बहुआयामी परिवर्तन—मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक आशा

स्वस्थ मन से ही स्वस्थ शरीर का निर्माण सम्भव है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य के बिना शारीरिक स्वास्थ्य सम्भव नहीं है। इसका एक और पहलू भी, हमारे सामने आ रहा है। अस्वस्थ मन के कारण अनेक शारीरिक रोग पैदा हो जाते हैं। मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के बीच की इस कड़ी को हम कम करके आंकते हैं, और इसलिए विशेषज्ञों द्वारा भी मानसिक बीमारियों के बोझ को कम करके आंका जा रहा है। और योजनाकार हमारी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरतों को कम करके आंक रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की खस्ता हालत इसी का परिणाम है|

पिछड़े देशों की खस्ता-हाल मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं

लैंसेट नामक मेडिकल जर्नल में वर्ष 2007 और 2011 में आर्थिक दृष्टि से पिछड़े देशों की मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सा व्यवस्था के बारे में कुल मिलाकर बारह लेखों की दो श्रृंखलाएं छपी थीं। इन लेखों को पढ़कर निराशा हाथ लगती है। तीसरे विश्व के देशों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं खस्ता हालत में हैं, और उनके सुधरने की कोई संभावना नहीं लग रही है। इन मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में बच्चे और युवा सबसे अधिक उपेक्षित हैं, जबकि उन्हें ही इन सेवाओं की सबसे अधिक जरूरत है—क्योंकि उनके सामने पूरी जिंदगी पड़ी है, जिसमें उन्हें मानसिक रोग का बोझ ढोना पड़ेगा। हमारी सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं में मानसिक रोगों की अवहेलना की जाती है—जिससे सबसे अधिक जरूरतमंद लोगों को मानसिक रोगों का उपचार सबसे कम मिल पाता है।

मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने की बात की जाती है। परंतु इन सेवाओं को मजबूत बनाने के रास्ते में रुकावटें हैं: मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं, सरकारों की और जनसाधारण की, प्राथमिकता नहीं हैं। मानसिक स्वास्थ्य के लिए सरकारों के पास पैसा नहीं है, और इस क्षेत्र में प्रशिक्षित चिकित्सकों और नर्सों की भारी कमी है। इस क्षेत्र के सभी संसाधन, जैसे कि प्राइवेट और सरकारी मानसिक रोग विशेषज्ञ, बड़े-बड़े शहरों में केंद्रित हैं। जाहिर है कि धनवानों को ही मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं मिल पाती हैं—और जनसामान्य जिसे इन सेवाओं की अधिक जरूरत है, इनसे अधिकांशतः वंचित रह जाता है। इतना ही नहीं जनसामान्य तक पहुंचने वाली मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर भी गम्भीर प्रश्न चिन्ह लगाए जा सकते हैं। यह सच्चाई है कि इन देशों में जनसामान्य को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से लगभग पूरी तरह से वंचित माना जा सकता है। और तो और, इन रुकावटों के पार जाना भी असंभव जान पड़ता है।

जाहिर है कि इन रुकावटों के पार जाने के लिए, हमें मानसिक स्वास्थ्य और इससे जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में कुछ नया सोचना होगा। तभी इन स्वास्थ्य सेवाओं का खुद का स्वास्थ्य सुधर सकेगा।

मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की दवाइयों पर अति निर्भरता

हमारे देश की स्थिति

मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में मानसिकता बदलने की जरूरत

ऊपर तीसरे विश्व के बारे में जो भी लिखा गया है, वह सब भारत पर भी पूरी तरह से लागू होता है। हमारे देश में जनसामान्य को मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं जीपी याने जनरल प्रैक्टीशनर द्वारा दी जाती हैं, जो होम्योपैथी, आयुर्वेद, या और किसी भी पैथी का पढ़ा हो सकता है, या फिर बिना किसी डिगरी वाला नीम हकीम भी हो सकता है। केवल जीपी ही नहीं मानसिक रोग में एम डी भी, मानसिक रोगों के उपचार के लिए केवल दवाइयों पर निर्भर रहते हैं। स्टीफान एक्स ने इसका एक मर्मांतक चित्र, अपनी 2014 की पुस्तक ईटिंग ड्रग्स में उकेरा है। मानसिक रोगों की दवाऐं बनाने वाली कंपनियां, नैतिकता की परवाह किए बिना अपने तरकश का हर तीर, अपनी दवाइयों की खपत बढ़ाने के लिए करती है, जिनमें डॉक्टरों को महंगे उपहार देना शामिल है। इन दवाओं के लाभों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, और दुष्प्रभावों की अनदेखी की जाती है। डॉक्टर हर कदम पर अनैतिक कम्पनियों का साथ देते हुए नजर आते हैं। एक बार दवाई का पर्चा लिखवाकर, महीनों या सालों तक उसी पर्चे पर लिखी दवाई मरीज खरीदते और खाते रहते हैं। लोरेजापाम जैसी घातक दवाओं के साथ भी यही होता हुआ पाया गया है। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय व्यवसायिक असोसिएशनें भी मानसिक रोग की दवाओं के लाभों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने में और दुष्प्रभावों को नकारने में दवा बनाने वाली कम्पनियों के साथ हाथ मिलाती हुई दिखाई देती हैं। कुल मिलाकर एक भयंकर संकट की स्थिति नजर आती है।

आग से झुलस कर मर गए अट्ठाइस मानसिक रोगियों के शव| दुर्घटना के समय वे लोहे की जंजीरों से बंधे हुए थे|

इस दुर्व्यवस्था का परिणाम कई बार अति-भयंकर रूप में सामने आता है। अगस्त 2001 में कुछ ऐसा ही तामिलनाडु के एरवाडी गांव में हुआ। जहां, लोहे की जंजीरों से बांध कर रखे गए, 28 मानसिक रोगी अचानक आग लग जाने से जलकर भस्म हो गए। इक्कीसवीं शती की शुरुआत का यह हादसा बेहद दर्दनाक था। उच्चतम न्यायालय ने इसकी जांच के आदेश दिए। इसके बाद, उच्चतम न्यायालय ने, अपने और आदेशों के साथ-साथ, भारत सरकार को केवल मानसिक रोगियों को रखने के लिए बड़ी संख्या में अस्पताल स्थापित करने का भी हुक्म दिया। इन विशेष अस्पतालों वाले आदेश के बारे में प्रश्न उठाए गए, और उच्चतम न्यायालय की आलोचना भी हुई। लेकिन न्यायालय तो केवल सरकार और विशेषज्ञों द्वारा दिए गए प्रमाणों और तर्कों के आधार पर ही अपना आदेश सुना रहा था। इसलिए आलोचना तो सरकार और विशेषज्ञों की और उनकी सोच की होनी चाहिए। आज दुनिया भर में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं के साथ पूरी तरह से जोड़ने की बात हो रही है—लेकिन मानसिक रोग के उपचार के लिए, आम आदमी की सोच आज भी पागलखानों और मैंटल हॉस्पिटल के दरवाजों तक पहुँच कर ही रुक जाती है।

मानसिक स्वास्थ्य को अलग-थलग रखने की यह सोच बदल रही है।

एरवाडी कांड के बाद एक दशक से अधिक बीत गया है। लगता है कि समय बदल रहा है, उसके साथ हमारी सोच बदल रही है, और 2014 में भारत सरकार ने मानसिक रोगों से मुकाबले के लिए नई नीतियों की घोषणा की है। इस घोषणा में कुछ सही दिखने वाले सवाल उठाए गए हैं: मानसिक रोगों के उपचार को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ कैसे जोड़ा जाए? हमारे देश में मानसिक रोगों से जूझने के प्रभावशाली तरीके क्या हो सकते हैं? देहातों और शहरों में काम कर रहे अलग-अलग स्तर के डॉक्टरों को मानसिक रोगों का प्रमाण के ऊपर आधारित उपचार करने के लिए कैसे प्रेरित किया जा सकता है? भारत सरकार का यह घोषणापत्र सात अलग-अलग क्षेत्रों में आगे कदम बढ़ाने की बात करता है—इनमें ये क्षेत्र भी शामिल हैं: मानसिक रोगों से बचाव, मानसिक स्वास्थ्य का संवर्धन, मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने के लिए सामुदायिक भागीदारी, मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में विशेष रूप से प्रशिक्षित डॉक्टरों, नर्सों, और दूसरे अमले की संख्या में बढ़ोतरी।

क्या मानसिक स्वास्थ्य की लड़ाई हम घर-घर और गाँव-गाँव में उपलब्ध साधनों द्वारा लड़ सकते हैं?

मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में सामुदायिक प्रयत्न और उनका महत्व।

सामुदायिक भागीदारी को औपचारिक मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ सफलतापूर्वक जोड़कर देखा गया है, जिससे इन सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता दोनों बढ़ते हैं। सामुदायिक भागीदारी द्वारा स्वतंत्र रूप से अनौपचारिक मानसिक स्वास्थ्य सेवा देने की कोशिशें भी सफल हुई हैं। भारत में एक बड़े स्तर पर ऐसे प्रयास चल रहे हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य के बारे में हमारे दृष्टिकोण को विस्तार देने में सफल हुए हैं।

देखा गया है कि परिवारजन, स्कूली शिक्षक, वालंटीयर्स, और रोगी खुद भी, दूसरे रोगियों को निर्धारित उपचार ध्यानपूर्वक देने में मददगार सिद्ध हो सकते हैं। बेसिकनीड्स नाम की संस्था ने कर दिखाया है कि सही दिशा में उन्नति, रोजगार, और आय में वृद्धि द्वारा भी मानसिक रोगी अपने रोग से छुटकारा पा सकता है। हमें यह सीख लेने की जरूरत है कि मानसिक स्वास्थ्य की ओर कई रास्तों से आगे बढ़ा जा सकता है, और इन भिन्न-भिन्न रास्तों को खोलने की, उनकी संख्या बढ़ाने, और उन्हें सुगम बनाने की जरूरत है। जब हम इन रास्तों पर चलना शुरू करेंगे, मानसिक रोगों से जुड़ी अनेक भ्रांतियां अपने आप दूर हो जाएंगी।

इस प्रकार के सामुदायिक प्रयत्न कैसे पूरे समाज के ही मानसिक स्वास्थ्य को आगे ले जाते हैं, और कैसे ये सामुदायिक प्रयत्न सारे मरीजों का अलग-अलग इलाज करने से बेहतर हैं—इसका एक सैद्धांतिक मॉडेल माईकेल ओलिवर ने लगभग बीस वर्ष पहले पेश किया था। आज मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में हो रहे ये सामुदायिक प्रयत्न उस मॉडल को दृढ़ता देने की दिशा में बढ़ रहे हैं। एक-एक मरीज का इलाज करने की तुलना में, सामुदायिक प्रयत्न अधिक तर्कसंगत हैं, कम-खर्चीले, और अधिक लोगों को अधिक लाभ देने वाले हैं। इतना ही नहीं, ये सामुदायिक प्रयत्न समाज में विकलांग या रोग-पीड़ित व्यक्तियों की अधिसंख्या से भी हैरान और परेशान नहीं होते हैं। न ही ये सामुदायिक प्रयत्न औपचारिक उपचारों की कीमत और जटिलता से झिझकते या शरमाते र्हैं। ये सामुदायिक प्रयत्न शायद मानसिक रोगों को डिमैडिकलाइज करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

बहुआयामी परिवर्तन एक सामुदायिक प्रयत्न है|

बहुआयामी परिवर्तन एक आदर्श सिद्ध हो सकेगा

बहुआयामी परिवर्तन मानसिक स्वास्थ्य के लिए और मानसिक रोगों से मुकाबला करने के लिए एक आदर्श साधन है। यहां तक कि यह बाकी के सारे उपलब्ध उपचारों से कहीं अधिक बेहतर है। मानसिक स्वास्थ्य का संवर्धन और मानसिक रोगों से बचाव, ये दोनों ही बहुआयामी परिवर्तन के द्वारा भली-भांति सम्भव हैं। मानसिक रोगों के उपचार के लिए, सामुदायिक भागीदारी द्वारा, बहुआयामी परिवर्तन को प्रयुक्त किया जा सकता है—इस प्रकार से प्रशिक्षित मानसिक रोग चिकित्सकों और नर्सो की जरूरत में भारी कमी लाना सम्भव है। मानसिक रोगियों को जीवन कुशलतापूर्वक जीने के लिए प्रशिक्षित करने का अनुमोदन किया गया है। बहुआयामी परिवर्तन अपने आप में ही इस कुशलता का प्रशिक्षण है।

बहुआयामी परिवर्तन का मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्थान

इस परिपेक्ष्य में, हम बहुआयामी परिवर्तन को देखते हैं। सबसे पहला सवाल तो यही उठेगा—बहुआयामी परिवर्तन एक-एक करके मरीजों को ठीक करने का रास्ता है, या यह एक सामुदायिक प्रयत्न है? शायद बहुआयामी परिवर्तन को इन दोनों ही नजरों से देखा जा सकता है। परंतु बहुआयामी परिवर्तन एक मेडिकल उपचार की श्रेणी में नहीं आता है, इसलिए इसे एक सामुदायिक प्रयत्न की संज्ञा देना ही बेहतर होगा। बहुआयामी परिवर्तन को सामुदायिक प्रयत्न की श्रेणी में रखने के और भी कारण हैं। यह बेसिकनीड्स के विकास और उन्नति के एजेंडा पर खरा उतरता है—तीसरा चरण देखें। इस परिवर्तन को स्कूल शिक्षकों, वालंटीयरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्य सेवा कर्मियों, एवं बहुत से अन्य व्यक्तियों द्वारा लागू किया जा सकता है। इस परिवर्तन को कितने भी लोग एक साथ अपना सकते हैं, इसलिए इसके पक्षधरों को इससे परेशान या चिंतित होने की जरूरत नहीं है कि समाज में मानसिक रोगियों का प्रतिशत या कुल संख्या कितनी अधिक है। यह परिवर्तन मानसिक रोग की दवाओं के बिना अच्छा काम करता है, जैसे एंटीडिप्रैसेंट दवाओं की जरूरत नहीं होती है। लेकिन दवाएं देना जरूरी हो तो दवाओं को इस परिवर्तन के साथ जोड़ना भी आसान है। मेडिकल कॉलेजों से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक, बहुआयामी परिवर्तन सामान्य चिकित्सकों, मानसिक रोग विशेषज्ञों, नर्सों, व स्वास्थ्य सेवकों द्वारा मानसिक रोगियों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है—इस प्रकार से यह मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं के साथ जोड़ने का एक आदर्श साधन साबित हो सकेगा।

हम निश्चिंत होकर बहुआयामी परिवर्तन अपना सकते हैं, अगर ...

सामान्य मानसिक रोगों जैसे अवसाद यानी डिप्रैशन, चिंता और पैनिक अटैक, ऑबसेसिव कम्पल्सिव न्यूरोसिस, पी टी एस डी याने पोस्ट ट्रौमेटिक स्ट्रैस डिसॉर्डर इत्यादि में हम बिना किसी झिझक के बहुआयामी परिवर्तन अपना सकते हैं। और हमें कोई दवाई लेने की भी जरूरत नहीं है। यही बात तम्बाकू-मुक्ति के लिए भी लागू है। अगर चिकित्सक हमारी किसी बीमारी को फंक्शनल बता रहे हैं, तब भी यही बात लागू है। ऐसी फंक्शनल बीमारियों के कुछ उदाहरण हैं: पेट-दर्द, छाती में दर्द, हाथ या पैर में दर्द, खांसी, सांस फूलना, चक्कर आना इत्यादि। ध्यान रहे कि डॉक्टरी सलाह के बाद ही किसी बीमारी को फंक्शनल की संज्ञा दी जाए।

परंतु हमें मानसिक रोग के लिए दी जा रही दवाइयों को छोड़ने की जरूरत अवश्य ही होगी, अगर हम पहले से ही ऐसी कोई दवाई ले रहे हैं। सवाल यह उठेगा कि इन दवाओं को कैसे छोड़ें? अधिक जानकारी के लिए यह अध्याय देखिए: कुछ और महत्वपूर्ण सलाह

शराब और दूसरे नशों (तम्बाकू को छोड़कर) के आदी, बहुआयामी परिवर्तन कैसे अपनाएं?

शराब और दूसरे नशों का बहुआयामी परिवर्तन एक अत्यंत उत्तम उपचार है। लेकिन शराब और कई दूसरे नशों को एकाएक छोड़ देना खतरनाक हो सकता है। इस खतरे से बचकर नशा छोड़ने के लिए, डॉक्टरों की निगरानी में कुछ दवाएं लेने की जरूरत हो सकती है। इसलिए नशा-मुक्ति के लिए डॉक्टरी सलाह लें और साथ-साथ बहुआयामी परिवर्तन अपनाएं।

क्या हम बीच-बीच में कई दिनों के लिए शराब छोड़ देते हैं, और छोड़ने से हमें कोई परेशानी नहीं होती है? क्या हम केवल रात के समय ही कुछ पेग शराब के पीते हैं, और दिन भर शराब को हाथ नहीं लगाते हैं? अगर इन दोनों ही प्रश्नों का उत्तर हां है, तो हम शराब के आदी नहीं हैं, और हम बिना डॉक्टरी सलाह के शराब छोड़ सकते हैं। लेकिन अगर इन प्रश्नों का उत्तर ना में है (मतलब हम सवेरे से ही शराब पीने के लिए उत्सुक हो जाते हैं, और शराब पिए बिना हमें चैन नहीं मिलता है और हमारे हाथ पैर कांपने लगते है)—इसका अर्थ हुआ कि हम शराब के आदी हैं, और हमें केवल डॉक्टर की निगरानी में ही शराब छोड़ने की सलाह दी जाती है।

दूसरे नशों जैसे कोकेन, अफीम, या हेरोइन के आदी व्यक्ति भी बहुआयामी परिवर्तन अपना सकते हैं| लेकिन वे केवल डॉक्टर की देख-रेख में ही, इन नशीले पदार्थों को छोड़ने की कोशिश करें|

कुछ रोगों में डॉक्टरी दवाएं लेना जरूरी हो सकता है

कुछ रोगों में बहुआयामी परिवर्तन के साथ-साथ दवाएं लेना जरूरी हो सकता है, जैसे स्किटजोफ्रेनिया और मिरगी यानी इपीलेप्सी। लेकिन इन रोगों में भी कम दवाओं से और कम मात्रा में दवाओं से बीमारी काबू में रहती है। इसलिए बहुआयामी परिवर्तन इन बीमारियों में दवाइयों का प्रयोग कम करने का अच्छा उपाय है। लेकिन डॉक्टरी निगरानी में ही इस उपाय को अपनाएं।

बहुआयामी परिवर्तन—मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक आशा

इस परिशिष्ट के शुरू में, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को आगे बढ़ाने के रास्ते की अपारगम्य लगने वाली रुकावटों की बात हुई थी। बहुआयामी परिवर्तन इन रुकावटों को पारगम्य बनाने का माध्यम सिद्ध हो सकेगा, यह आशा करनी चाहिए। नीचे के वीडियो में हम देख सकते हैं कि आत्महत्या के कगार पर खड़ा एक व्यक्ति किस प्रकार से अपना आत्मविश्वास ओर जीने की इच्छा पा लेता है| कुछ और वीडियो के लिए यह अध्याय देखिए| अनेक वर्षों से डिप्रैशन और चिंता की दवाइयाँ ले रहा व्यक्ति भी इन दवाओं को आसानी से छोड़ सकता है, और मानसिक रोग के ठप्पे से पीछा छुड़ाकर, आगे बढ़ सकता है|





मार्गदर्शिका