पहले चरण का समापन

क्या हम दूसरे चरण में जाने के लिए तैयार हैं?

यह पहले चरण का आखिरी अध्याय है, और हम दूसरे चरण में जाने के लिए उत्सुक होंगे? परंतु क्या हम दूसरे चरण में जाने के लिए तैयार हैं? क्या हमने पहले चरण का लक्ष्य पा लिया है? वह लक्ष्य जो पहले अध्याय में बताया गया है—लेकिन यहाँ उस लक्ष्य की चर्चा हम कुछ विस्तार से करेंगे। क्या हम अपने में कोई परिवर्तन अनुभव कर पा रहे हैं? परिवर्तन की परिभाषा, हम अपने-अपने ढंग से करेंगे। इसलिए इस अध्याय के शुरू में ही परिवर्तन का मतलब स्पष्ट कर देना जरूरी है।

क्या हम अपने में कुछ अंतर पा रहे हैं?

परिवर्तन, छोटा या बड़ा, कैसा भी हो सकता है

बहुआयामी परिवर्तन को एक सप्ताह तक अपनाने के बाद, क्या हम अपने में कोई परिवर्तन अनुभव कर पा रहे हैं? इस प्रश्न के कई उत्तर हो सकते हैं।

☞ हम अपने में सकारात्मक परिवर्तन स्पष्ट रूप से देख सकते हैं।

❐ स्पष्टीकरण—परिवर्तन सकारात्मक है, मतलब अच्छी दिशा में है, और स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। इसका अर्थ हुआ, बहुआयामी परिवर्तन के पहले चरण को हमने सफलतापूर्वक पार कर लिया है। इसके बावजूद, हमें इस परिवर्तन की जांच करना जरूरी है। क्या यह परिवर्तन सही दिशा में है?

☞ परिवर्तन बहुत मामूली है—या कुछ भी परिवर्तन नहीं लगता है।

❐ स्पष्टीकरण—कुछ भी परिवर्तन न लगने, या मामूली परिवर्तन लगने के दो अर्थ हो सकते हैं। या तो परिवर्तन है ही नहीं, या परिवर्तन होने पर भी हम उसे पहचान नहीं पा रहे हैं। इन दोनों संभावनाओं के बीच भेद करने के लिए भी हमें परिवर्तन की दिशा समझना जरूरी है।

 

परिवर्तन की दिशा को जांचना

ऊपर के चित्र पर क्लिक करें| क्या हमारे जीवन की दिशा बदली है? क्या हम शांति और स्थिरता की ओर चल पड़े हैं? परिवर्तन की गहनता या तीव्रता से भी अधिक, उसकी दिशा को देखना जरूरी है। दिशा जांचने के लिए, हमें कुछ नीचे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने पड़ेंगे।

क्या हमारे जीवन की दिशा बदली है?

☞ पहले जो बातें हमें कड़वी लगती थीं, क्या अब वही बातें कम कड़वी लगने लगी हैं?

❐ स्पष्टीकरण—कड़वे शब्द तो हर किसी को कड़वे ही लगेंगे। परंतु हमें वे कम या अधिक कड़वे लग सकते हैं।

☞ अधिक कड़वे लगने का अर्थ: हमें कोई बात इतनी अधिक कड़वी लगती हैं, हम उसे भूल नहीं पाते हैं। मतलब वे शब्द हमेशा के लिए याद हो जाते हैं—और एक बुरा प्रभाव हमारे काम पर और हमारे मन पर छोड़ जाते है।

☞ कम कड़वे लगने का अर्थ: हमें वही बात इतनी कम कड़वी लगने लगी है, हम उसे जल्दी भूल सकते हैं। इस प्रकार से उस बात का कोई बुरा प्रभाव हमारे काम पर या हमारे मन पर नहीं पड़ रहा है। क्योंकि हमारे काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है, इसलिए हम उस बात को जल्दी भूल रहे हैं—जैसे कपड़ों पर कोई गंदगी गिर जाने पर हम उसे झटक कर गिरा देते हैं।

✓ किशोर आठवीं कक्षा में था। वह बचपन में पोलिओ का शिकार हुआ था, जिससे उसका एक पैर कमजोर था। इसकी भरपाई करने के लिए, किशोर पढ़ाई में सबसे आगे रहने की कोशिश करता था। परंतु अगर किसी ने उसे लंगड़ा कह दिया, किशोर घर आकर अपना कमर बंद करके बैठ जाता था। उस दिन उसके लिए पढ़ाई कर पाना या दूसरा कोई काम कर पाना असम्भव होता था।

किशोर ने बहुआयामी परिवर्तन अपनाया। पहले चरण के बाद ही, उसे अपने अंदर बदलाव महसूस हुआ। उसे सहपाठी अभी भी लंगड़ा कहकर चिढ़ाते थे। यह शब्द किशोर को अभी भी बुरा लगता था। लेकिन कम बुरा लगता था। और इतना कम बुरा लगता था कि अब किशोर घर जाकर अपने सब काम और पढ़ाई कर पाता था। इसलिए वह भूल जाता था कि किसी ने उसे लंगड़ा कहकर चिढ़ाया था।

क्या हम छोटी समस्याओं को बड़ा करके देखना छोड़ चुके हैं?

क्या मामूली छाती में दर्द को हम हृदयरोग समझ बैठते हैं? क्या हम मामूली खांसी को तपेदिक, और मामूली बुखार को टायफायड समझ बैठते हैं? घर के किसी सदस्य को घर लौटने में थोड़ी देर होने पर हम चिंता करने लगते हैं| कुछ समस्या होती है और कुछ हम उसे बढ़ा लेते हैं|ऐसे कितने ही उदाहरण दिए जा सकते हैं|

☞ क्या छोटी-छोटी बातों से अब हम कम परेशान हो रहे हैं? क्या हमारा धैर्य बढ़ रहा है?

✓ एक व्यक्ति बहुआयामी परिवर्तन का पहला चरण पूरा कर चुका था, और दूसरे चरण के लिए आया था। लेकिन उस व्यक्ति को मेरा कई घंटे इंतजार करना पड़ा। बातों-बातों में उसने बहुआयामी परिवर्तन का असर मुझसे साझा किया| वह बहुत बदल गया था। पहले वह छोटी-छोटी बातों से बहुत परेशान हो जाता था। उस दिन मेरा कई घंटे शांति से इंतजार करता रहा| बहुआयामी परिवर्तन से पहले तो वह गुस्से से बिफर जाता, चिल्लाने लगता, और फिर उठकर चल देता। इतने घंटे किसी का भी इन्तजार कर पाना उसके लिए असंभव होता|

❐ स्पष्टीकरण—छोटी-छोटी दिक्कतों से हर किसी का सामना होता है। कभी बिजली चली जाती है। कभी घर में कोई बीमार हो जाता है। गाड़ी सवेरे स्टार्ट नहीं होती है या रास्ते में टायर पंचर हो जाता है। कोई चीज खोजते रह जाते हैं—जैसे चाभी, कहाँ रखी थी ध्यान ही नहीं आता है। ऑफिस पहुँचने में देर हो रही है, पर सड़क पर जाम है। बस या ट्रेन छूट गई है, अब क्या करें? इस प्रकार की रोजाना आने वाली दिक्कतों का सामना करने में हमें, क्या अब कम परेशानी हो रही है?

क्या बड़ी मुश्किलों का सामना भी अब हम कर सकेंगे?

बड़ी परेशानियों को सामने देखकर हम अकसर अपना रास्ता बदल देते हैं| उन परेशानियों का सामना करने के बजाय, अपना मुख दूसरी ओर कर लेते हैं| बहुत सारे लोग गंभीर बीमारियों का भी इलाज नहीं करते हैं| ब्लड प्रैशर इसमें प्रमुख है क्योंकि इसके लक्षण बहुत देर से आते हैं| कुछ लोग तो मधुमेह और तपेदिक जैसे रोगों का इलाज भी टाल देते हैं| बीमारियों के अलावा भी उदाहरण दिए जा सकते हैं| नौकरी अच्छी हो लेकिन मेहनत अधिक हो तो भी हम टालने की कोशिश करते हैं| बच्चों को, खास तौर पर लड़कियों को, पढ़ाई के लिए बाहर भेजने में भी हम कतराते हैं| प्रमोशन के साथ बदली हो तो भी टाल देते हैं|

☞ लंबे समय से चल रही मुश्किलें क्या हमें, अब पहले से कम परेशान—या परेशान नहीं कर रही हैं?

✓ एक स्त्री ने शादी के कई सालों के बाद फिर से पढ़ाई शुरू की थी। उसकी एक तीन वर्ष की बेटी भी थी। घर का काम, पढ़ाई, और बेटी की जिम्मेदारी स्त्री पर भारी पड़ी, और उसका पुराना पीठ दर्द फिर से शुरू हो गया। वह पढ़ाई छोड़ने का सोच रही थी, तभी उसने बहुआयामी परिवर्तन को अपनाया। पहला चरण समाप्त होते-होते, पीठ दर्द ठीक हो गया। पढ़ाई वह, घर का काम करते-करते, करने लगी। अपने जीवन की बड़ी-बड़ी मुश्किलों के बारे में, उसका नजरिया बिलकुल बदल गया। चिंताएँ समाप्त हो गईं। वह एम बी ए में अच्छे नंबरों से पास हुई।

❐ स्पष्टीकरण—कई तरह की परेशानियाँ लंबे समय तक हमारे ऊपर हावी हो सकती हैं। गरीबी और बीमारी इनमें प्रमुख हैं। हम अपंगता से पीड़ित हो सकते हैं—या फिर किन्हीं पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हो सकते हैं। मेरा कद छोटा है, और छोटे कद के लोग जीवन में सफल नहीं हो सकते। मेरा रंग काला है, और काले लोगों को अच्छा जीवन-साथी नहीं मिलता। ऐसी वास्तविक या काल्पनिक अड़चनों का सामना कर पाना बहुत बार कठिन होता है। क्या बहुआयामी परिवर्तन हममें एक आशा की किरण जागा रहा है? क्या हमारा नजरिया बदल रहा है, और लंबे समय से चली आ रही कोई दिक्कत क्या हमें अब कम परेशान कर रही है?

☞ क्या पहले मुश्किल लगने वाले काम अब हमारे लिए आसान हो गए हैं?

✓ एक इंजीनियरिंग का विद्यार्थी, जब भी पढ़ने बैठता था, उसके दिमाग में इधर-उधर की बातें आती थीं। पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता था। वह साथ में पढ़ने वाली लड़कियों के बारे में सोचता रहता था, लेकिन क्लास में उन लड़कियों से बात भी नहीं कर पाता था। बहुआयामी परिवर्तन अपनाते ही उसका मन पढ़ाई में लगने लगा, और लड़कियों से बातें करना उसके लिए सहज हो गया।

✓ एक कर्मचारी अपने ऊपर वालों से सहज होकर बात नहीं कर पाता था। उनके सामने हाँ-हाँ करता रहता था, लेकिन बाद में सोचता था कि वे किस बारे में बात कर रहे थे? बहुआयामी परिवर्तन अपनाते ही, यह स्थिति बदल गई। वह सीधे जनरल मैनेजर को रिपोर्ट देने लगा। ऊपर वाले उसके काम और व्यवहार से खुश हो गए। कुछ दिन के बाद उसकी तरक्की भी हो गई।

क्या हम आत्महत्या की सोच को पीछे छोड़ चुके हैं?

विश्व में लगभग आठ लाख लोग आत्महत्या के कारण मरते हैं, जिसका लगभग छठा हिस्सा भारत में है| आत्महत्या करने वालों का एक बड़ा हिस्सा युवा और मध्य-आयु वर्ग के लोगों का होता है| पराजय या भारी नुकसान, मानसिक रोग, असाध्य रोग, और बेरोजगारी के कारण अधिकतर लोग आत्महत्या का सोचते हैं| इनमें से अधिकतर कारणों को दूर किया जा सकता है| बहुआयामी परिवर्तन के पहले चरण के अंत तक, आत्महत्या का विचार रखने वाले लगभग सभी लोग, अपनी परेशानियों को दूर कर पाने का विश्वास पा लेते हैं, और आत्महत्या की सोच को पीछे छोड़ देते हैं|

✓ एक व्यक्ति का नौकरी में मन नहीं लगता था। वह बार-बार नौकरी छोड़ देता था। उसके घर की आर्थिक स्थिति पहले से ही खराब थी—और अधिक बिगड़ती जा रही थी। वह आत्महत्या करने की सोच रहा था। बहुआयामी परिवर्तन के पहले चरण के अंत में, आत्महत्या जैसा विचार उसके मन से निकल गया।

क्या आपसी झगड़ों को सुलझा पाने का विश्वास पैदा हुआ है?

बहुआयामी परिवर्तन आपसी संबंधों में सुधार लाने का राज-मार्ग माना जाना चाहिए| क्योंकि बहुआयामी परिवर्तन की मदद से हम अपने आप को नियंत्रित कर सकते हैं, और दूसरों को बेहतर समझ सकते हैं| यहाँ एक उदाहरण देना उचित होगा| अगर हम किसी व्यक्ति को प्रतिदिन एक महीने तक केवल मुस्कराकर हैलो बोलेंगे तो शायद वह हमारा मित्र बन जाएगा| इसके विपरीत अगर हम किसी व्यक्ति को एक दिन खाने पर बुलाएंगे, और उसके बाद उसकी तरफ नजर भी नहीं डालेंगे, तो उस व्यक्ति के मन में हमारे प्रति कोई जगह नहीं बनेगी| इसका मतलब हैं कि संबंधों को बनाने के लिए और बनाए रखने के लिए स्थिरता जरूरी है—जिसके लिए अपने पर नियंत्रण जरूरी है| अपने पर नियंत्रण होगा तो हम धीरे-धीरे अपने मन की बात दूसरों को समझा सकते हैं, और दूसरों के मन की बात समझ सकते हैं| अपने व्यक्तिगत लक्ष्यों के साथ-साथ, हम अपने परिवार, समाज, राष्ट्र, और पर्यावरण से जुड़े लक्ष्यों की तरफ भी कदम बढ़ाते हैं| कुल मिलाकर हम आपसी संबंधों में सुधार का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं—चाहे वह परिवार के साथ संबंध हों, समाज के साथ संबंध हों, या फिर पर्यावरण के साथ संबंध हों|

✓ सुनेत्रा कुछ कम पढ़ी थी और गरीब परिवार में पली थी। उसके पति की अच्छी नौकरी थी। पति के सहकर्मियों और उनकी पत्नियों का महिला के घर आना-जाना होता था। पर सुनेत्रा उनसे सहज होकर बात नहीं कर पाती थी। चुपचाप बैठी रहती थी या हाँ-हूँ में जवाब देती थी। पति-पत्नी में अकसर इस बात को लेकर झगड़ा हो जाता था। बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के बाद सुनेत्रा सबके सामने खुल गई। उसे गाने का शौक था, और खाना भी वह बहुत अच्छा बनाती थी। इन गुणों के कारण वह जल्दी हो बहुत लोकप्रिय हो गई।

क्या तम्बाकू का प्रयोग छोड़ पाने का विश्वास पैदा हुआ है?

तम्बाकू छुड़ाना मुश्किल है, इस आम धारणा के विपरीत, बहुआयामी परिवर्तन तम्बाकू छुड़ाना आसान मानता है| बहुआयामी परिवर्तन के पहले चरण में ही तम्बाकू पूरी तरह से छोड़ देना जरूरी है| अगर कोई व्यक्ति तम्बाकू छोड़ने के लिए राजी नहीं है तो वह व्यक्ति बहुआयामी परिवर्तन नहीं अपना सकता है| तम्बाकू का उपयोग करने वाले लगभग सभी लोग, तम्बाकू छोड़कर बहुआयामी परिवर्तन अपना लेते हैं|

✓ एक दंपति में बेहद मनमुटाव था। पति सिगरेट का शौकीन था, जो पत्नी को पसंद नहीं था। पत्नी ताना देते हुए कहती थी, “तुम मेरे लिए सिगरेट भी नहीं छोड़ सकते हो?” पति का कहना था कि वह कई बार कोशिश कर चुका था, पर आदत से मजबूर था। अंत में, बहुआयामी परिवर्तन को अपनाते ही, पति महाशय ने दस साल की सिगरेट की आदत को छोड़ दिया।

क्या सादा खाना खाकर काम चला पाने का विश्वास पैदा हुआ है?
क्या नियमित व्यायाम कर पाने का विश्वास पैदा हुआ है?

बहुआयामी परिवर्तन हमारी रोजाना की सामान्य क्रियाओं और कार्यों में, सोची समझी रणनीति के अनुसार, किया गया परिवर्तन है—जिससे हम आसानी से अपने लक्ष्यों को प्राप्त करते हुए एक बड़े और मनचाहे परिवर्तन की ओर बढ़ सकते हैं| इन सामान्य क्रियाओं में खान-पान और शारीरिक व्यायाम भी शामिल हैं|

संतुलित भोजन करना एक लक्ष्य हो सकता है| नियमित शारीरिक व्यायाम एक लक्ष्य हो सकता है| तम्बाकू और शराब का सेवन बंद कर देना एक लक्ष्य हो सकता है| अपने मन को शांत रखना और तनाव का मुकाबला करना एक लक्ष्य हो सकता है| अपनी आर्थिक स्थिति सुधारना और अपने लिए एक अच्छा घर बनाना एक लक्ष्य हो सकता है| अपने सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को सुदृढ़ करना भी एक लक्ष्य हो सकता है| इन सभी का बीमारियों से गहरा संबंध है, और इन लक्ष्यों को पाकर हम बीमारियों से ऊपर उठ सकते हैं| बीमारियों को काबू करना असंभव लग सकता है, परन्तु बहुआयामी परिवर्तन द्वारा यह पूरी तरह से संभव है|

❐ स्पष्टीकरण—हममें बहुत सी कमजोरियाँ या बुरी आदतें हो सकती हैं। मधुमेह के रोगी मीठा खाने के शौकीन हो सकते हैं। कुछ लोग महिलाओं के सामने भी अपशब्द बोलने और गालियां देने से अपने को नहीं रोक पाते हैं। बहुआयामी परिवर्तन के पहले चरण को सफलतापूर्वक पूरा करने का अर्थ है कि हम अपनी इन कमजोरियों से ऊपर उठ पा रहे हैं।

☞ क्या हम कुछ नया कर पा रहे हैं, या अपनी दिनचर्या में कुछ बदलाव ला पा रहे हैं?

✓ एक महिला का वजन बढ़ रहा था। उसके लिए घूमना जरूरी था, पर महिला घूमने के लिए समय नहीं निकाल पाती थी। बहुआयामी परिवर्तन के बाद महिला घूमने के लिए समय निकालने लगी।

❐ स्पष्टीकरण—हम बहुत सारे नए काम करना चाहते हैं, पर उन कामों के लिए समय और ताकत नहीं जुटा पाते हैं। हम नई किताबें पढ़ना चाहते हैं, पर नींद आने लगती है और हम सो जाते हैं। सैर करना शुरू करने के लिए तो समय न होने का बहाना आम-तौर पर दिया जाता है। बहुआयामी परिवर्तन हमें नए कामों के लिए समय और ताकत जुटाने में मदद करता है। अगर हम कुछ नया कर पा रहे हैं, इसका अर्थ हुआ,बहुआयामी परिवर्तन का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा हो गया है।

 

यह परिवर्तन अगर पहले आ जाता तो कितना अच्छा होता!

बाकी डॉक्टर यही इलाज क्यों नहीं करते?

यह सवाल कई बार पूछा जाता है कि बाकी डॉक्टर यही इलाज क्यों नहीं बताते हैं| खास तौर पर यह सवाल वे पूछते हैं, जिन्हें बहुत दिन परेशान रहने के बाद, अचानक बहुआयामी परिवर्तन द्वारा आराम मिल रहा होता है| वही लोग यह अफसोस भी जाहिर करते हैं कि बहुआयामी परिवर्तन उन्हें पहले क्यों नहीं मिला| अगर हमारे मन में भी यही सवाल उठ रहे हैं, तब हमारा पहला चरण पूरा हो चुका है|

✓ एक अधेड़ उम्र की महिला को दमा की तकलीफ थी। 11 जुलाई 2006 को शाम छः बजे के लगभग उसने अपने छोटे बेटे से मोबाइल पर बात की। बेटा मुंबई में था, और जब बात हुई उस समय मुंबई की लोकल में बैठा था। कुछ ही देर में टीवी पर मुंबई की लोकल गाड़ियों में बम फूटने की खबरें आना शुरू हो गईं। महिला बेटे को फोन मिलाती रही। घबराहट के मारे उसका बुरा हाल था—पर नेटवर्क बिजी था। लगभग दो घंटे बाद ही उसे पता चल पाया, उसका बेटा सही सलामत था। पर इसके बाद भी बेचैनी बनी रही, और दमा बढ़ गया। दमा के कारण कई महीने परेशान रहने के बाद, महिला ने बहुआयामी परिवर्तन को अपनाया, और उसका दमा ठीक हो गया।

लगभग बीस वर्ष पुराना दमा ठीक होने से महिला आश्चर्यचकित थी। वह मुझसे जब भी मिलती थी, तभी यह पूछती कि ऐसा इलाज उसे पहले क्यों नहीं मिला? वह यह भी पूछती कि बाकी डॉक्टर ऐसा इलाज क्यों नहीं कर रहे? मेरा उत्तर होता था कि बहुआयामी परिवर्तन एक नवीनता है। बाकी के डॉक्टर जो मेडिकल कॉलेज में उन्हें पढ़ाया गया है, वही इलाज कर रहे हैं।

❐ स्पष्टीकरण—हमारी तकलीफ में एकाएक सुधार देखकर, या सुधार की उम्मीद देखकर—क्या हमारे मन में ये प्रश्न पैदा हो रहे हैं। ऐसा इलाज हमें पहले क्यों नहीं मिला? बाकी के डॉक्टर ऐसा इलाज क्यों नहीं कर रहे हैं? और क्या हमें लग रहा है, ये परिवर्तन अगर पहले हो जाते तो अच्छा होता? इस प्रकार के प्रश्नों का मतलब है, हमने बहुआयामी परिवर्तन का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है।

क्या अब हमें पहले जैसी तकलीफ नहीं होगी?

क्या पहले की तकलीफों को भूल पाने का विश्वास जाग चुका है?

बहुआयामी परिवर्तन के पहले चरण के दौरान हमें पहले जैसी तकलीफ होनी बंद हो जाती है| मतलब तकलीफ तो होती है, परन्तु वह पहले जैसी नहीं होती है| यह विश्वास भी जमने लगता है कि अब पहले जैसी तकलीफ कभी नहीं होगी| क्योंकि अब पहले जैसी ताकलीफ नहीं होगी, इसलिए हम पहले की तकलीफ को भूल सकते हैं| दर्द-भारी पुरानी घटनाओं को भूलने में थोड़ा समय लगेगा, परन्तु उन घटनाओं से जुड़े दर्द को भूलना हम तुरंत शुरू कर सकते हैं| इसका महत्त्व इतना अधिक है कि दूसरे चरण की शुरुआत ही—पिछले जीवन से जुड़े दर्द को भूल जाना—इस चर्चा से की गई है|

❐ स्पष्टीकरण—बुरी घटनाओं या मुसीबतों को आने से शायद हम नहीं रोक सकते हैं। हम कहेंगे, रोकने की कोशिश तो कर सकते हैं। पर हम एक और भी कोशिश कर सकते हैं—वैसी ही घटनाओं से हमें पहले जैसी तकलीफ न हो। घटनाओं पर नियंत्रण हम शायद न कर पाएँ, लेकिन अपनी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने की कोशिश हमें अवश्य करना चाहिए।

बारहवीं की परीक्षा में फेल होने के बाद, एक विद्यार्थी ने ट्रेन के सामने कूदकर जान दे दी। बारहवीं में फेल होने के बाद, दूसरे विद्यार्थी की प्रतिक्रिया बिलकुल अलग थी। उसने मन को एकाग्र किया। मन लगाकर पढ़ना शुरू किया, और अगले वर्ष अच्छे नंबरों से पास होकर दिखाया।

❐ स्पष्टीकरण—ऊपर के दोनों विद्यार्थियों की प्रतिक्रिया अलग क्यों थी? यह समझना जरूरी है—क्यों एक ने जान दे दी, और दूसरे ने दिल लगाकर पढ़ाई की?

☞ फेल होने के बाद एक को लगा, जीवन में अब कुछ भी बाकी नहीं है। उसे बहुत तकलीफ हुई। इतनी तकलीफ हुई कि उसने अपनी जान ले ली।

☞ फेल होने के बाद दूसरे को लगा, अभी तो मेरा पूरा जीवन बाकी है। उसे कम तकलीफ हुई। वह अपने आप को संभाल सका, और अगले साल सफल हुआ।

❐ स्पष्टीकरण—ऊपर के उदाहरणों में से हम किसे चुनेंगे? क्या हम मुसीबत के समय अपने आप को संभालना चाहेंगे? इसके लिए जरूरी हैं, आने वाली मुसीबत के समय हम अपनी तकलीफ को काबू में रखें। उसे बढ़ने न दें, तभी हम अपने आप को संभाल पाएंगे।

यहाँ पर हम अपने आप से एक सवाल और पूछेंगे। क्या हमें अब पहले जैसी तकलीफ होगी? या अब हमें पहले जैसी तकलीफ नहीं होगी? अगर इसका जवाब है, हमें पहले जैसी तकलीफ नहीं होगी, और हम अपने आप को संभाल सकेंगे—इसका अर्थ है, हमने बहुआयामी परिवर्तन के पहले चरण को सफलतापूर्वक पार कर लिया है।

 

क्या हम अपने आप को संभालना सीख गए हैं?

भविष्य में कभी भी अपने आप को संभालना जरूरी हो सकता है

अपने आप को कैसे संभालना है? और विपरीत परिस्थितियों में उठकर कैसे खड़े होना है? क्या हम याद रख सकेंगे, और पहले चरण के इन सभी औजारों को भविष्य में लागू कर सकेंगे? पहले चरण का उद्देश्य है, शांति और स्थिरता की प्राप्ति। मतलब हम अपने आप को संभालना सीख लें। जिससे भविष्य में (किसी भी मुसीबत के समय) हम पहले चरण को फिर से अपने जीवन में लागू कर सकें, और अपने आप को फिर से संभाल सकें। इस विश्वास को पाने के बाद ही स्थिरता मिलेगी| अगर हमने अपने आप को संभालना सीख लिया है, हमने पहला चरण सफलतापूर्वक पार कर लिया है—और हम दूसरे चरण में जाने के लिए तैयार हैं।





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