सांस लेने से श्वसनतंत्र बेहतर ढंग से काम करने लगता है, और अस्थमा काबू में रहता है|
  • चिंता और उदासी जैसे लक्षणों और दूसरी मानसिक परेशानियों का गहरा संबंध अस्थमा के साथ है| बहुआयामी परिवर्तन इन परेशानियों का हल निकाल सकता है| इस अध्याय को पढ़ें: बहुआयामी परिवर्तन—मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक आशा|
  • तनाव का भी गहरा संबंध अस्थमा के साथ है| माना जा सकता है कि अलर्जी और तनाव मिलकर अस्थमा का दौरा शुरू करने और उसे जारी रखने के लिए उत्तरदायी हैं| बहुआयामी परिवर्तन हमें तनाव का मुकाबला करने की शक्ति देता है| तनाव कम करके ही बहुआयामी परिवर्तन अस्थमा को ठीक करने का रास्ता खोलता है|

बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के बाद, अस्थमा के रोगी, अस्थमा के लक्षणों को पहचानने और उसके अनुसार उपचार शुरू करने का काम बेहतर ढंग से कर पाते हैं| यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि उपचार शुरू करने के बहुत से निर्णय पीड़ितों को अपने आप बिना डॉक्टरी मदद के लेने पड़ते हैं| बहुआयामी परिवर्तन का अस्थमा पर होने वाला सकारात्मक प्रभाव बहुत गहरा और निराला है। इस अद्वितीय प्रभाव के कारण ही अस्थमा के अनेक रोगी रोगमुक्त हो जाते हैं। जो रोगमुक्त नहीं भी होते हैं, उनके लक्षण और दवाइयाँ भी कम हो जाते हैं| नीचे के चित्र में दिखलाया जा रहा है कि जीवन के हरेक क्षेत्र में बेहतरी का सकारात्मक प्रभाव अस्थमा पर होता है, और हरेक क्षेत्र में गिरावट का नकारात्मक प्रभाव भी होता है|

 

सामाजिक, मानसिक परिवर्तनों एवं अस्थमा का मुकाबला करने की सीख का सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव|
SLTA = Severe Life Threatening Asthma

 

क्या बहुआयामी परिवर्तन के साथ अस्थमा की दवाइयां भी लेनी पड़ेंगी?

बहुआयामी परिवर्तन के द्वारा अस्थमा का उपचार, डॉक्टर की निगरानी और सलाह के साथ ही सम्भव है, क्योंकि दवाइयों को धीरे-धीरे ही कम या फिर बंद किया जा सकता है। अस्थमा की दवाइयों के उपयोग में नीचे लिखे सुझाव अपनाने की सलाह दी जाती है। ये सुझाव लंबे अनुभव के आधार पर दिए जा रहे हैं| इन सुझावों को अपने डॉक्टर की देख-रेख में ही अपनाएं।

लंबा काम करने वाली बीटा अगोनिस्ट दवाओं के इनहेलर

सबसे पहले लंबा काम करने वाली बीटा अगोनिस्ट (लौंग-एक्टिंग बीटा अगोनिस्ट - LABA) पूरी तरह से बंद कर देने की सलाह दी जाती है। ये दवाइयां केवल इनहेलर द्वारा ही दी जाती हैं। बहुआयामी परिवर्तन द्वारा अस्थमा के उपचार में इन दवाओं का कोई भी स्थान नहीं है। ऊपर के वीडियो में इन दवाओं को बंद कर देने का फायदा स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है|

कम समय तक काम करने वाले यानी शॉर्ट एक्टिंग बीटा अगोनिस्ट इन दवाओं के इनहेलर

कम समय तक काम करने वाले यानी शॉर्ट एक्टिंग बीटा अगोनिस्ट जैसे सालब्युटामौल इनहेलर को लेना शुरू रख सकते हैं, लेकिन जरूरत से अधिक इसका उपयोग न करें। हम देखेंगे कि जल्दी ही इस इनहेलर की जरूरत कम हो जाएगी, और फिर पूरी तरह से समाप्त हो आएगी। इस प्रकार से केवल लक्षणों को दूर करने के लिए प्रयोग किए जाने वाले बीटा अगोनिस्ट इनहेलर पूरी तरह से बंद हो जाएंगे।

मिश्रित दवाओं के इनहेलर

ध्यान रहे स्टीरॉयड इनहेलर के साथ भी ये दवाएं मिली हो सकती हैं, ऐसे में दो दवाइयों वाले इनहेलर के बदले केवल स्टीरॉयड वाला इनहेलर शुरू करना पड़ेगा। कुल मिलाकर बहुआयामी परिवर्तन, दो दवाइयों वाले मिश्रित इनहेलरों को शंका की नजर से देखता है, और इन सभी को तुरंत बंद करने की सिफारिश करता है।

रोकथाम बाली दवाओं के इनहेलर

क्रॉनिक अस्थमा में या एक्यूट अस्थमा के गम्भीर अटैक के दौरान, इनहेलर द्वारा स्टीरॉयड की पर्याप्त मात्रा लेने की सलाह दी जाती है। स्टीरॉयड की गोलियां देने की जरूरत भी हो सकती है।

क्रॉनिक अस्थमा में क्रोमोलिन सोडियम इनहेलर को जोड़ने का सोचा जा सकता है, खास तौर पर यदि स्टीरॉयड इनहेलर मात्रा बहुत अधिक लेनी पड़ रही है। और स्टीरॉयड की जरूरत को कम करने वाली दूसरी दवाओं को भी जोड़ा जा सकता है। केवल लौंग-एक्टिंग बीटा अगोनिस्ट, इन दवाइयों की मनाही है|

एंटीबायोटिक दवाओं का प्रयोग जरूरत के अनुसार किया जा सकता है।

दवाइयों में लाए गए ये परिवर्तन बहुआयामी परिवर्तन का हिस्सा हैं|

बहुआयामी परिवर्तन अपनाने वाले अस्थमा से पीड़ित सभी व्यक्तियों को, दवाइयों में ये परिवर्तन लाना जरूरी है| यानी दवाइयों में लाए गए ये परिवर्तन बहुआयामी परिवर्तन का जरूरी हिस्सा हैं|इन परिवर्तनों का लाभ सभी को मिलने वाला है| और इन परिवर्तनों से किसी को भी कोई हानि होने वाली नहीं है|

इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप, अस्थमा के लक्षण एक सप्ताह में कम होना शुरू हो जाएंगे, और अगले चार से आठ सप्ताह तक कम होते रहेंगे| इस दौरान अधिकतर लोगों में दवाओं की जरूरत कम होती जाएगी| कुछ लोगों में अस्थमा के लक्षण पूरी तरह से समाप्त हो सकते हैं और सभी दवाएं बंद हो सकती हैं। ऐसे लोगों को केवल बहुआयामी परिवर्तन अपनाए रखने की जरूरत है| बाकी लोगों को कुछ रोकथाम वाली दवाएं जारी रखना पड़ेगा|





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