रोजमर्रा के जीवन में विचारों और भावनाओं का सही चुनाव

मन, वचन, और कर्म परस्पर जुड़े हैं

बहुआयामी परिवर्तन में, विचारों और भावनाओं के सही चुनाव का विशेष महत्व है। हम अकसर सुनते है कि मन, वचन, और कर्म एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। यहां मन हमारी भावनाएँ हैं, वचन हमारे विचार हैं, और कर्म हमारे काम हैं। उदाहरण के लिए सिगरेट पीना एक काम है, सिगरेट पीने से हमें अच्छा लगता है, यह एक भावना है; और सिगरेट पीने से कोई नुकसान नहीं है, यह सिगरेट पीने वालों का विचार हो सकता है। अब अगर किसी व्यक्ति को धूम्रपान बंद कर देना है, उसे मन, वचन, और कर्म तीनों को बदलना पड़ेगा। मतलब सिगरेट पीना बंद करना पड़ेगा—साथ ही साथ सिगरेट से मिलने वाले आनंद के अनुभव को मन से निकालना होगा, तथा सिगरेट पीना हानिकारक है इस प्रकार की सोच विकसित करनी होगी। तभी सफलतापूर्वक धूम्रपान बंद हो सकेगा। ऐसे और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। अगर हमें शारीरिक व्यायाम को अपनाना है, हमें शारीरिक व्यायाम के बारे में अच्छी सोच और भावनाएँ पैदा करनी होंगी। मेरे पास व्यायाम का समय नहीं है, ऐसे विचार मन से निकाल देने होंगे|

विचारों और भावनाओं के सही चुनाव का ही दूसरा नाम बहुआयामी परिवर्तन है

हम किसी क्षण या पूरे जीवन में क्या करेंगे और क्या नहीं करेंगे — यह निर्धारित करना विचारों और भावनाओं की जिम्मेदारी है| अगर हमें अपने जीवन में कोई भी बदलाव लाना है, उसके लिए विचारों और भावनाओं में बदलाव पहले लाना पड़ेगा| बहुआयामी परिवर्तन इससे अछूता नहीं है| और हम कह सकते है: विचारों और भावनाओं के सही चुनाव का ही दूसरा नाम बहुआयामी परिवर्तन है|

इस मार्गदर्शिका के पहले चरण से ही विचारों और भावनाओं को बदल डालने का काम जारी है| तनावमुक्ति का आसन, सांस का व्यायाम, तम्बाकू का प्रयोग छोड़ना, शारीरिक व्यायाम, और पैरासिटामौल का प्रयोग — इन सभी क्रियाओं को बदलने का उद्देश्य भी विचारों और भावनाओं पर नियंत्रण लाना ही है। सैक्स क्रियाओं पर पूर्ण नियंत्रण का मतलब तो पूरी तरह से विचारों और भावनाओं पर नियंत्रण ही है। दूसरा चरण भी पूरा का पूरा विचारों और भावनाओं पर नियंत्रण या विचारों और भावनाओं के सही चुनाव के बारे में ही है। दूसरे चरण के प्रारम्भ में स्थिरता के विस्तृत रूप की बात की गई है। इस विस्तृत रूप में, दूसरों की स्थिरता, और अपने भविष्य की स्थिरता की भी बात हुई है। क्या विचारों और भावनाओं के सही चुनाव के बिना हम स्थिरता को आगे बढ़ा सकते हैं? इसके बाद वाले अध्याय हैं: पुरानी तकलीफों को भूलना, सैक्स क्रियाओं में बारीकी लाना, अपनी ताकत को पहचानना, और अपने को तथा दूसरों को माफ कर देना| इन सभी अध्यायों में भी विचारों और भावनाओं के सही चुनाव का महत्व स्पष्ट देखा जा सकता है। फिर क्यों हम इस अध्याय में विचारों और भावनाओं की ही बात उठा रहे हैं? विचारों और भावनाओं का सही चुनाव एक कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है—इस अध्याय में हम यह समझ सकेंगे, और इस प्रक्रिया पर अमल करने का तरीका जान सकेंगे।

विचार और भावनाएँ हमारे मस्तिष्क की खेती हैं

हम अपने जीवन की तुलना एक खेत से कर सकते हैं। विचार और भावनाएँ इस खेत की फसल हैं, जो हमेशा उगते रहते हैं। खेत में खर-पतवार भी उगते हैं, जिनको उखाड़ कर फेंक देना पड़ता है। हमारे कुछ विचार और भावनाएँ खर-पतवार की तरह हैं, जिन्हें उखाड़ देना ही बेहतर है। पर अच्छी खेती के लिए केवल खर-पतवार उखाड़ देना काफी नहीं है। हमें कब कौन सी फसल उगानी है, इसका निर्णय भी लेना पड़ता है। हमारे लिए यह विचारों और भावनाओं के सही चुनाव जैसा है। मतलब विचार और भावनाएँ हमारे मस्तिष्क की खेती हैं।

अभी हमनें यह समझा कि विचारों और भावनाओं का सही चुनाव जरूरी है। अब यह समझेंगे कि विचारों और भावनाओं का सही चुनाव करने का क्या अच्छा और आसान रास्ता है?

सबसे पहले अपने मस्तिष्क में उगी हुई खर-पतवार को उखाड़ डालें

हमारे मस्तिष्क में क्या खर पतवार उगती है? सर्वप्रथम यह जान लेते हैं।

  • जरूरत से अधिक चिंता, क्रोध, और डर जैसी भावनाएँ
  • जरूरत से अधिक सैक्स से जुड़े विचार और भावनाएँ
  • पिछले जीवन से जुड़ी तकलीफ के बारे में सोचते रहना
  • अपनी और दूसरों की कमियों और गलतियों के बारे में जरूरत से अधिक सोचना, और उन्हें माफ न कर पाना
  • उत्तेजित होकर अनाप-शनाप बोलना या काम करना
  • उदास होकर बोलना छोड़ देना या अपना काम छोड़ देना
  • भूख पर काबू न होना—मतलब कुछ मीठा और कुछ नमकीन, कचौड़ा कचौड़ी, पकौड़ा पकौड़ी, या तला भुना खाने की हर समय इच्छा होना।

अगर हम मार्गदर्शिका के अब तक के अध्यायों को पढ़ चुके हैं, और उन अध्यायों का अनुसरण कर रहे हैं—हमने इस खर-पतवार को काफी हद तक पहले ही उखाड़ डाला होगा, या उसकी कोशिश चल रही होगी। इस कोशिश को जारी रखें, और इसमें सफलता प्राप्त करें। इसके बाद ही, हम विचारों और भावनाओं के सही चुनाव की दिशा में आगे बढ़ पाएंगे।

❐ स्पष्टीकरण—इस अध्याय को पढ़ने और उसका पालन करने से पहले यह जरूरी हो सकता है कि हम पिछले सभी अध्यायों में दिए गये मार्गदर्शन का ठीक से पालन करना सीख लें।

हर क्षण खुश रहें, और हर हाल में खुश रहें

हमारा बैंक में खाता होगा। उस खाते में हम पैसा जमा करते हैं और निकालते हैं। बाकी बची रकम को हम बैंक बैलैंस कहते हैं। इस बैंक बैलैंस से भी अधिक महत्व हमारी हंसी-खुशी के बैलैंस का है। इस बात को बहुत कम लोग जानते और समझते हैं कि हमारी खुशी का भी बैलैंस होता है। हम जितनी देर खुश रहते हैं, उतनी देर यह बैलैंस बढ़ता है—और हम जितनी देर दुखी रहते हैं, यह बैलैंस घटता है। इसलिए खुश रहना सीखने में ही फायदा है। और खुश रहना सीखने के लिए जरूरी है कि हम विचारों और भावनाओं का सही चुनाव करें।

❐ स्पष्टीकरण—हमारे विचार और भावनाएँ हर क्षण बदलते रहते हैं। हर क्षण खुश रहने के लिए यह जरूरी है कि हम हर क्षण अपने विचारों और भावनाओं पर नजर रखें। इसके लिए अभ्यास और साधना की जरूरत है। साधना का अर्थ है, निरंतर सावधानता याने कि ध्यान। धीमा और नियंत्रित सांस और तनावमुक्ति का आसन — इन अध्यायों में हमने सांस पर और दोनों आंखों के बीच के हिस्से (ग्लैबला) पर ध्यान लगाने की बात की थी। उसी प्रकार का ध्यान हम अपने विचारों और भावनाओं पर भी रख सकते हैं। हम एक घंटा या आधा घंटा ध्यान के लिए देते हैं। लेकिन बहुआयामी परिवर्तन अपनाने वाले व्यक्ति हर समय ध्यान की स्थिति में रहना सीखते हैं। इसलिए उन्हें ध्यान के लिए अलग से कुछ समय निर्धारित करने की जरूरत नहीं है।

अपने विचारों और भावनाओं पर नियंत्रण के लिए उनपर निरंतर नजर रखना—यही ध्यान का उद्देश्य है, और यही ध्यान की पराकाष्ठा है। इससे अधिक हमें किसी ध्यान या मेडिटेशन की जरूरत नहीं है।

अपनी और दूसरों की भावनाओं को समझें

पहले थोड़ा सा होमवर्क जरूरी है

अलग-अलग प्रकार की भावनाओं के बारे में जानकारी हासिल करें—और फिर उन अलग-अलग प्रकार की भावनाओं को पहचानना और उनका विश्लेषण करना सीखें। इतने होमवर्क के बाद ही हम भावनाओं पर नजर रखना सीख सकते हैं। हम देखेंगे कि इस काम की कोई सीमा नहीं है। लेकिन हमें बहुत आगे जाने की जरूरत नहीं होगी|

हमने ईर्ष्या, द्वेष, जलन, या डाह के बारे में जरूर सुना होगा।

ईर्ष्या, द्वेष, जलन, या डाह ये मिलते-जुलते शब्द हैं, पर क्या हमें इनका मतलब ठीक से पता है? दूसरों की धन-दौलत या उनके गुणों और अच्छाइयों के बारे में सोचकर हम अकसर दुखी होते हैं। इस दुख के कारण दूसरों को नुकसान पहुंचाने की इच्छा भी हमारे अंदर पैदा हो सकती है। ईर्ष्या और द्वेष रखने वाले लोग अकसर अपने अंदर या अपने आस-पास कुछ कमी या कमजोरी महसूस करते हैं—और इस कमी या कमजोरी के प्रति, या अपने जीवन की परिस्थितियों के प्रति उनके मन में गुस्सा होता है। वे अपनी परिस्थितियों को सुधारना चाहते हैं, और दूसरों को नीचे गिराने की कोशिश कर सकते हैं, या उनकी नकल करने की कोशिश कर सकते हैं। वे उदासी, डर, और चिंता जैसी भावनाओं से भी पीड़ित हो सकते हैं।

अब हम अपने बारे में ईमानदारी से सोचें—क्या हम ईर्ष्या, द्वेष जैसी भावनाओं को महसूस करते हैं? सभी सामान्य व्यक्ति इन भावनाओं को महसूस करते हैं, इसलिए जरूरी है कि हम अपने बारे में सच्चाई को स्वीकार कर लें। एक बार यह मानने के बाद कि हम ईर्ष्या द्वेष जैसी भावनाओं को महसूस करते हैं, आगे का काम शुरू होगा। यह आगे का काम अपनी इन भावनाओं के बारे में गहराई से सोचने का है। इसके लिए ऊपर का पैराग्राफ फिर से पढ़ें और फिर सोचें: किस व्यक्ति के प्रति हमारे मन में ईर्ष्या की भावना सबसे अधिक है? उस व्यक्ति की किस बात को लेकर हमारे मन में ईर्ष्या पैदा हो रही है? क्या हम अपने अंदर किसी कमी को महसूस कर रहे हैं? क्या हम उस कमी को दूर करना चाहते हैं? क्या हम जिससे ईर्ष्या करते हैं, उसे नुकसान पहुंचाना चाहते हैं? क्या हम उस व्यक्ति की नकल करने की कोशिश भी कर चुके हैं? क्या हम उदासी, डर, या चिंता जैसी भावनाओं से भी पीड़ित हैं?

अगर एक से अधिक व्यक्ति के प्रति हमारे मन में ईर्ष्या की भावना है, उन सभी व्यक्तियों के प्रति अपनी भावनाओं का गहराई से अध्ययन करें।

प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, करुणा, आदर, श्रद्धा, भक्ति इत्यादि भी मिलती-जुलती भावनाएँ हैं।

भारतीय विचारकों ने प्रेम या प्यार की भावना को एक ऊंचे धरातल पर रखा है, और महज यौन आकर्षण को काम-भावना का नाम दिया है। छोटे बच्चों के प्रति प्रेम को वात्सल्य कहा जाता है। और मेल-जोल या मित्रता की भावना को स्नेह कहा जाता है। आदर और श्रद्धा बड़े लोगों के प्रति होती है, और भक्ति ईश्वर के प्रति होती है। करुणा की भावना हमें दूसरों की तकलीफ को दूर करने के लिए प्रेरित करती है। सहिष्णुता की भावना, हमें दूसरों की बुराइयों और कमियों या भिन्नता को नजरअंदाज करने में मदद करती है, और हम सबको एक समान समझ पाते हैं।

दैनिक जीवन में इन भावनाओं का मिला-जुला रूप देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए भक्ति में काम भावना या प्रेम का समावेश हो सकता है—जैसे मीरा कृष्ण को अपना सब कुछ मानती है: मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई। बाल-कृष्ण के प्रति हमारी भावना में भक्ति के साथ-साथ वात्सल्य भी जुड़ा हुआ है। हम समझ सकते हैं, इन भावनाओं का शुद्ध रूप कम ही मिलता है। इसलिए इन सभी भावनाओं का विश्लेषण करना जरूरी माना जा सकता है।

हम किसी भी एक व्यक्ति के प्रति अपनी भावनाओं के विश्लेषण से शुरू करें—और इस विश्लेषण के लिए, इन कुछ प्रश्नों का उत्तर दें। क्या दूसरे व्यक्ति के साथ हम किसी प्रकार का कोई क्षणिक या लम्बा संबंध बनाना चाहते हैं? उस संबंध से हम क्या पाना चाहते हैं, और क्या देना चाहते हैं? क्या वह संबंध हमारी सामाजिक या नैतिक मजबूरी है? क्या उस भावना में यौन आकर्षण का समावेश है?

हम रास्ते चलते किसी भिखारी को कुछ दे देते हैं, और उसके बाद इस बात को भूल जाते हैं। भीख देते समय हमारी क्या भावना थी? क्या हमने इस भावना का विश्लेषण किया है? भिखारी के साथ हमारा संबंध क्षणिक था, लेकिन इससे जुड़ी भावनाएँ जटिल हो सकती हैं। क्या हम केवल दया, उदारता, या करुणा के कारण भीख दे रहे थे? या कुछ और भी भावनाएँ इस काम में जुड़ी थीं? क्या हम भिखारी के चेहरे पर खुशी देखने के लिए या उसका आशीर्वाद सुनने के लिए भीख दे रहे थे? क्या हमने कोई गलत काम किया था, और उस अपराध बोध से मुक्ति पाने के लिए हम भीख दे रहे थे? क्या भीख देना हमारी कोई सामाजिक या नैतिक मजबूरी थी? क्या हम अपने बच्चे, पत्नी, माता-पिता, या किसी और को खुश करने के लिए भीख दे रहे थे? क्या हमें लगा कि भीख देकर हमने कोई अच्छा काम कर डाला था? क्या भीख देने से हमारा आत्म-सम्मान बढ़ा था? जाहिर है कि एक छोटे से काम के पीछे की भावनाएँ बेहद जटिल हो सकती हैं। और उनका विश्लेषण उतना ही मुश्किल हो सकता है|

इसी प्रकार से अब हम अपने जीवन-साथी या परिवार के किसी अन्य व्यक्ति के साथ किए गए छोटे से किसी व्यवहार को लें, और उस व्यक्ति के प्रति अपनी भावनाओं का ईमानदारी से विश्लेषण करें।

बहुत कम लोग अपने गुस्से का सटीक विश्लेषण कर पाते हैं।

अधिकतर लोग गुस्सा करते हैं, यह बड़ा आसान है| याद करने की कोशिश करें, हमने आखिरी बार गुस्सा कब किया था। अब जरा सोचें: क्या हमने सही व्यक्ति पर गुस्सा किया था? क्या हमने सही मात्रा में गुस्सा किया था? क्या हमने सही समय पर गुस्सा किया था? क्या हमने सही उद्देश्य के लिए गुस्सा किया था? और क्या हमने सही ढंग से गुस्सा किया था? गुस्से के बारे में ये इतने सारे सवाल अरस्तू ने अपनी एक पुस्तक में पूछे थे।

हमें सिखाया जाता है कि गुस्सा नहीं करना चाहिए—परंतु सच्चाई कुछ अलग है। हमें गुस्सा करते समय अपने ऊपर से नियंत्रण नहीं खोना चाहिए। तभी हम सही व्यक्ति पर, सही मात्रा में, और सही ढंग से गुस्सा कर पाएंगे; और सही उद्देश्य के लिए गुस्सा कर पाएंगे।

अरस्तू ने नैतिकता का ध्यान में रखते हुए, अपनी बात कही थी। परन्तु यहां हम नैतिकता की नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं को पहचानने की बात कर रहे हैं। कहने का मतलब है कि हमारा गुस्सा नैतिकता की भावना से भी प्रेरित हो सकता है, और अनैतिक भावना से प्रेरित भी हो सकता है। दोनों ही दशाओं में हमें अपने गुस्से के पीछे के उद्देश्य की सही जानकारी होनी चाहिए। अगर हम जरूरत से अधिक गुस्सा कर रहे हैं, हमें यह समझ आना चाहिए कि हम जरूरत से अधिक गुस्सा कर रहे हैं। अगर हम गलत व्यक्ति पर गुस्सा कर रहे हैं, यह भी हमें समझ आना चाहिए। कहने का मतलब है, हमें गुस्सा सोच समझकर ही करना चाहिए। अगर गुस्से को खुली छूट देनी है, वह भी सोच समझकर महज दिखावा होना चाहिए। हमारी दृष्टि से, गुस्सा करते समय अपने ऊपर से नियंत्रण खो देना गलत है।

भावनाओं का इंद्रधनुष, रंगों के इंद्रधनुष से कहीं अधिक विशाल है

डर, आशंका, भीति, बेचैनी, अंदेशा, सदमा, दहशत, आतंक, चिंता, उदासी, पीड़ा, कष्ट, संताप, यंत्रणा, वेदना, व्यथा, चिढ़, खिजलाहट, उदासीनता, निष्ठुरता, उत्तेजना, विस्मय, हैरत, आश्चर्य, ऊब, विरक्ति, क्लांति, आत्मविश्वास, अवहेलना, उपेक्षा, घृणा, तिरस्कार, संतोष, तुष्टि, तृप्ति, साहस, कौतूहल, जिज्ञासा, निराशा, विषाद, ग्लानि, अपराधबोध, कामना, चाह, मुराद, लालसा, आकांक्षा, मायूसी, लगन, तत्परता, कर्मठता, धुन, अरुचि, घृणा, जुगुप्सा, विरक्ति, संदेह, अविश्वास, उत्साह, उल्लास, हर्षोन्माद, आनंद, उलझन, कुंठा, शर्मिंदगी, लज्जा, झेंपना, लजाना, सकुचाना, संकोच, शर्म, घबराहट, कुढ़न, कृतज्ञता, खेद, मलाल, पश्चाताप, मातम, शोक, नफरत, घृणा, बैर, उम्मीद, भरोसा, विश्वास, कंपकंपी, दहशत, विभीषिका, वीभत्सता, शत्रुता, निरादर, अवमानना, अपमान, रुचि, रुझान, अनुराग, अकेलापन, हिंसा, जुनून, जोश, भावावेश, अभिमान, अहंकार, गर्व, घमंड, रोष, और नाराजगी जैसे भावनाओं के अनंत नाम हैं। इन सभी के बारे में पूरी जानकारी देना यहां सम्भव नहीं है।

❐ स्पष्टीकरण—इतनी सारी भावनाओं को समझना और उनका विश्लेषण करना हमें मुश्किल लग रहा होगा, और अपने लिए गैरजरूरी लग रहा होगा। इसलिए जिन भावनाओं को हम अपने लिए जरूरी समझें, केवल उनके बारे में जानकारी हासिल करें। अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग भावनाओं की पहचान और विश्लेषण जरूरी हो सकता है।

केवल अपनी भावनाओं को समझना पर्याप्त नहीं है

ध्यान रखें कि अपने आस-पास के व्यक्तियों की भावनाओं को भी समझना भी हमारे लिए उतना ही जरूरी है। जिस किसी को हमें साथ लेकर चलना है, हमारे लिए उस व्यक्ति की भावनाओं को समझना जरूरी है। हम कहानी या उपन्यास पढ़ते हैं या सिनेमा देखते है—उस कहानी, उपन्यास, या सिनेमा के पात्रों की भावनाओं को भी समझना हमारे लिए जरूरी है, तभी हम पूरा आनंद ले पाएंगे। हम अखबार पढ़ते हैं, या टीवी देखते हैं—इन माध्यमों में जिन व्यक्तियों का वर्णन होता है, उनकी भावनाओं को समझना भी हमारे लिए जरूरी है। दुनिया में अच्छाई या फिर बुराई क्यों हो रही है, यह समझने के लिए अच्छा या बुरा करने वालों की भावनाओं को समझना जरूरी है।

भावनाओं का विश्लेषण: कुछ व्यावहारिक बिंदु

हमें यह लग रहा होगा, भावनाओं का विश्लेषण एक बड़ा काम है। और इस काम में बहुत समय लग सकता है। इसलिए धीरे-धीरे आगे बढ़ें। तुरंत परिणाम दिखलाई नहीं देंगे, लेकिन एक माह के बाद या एक वर्ष के बात हमें अपने अंदर बहुत बड़ा परिवर्तन महसूस होने लगेगा। अब इन भावनाओं पर हर समय नजर रखना सीखें

अगर हमें हर समय खुश रहना है, इसके लिए हमें अपने विचारों और भावनाओं पर हर समय नजर रखने की जरूरत है। अगर हमें लोगों के साथ अपना रिश्ता मजबूत करना है, इसके लिए भी हमें अपने विचारों और भावनाओं पर हर समय नजर रखने की जरूरत है। अगर हमें अपनी डाइबिटीज को कंट्रोल में रखना है, तब भी हमें अपने विचारों और भावनाओं पर नजर रखनी होगी। विचारों और भावनाओं पर नजर रख पाना, जीवन में आगे बढ़ने के लिए जरूरी है। और अपने विचारों और भावनाओं पर हर समय नजर रखना सीखा जा सकता है। पहले भावनाओं पर नजर रखना सीखें, और इसके लिए नीचे लिखा तरीका अपनाएँ।

दिन में एक बार अपनी भावनाओं पर नजर डालने से शुरू करें। दिन बीतने के बाद, सोने से पहले, कागज कलम लेकर बैठ जाएँ, और दिन भर की छोटी-बड़ी घटनाओं के बारे में सोचें। हम किसके साथ थे? हमने क्या-क्या किया? और उस समय पर हम कैसा महसूस कर रहे थे? खाना खाते समय कैसा महसूस कर रहे थे? सड़क पर गाड़ी चलाते समय कैसा महसूस कर रहे थे? हो सकता है किसी ने पान खाकर पीक हमारे ऊपर थूक दिया हो। हम फिसलकर गिर पड़े हों। जिसे हम अपना मित्र समझते थे, उसने हमारे साथ धोखा किया हो। दफ्तर में हमारा प्रमोशन हुआ हो, हमारी तारीफ हुई हो, या फिर हमें डांट पड़ी हो। मतलब है, जीवन में छोटी-बड़ी घटनाएँ होती रहती हैं। हर घटना से जुड़ी अपनी भावनाओं को याद करने की कोशिश करें, और फिर उस भावना का विश्लेषण करें।

अपनी भावनाओं पर नजर डालने के साथ-साथ अपने घर या दफ्तर के किसी व्यक्ति की भावनाओं पर भी दिन समाप्त होने के बाद नजर डालें, और ऐसा रोजाना करें। इसके बाद कुछ और लोगों की भावनाओं को समझने की भी कोशिश करें।

धीरे-धीरे भावनाओं को समझना हमारे लिए आसान हो जाएगा। और हम भावनाओं पर लगातार नजर रख सकेंगे। हमें जल्दी पता लग जाएगा: हम गुस्से की तरफ बढ़ रहे हैं या चिंता की तरफ बढ़ रहे हैं। और अगर हम चाहेंगे तो उस गुस्से या चिंता को बीच में ही रोक सकेंगे।

हम सांस पर ध्यान की और दोनों आंखों के बीच के हिस्से (ग्लैबला) पर ध्यान की बात कर चुके हैं। बहुआयामी परिवर्तन की दृष्टि से ध्यान या मेडीटेशन केवल एक-आधा घंटा करना पर्याप्त नहीं है। जीवन में हर समय ध्यान करना ही असली ध्यान है। अपने विचारों और भावनाओं पर हर समय ध्यान लगाए रखना ही असली ध्यान है। रोजमर्रा के जीवन में सही विचारों और भावनाओं को चुनना ही असली ध्यान है।

विचार और भावनाएँ आपस में जुड़ी हैं—इसलिए विचारों पर ध्यान रखना भी जरूरी है

अभी तक हमने भावनाओं को नजर में रखने की बात की है। अब विचारों को भी जोड़ लेते हैं। मनोविज्ञान और दर्शनशास्त्र के अनुसार विचार और भावनाएँ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कहने का मतलब है विचार भावनाओं को प्रभावित करते हैं, और भावनाएँ विचारों पर असर डालती हैं।

किशन एक दफ्तर में क्लर्क था। एक दिन उसके अधिकारी ने उसे बुलाया और बुरी तरह से डांटा। किशन की गलती नहीं थी, पर अधिकारी कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं था। अंत में किशन वापस अपनी कुरसी पर आकर बैठ गया। गुस्से से उसका सिर चक्कर खा रहा था। वह चिल्ला-चिल्ला कर कहना चाहता था कि वह दोषी नहीं था। परंतु वह अपने परिवार के बारे में सोचने लगा, और इसके बाद से उसने अपने आप को संभाला। उसकी नौकरी छूट गई तो उसके बच्चों को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ेंगी। अंत में उसने सिर झुकाकर अपना काम करना शुरु कर दिया।

❐ स्पष्टीकरण—मेरी गलती नहीं है: यह एक विचार है। इस विचार ने किशन के मन में गुस्सा पैदा किया। मेरी नौकरी छूट जाएगी तो मेरे बच्चों का क्या होगा? यह भी विचार है। इस विचार ने किशन को अपना गुस्सा दबाने में मदद की। फिर किशन ने काम करना शुरू कर दिया, और काम से जुड़े विचार उसके मन में आने लगे—इन विचारों ने किशन का गुस्सा बहुत कम कर दिया। फिर किशन ने गहराई से सोचा। उसे लगा कि उसका अधिकारी सभी को इसी प्रकार डांटता है, और उसका गुस्सा और भी कम होने लगा। इस आखिरी विचार ने किशन का गुस्सा पूरी तरह से शांत कर दिया।

विचारों और भावनाओं के बीच एक गहरा संबंध है: इसके और भी अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। किशन के उदाहरण को ही थोड़ा अदल-बदल कर देखते हैं। देखिए, विचार हमारी भावनाओं को कैसे प्रभावित करते हैं?

  • मान लीजिए, किशन को जब डांट पड़ रही थी, उसी समय वह यह सोचता कि वह अधिकारी डांटने की बुरी आदत से मजबूर है—तब शायद किशन के मन में गुस्सा पैदा ही नहीं होता।
  • अगर किशन के मन में अपने बच्चों का विचार नहीं आता, वह शायद अधिकारी से लड़ बैठता और उसकी नौकरी जाने का खतरा पैदा हो जाता।

भावनाएं विचारों को कैसे प्रभावित करती हैं? अब इसके कुछ उदाहरणों पर नजर डालते हैं|

  • किसी से गुस्सा होने पर, हम उसे नुकसान पहुंचाने या उससे बदला लेने की बात सोचते हैं।
  • जिस व्यक्ति से हम प्यार करते हैं, उसकी गलतियों को आसानी से माफ कर देते हैं।
  • उदास होने पर हमारे मन में बुरे विचार आते हैं, और खुश होने पर हमारे मन में अच्छे विचार आते हैं।

कागज कलम लेकर बैठ जाएँ। विचार किस प्रकार से भावनाओं को प्रभावित करते हैं, इसके कुछ उदाहरणों को सोचें और लिखें। और भावनाएं कैसे विचारों को प्रभावित करती हैं, इसके कुछ उदाहरणों को भी लिखें।

विचारों पर पैनी नजर रखना सीखें

विचारों और भावनाओं का गहरा संबंध हम देख चुके हैं। अब अपने विचारों पर नजर रखना सीखें, जिससे अपनी भावनाओं पर हमारा नियंत्रण आसान हो सके।

सबसे पहले अपने खुद के विचारों और भावनाओं के संबंध को देखने का प्रयत्न करें। किस विचार से हमारे अंदर क्या भावना पैदा होती है? इन संबंधों को एक डायरी में विस्तार से लिखें। अब उन विचारों को नियंत्रित करने की कोशिश करें, जिनसे खराब भावनाएं पैदा होती हैं।





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