हिंदी फिल्मों से कुछ स्थितियां

यहाँ हिन्दी मूवीज की कुछ क्लिप्स हैं| इन क्लिप्स में कुछ पात्रों के जीवन की झलक देखने को मिलती है|

कुछ पात्रों के जीवन में मजबूती दिखलाई देती है| बाहुआयामी परिवर्तन द्वारा हम ऐसी मजबूती पा सकते हैं| कुछ पात्रों के जीवन में कमजोरी या कठिनाइयां नजर आती हैं| बहुआयामी परिवर्तन द्वारा हम इन कमजोरियों और कठिनाइयों से ऊपर उठ सकते हैं|

इन क्लिप्स को देखकर या पूरी मूवी देखकर हम बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के बारे में सही निर्णय कर सकते हैं|

चिल्लर पार्टी 2011

चिल्लर पार्टी एक सोसाइटी में रहने वाले बच्चों की कहानी है| यह मूवी वर्ग-संघर्ष के बारे में भी है| एक अनाथ बच्चा फटकू, चिल्लर पार्टी की सोसाइटी में, कारें धोने का काम ले लेता है| बाक़ी बच्चों और फटकू के बीच एक जंग शुरू हो जाती है| फटकू धीरज, दृढ़ता, और आत्म-विश्वास के साथ अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करता है—और संख्या और बल में कहीं अधिक चिल्लर पार्टी को मित्र बना लेता है|

हम फटकू के स्थान पर अपने आप को रखकर देख सकते हैं| स्त्री होने के नाते, या गरीब होने के नाते, हमारे किसी शारीरिक अथवा मानसिक विशेषता या विलाक्षणता के कारण (जैसे चमड़ी का रंग) क्या हमारे साथ कोई भेदभाव हो रहा है? हम उस भेदभाव का मुकाबला कर पा रहे हैं अथवा नहीं? क्या हमें और मजबूती चाहिए? और मजबूती पाने के लिए बहुआयामी परिवर्तन एक बेहतर रास्ता साबित हो सकेगा| जिनका कोई सहारा नहीं है, या जो अपनी मदद खुद करना चाहते हैं, ऐसे फटकू जैसे बच्चों के लिए भी बहुआयामी परिवर्तन अपनाना अच्छा विकल्प है|

कॉर्पोरेट 2006

इस मूवी में कॉर्पोरेट जगत की, एक दूसरे का गला काटने वाली, प्रतिस्पर्धा का चित्रण है| इस कॉर्पोरेट जगत में काम कर रहे लोगों के जीवन में ऐसा समय भी आता है, जब वे निराशा के बोझ से दब रहे होते हैं| यहाँ निशिगंधा सेनगुप्ता (बिपाशा बासु) रितेश साहनी (के के मेनन) को अपने बुरे दिनों की याद दिला रही है| वह अपनी असफलताओं से निराश हो चुकी थी, आत्मह्त्या के कगार पर थी| उस समय रितेश ने उसे सहारा देकर बचा लिया| रितेश को उसके जीजा ने भी अपनी कम्पनी में नौकरी देकर सहारा दिया| जीजा के अहसानों का बदला रितेश को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा| सहारे की यह तलाश कभी-कभी हमें रूढ़ियों और अंधविश्वास की और घसीट लेती है, जैसा कि दूसरे दृश्य में देखा जा सकता है| मारवाह (राज बब्बर) का अंधविश्वास कम होने के बदले बढ़ता चला जाता है|

क्या हम भी ऐसी किसी समस्या से जूझ रहे हैं, जिसके कारण हमारा जीवन निराशा के गर्त में चला गया है? क्या हम भी किसी सहारे की तलाश में हैं? परेशानी में पड़े कॉर्पोरेट जगत के बड़े से बड़े व्यक्ति को भी अपने लिए और अपने सहयोगियों के लिए बहुआयामी परिवर्तन आजमाना चाहिए|





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