न्यायदृष्टि रखते हुए, अपने को और दूसरों को माफ कर देना

न्यायदृष्टि का अर्थ

न्यायदृष्टि का अर्थ है सबको एक दृष्टि से देखना, और सबके साथ एक जैसा व्यवहार करना| ध्यान देने की बात है कि सब के अन्दर, हमें अपने आप को भी सम्मिलित कर लेना जरूरी है| न्यायदृष्टि रखने वाला एक दुकानदार एक छोटे बच्चे को ठगने की या किसी अंधे व्यक्ति को कम चिल्लर लौटने की कोशिश नहीं करेगा| न्यायदृष्टि रखने वाले माँ-पिता अपने लड़कों और लड़कियों में भेद-भाव नहीं करेंगे| वे दोनों को एक जैसी शिक्षा देंगे, और दोनों को एक जैसी गुणवत्ता के कपड़े और खाना देंगे| न्यायदृष्टि रखने वाला शिक्षक अपने विद्यार्थियों में कोई भेदभाव नहीं करेगा| ऐसे और भी अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं|

बहुआयामी परिवर्तन के परिपेक्ष्य में न्यायदृष्टि रखना क्यों जरूरी है?

न्यायदृष्टि के बिना स्थिरता संभव नहीं है

एक बड़े सामाजिक धरातल पर समझने की कोशिश करते हैं| अन्याय के कारण संघर्ष बढ़ेगा, और स्थिरता कम होगी| इसके विपरीत अगर समाज में न्याय होगा तो इससे स्थिरता बढ़ेगी| परन्तु हमारे लिए व्यक्ति के स्तर पर न्यायदृष्टि का महत्व समझना है| इसके लिए नीचे कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं| हमें अपने घर और काम की जगह पर न्यायदृष्टि रखना पड़ेगा, तभी हम अपने जीवन की स्थिरता बढ़ा सकेंगे| नहीं तो हम अनेक परेशानियों और बीमारियों का शिकार हो सकते हैं|

बहुआयामी परिवर्तन के परिपेक्ष्य में माफ कर देना क्यों जरूरी है?

माफ किए बिना शायद जीवन असह्य हो जाएगा|

अपनी और दूसरों की गलतियों को हम माफ कर देते हैं। इतना ही नहीं, हम दुनिया में फैली हुई बहुत बड़ी-बड़ी बुराइयों को अनदेखा भी कर देते हैं। माफ करने के बाद ही हम आगे बढ़ सकते हैं| अगर हम माफ नहीं करेंगे तो जीना दूभर हो जाएगा| क्योंकि हम ऐसे लोगों से घिर जाएंगे, जिन्हें हम अपराधी समझते हैं, और माफ नहीं कर पा रहे हैं| हमारे आस-पास के लोग भी हमें अपराधी मान रहे होंगे, और माफ नहीं कर पा रहे होंगे| फिर शायद वही होगा जो सुकेशी के साथ हुआ था (देखें: जीवन में स्थिरता और शांति का व्यावहारिक महत्व)| नीचे दिए गए उदाहरणों में भी हम देख सकेंगे कि आस-पास के लोगों को माफ कर देने के बाद ही जीवन पटरी पर लौटता है|

दीपा ने अपने बेटों का कान पकड़ना शुरू कर दिया है

वह समझ गई है कि गलतियों को नजर-अंदाज करना भी एक अन्याय है

दीपा के दो बेटे थे। एक दसवीं और दूसरा बारहवीं में पढ़ता था। दीपा हर बात में अपने दोनों बेटों का पक्ष लेती थी। वही दीपा अपनी सास को छोटी-छोटी बात पर जली-कटी सुनाने से नहीं चूकती थी। दीपा के व्यवहार से उसकी सास उदास रहती थी, और दीपा के दोनों बेटे जिद्दी होते जा रहे थे। परंतु दीपा का पति विवेक कुछ कर नहीं पाता था। आखिर वही हुआ, जिसका डर था। बड़ा बेटा बारहवीं में फेल हो गया, और उसने आत्महत्या करने की कोशिश की। दीपा गहरे सदमे में थी। उसे लग रहा था कि उसके बड़े बेटे की जिंदगी बरबाद हो गई है। विवेक ने समझाने की कोशिश की, पर दीपा अपनी गलती समझ नहीं पाई। उसका कहना था, हर माँ अपने बच्चों की गलतियों को नजर-अंदाज कर देती है। इसलिए वह कुछ गलत नहीं कर रही थी।

पूरे परिवार ने बहुआयामी परिवर्तन को अपनाया। इसके बाद दीपा का व्यवहार बदल गया। अब वह लड़कों को उनकी गलती प्यार से समझाती है, और उन कमियों को दूर करने में मदद करती है। सास के साथ भी अब वह अच्छे से पेश आती है। दीपा का कहना है कि मनुष्य के अंदर की अपने को बदल पाने की ताकत के बारे में उसके विचार बदल गए हैं। पहले वह समझती थी, कोई भी इंसान जैसा है वैसा ही रहेगा। इसलिए वह अपने बच्चों में बदलाव लाने की कोई कोशिश नहीं करती थी। लेकिन अब वह अपने बच्चों में बदलाव लाने की और उन्हें अच्छा बनाने की कोशिश करती है, क्योंकि उसे लगता है कि हर इंसान अपने आप को बदल सकता है। इस समझ ने दीपा के बच्चों के प्रति व्यवहार में बड़ा परिवर्तन ले आया है।

दीपा बच्चों से दबती थी। इसका बदला वह सास को दबा कर और उसे खरी-खोटी सुनाकर निकालती थी। विवेक बच्चों को एक अलग प्रकार की सीख देना चाहता था, लेकिन बच्चे उसकी बात सुनते नहीं थे। घर में एक खींचातानी का वातावरण था। अब दीपा ने बच्चों से दबना बंद कर दिया है। इससे उसका मन शांत रहता है, और उसे सास को दबाने की जरूरत नहीं लगती है। विवेक भी अब बच्चों से खुलकर बात करता है। बच्चे खुश रहते हैं, और पढ़ाई में अपना दिल लगाते हैं। विवेक की माँ भी अब हंसती-बोलती है। दीपा और विवेक के घर में अब सद्भाव का वातावरण है।

न्यायदृष्टि का अर्थ है सबको एक नजर से देखना, और किसी के साथ पक्षपात नहीं करना। ऊपर के उदाहरण में हमने देखा, दीपा अपने बच्चों का पक्ष लेती थी और सास के साथ बुरा व्यवहार करती थी। वह सास के साथ तो साफ तौर पर अन्याय करती थी। लेकिन अगर ध्यान से देखेंगे तो नजर आएगा कि दीपा अपने बच्चों के साथ भी अन्याय ही करती थी। क्योंकि वह अच्छी सीख नहीं देती थी, जो उन बच्चों की बहुत बड़ी जरूरत थी। घर में अच्छा वातावरण नहीं था, जिससे बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लग सकता था। घर में अच्छा वातावरण कैसे रखना होता है, बच्चे यह भी नहीं सीख पा रहे थे।

असत्य के धरातल पर बनी बड़ी से बड़ी इमारत ढह जाती है

शराब और पार्टियों में डूबे महेंद्र को लगता था उसे कुछ नहीं होगा

महेंद्र एक बड़ा सरकारी अफसर था। पगार अच्छी थी, और ऊपर की आमदनी भी तगड़ी थी। बड़ा सा सरकारी बंगला, सरकारी गाड़ी, और नौकर-चाकर—मतलब किसी बात की कमी नहीं थी। रुतबे के कारण केवल एक फोन खटखटाने से सभी काम हो जाते थे। इतनी सब सुख-सुविधाओं के बावजूद महेंद्र के जीवन में एक खालीपन था। महेंद्र के दोनों लड़के भी अच्छी नौकरी में थे, लेकिन बाप बेटों में बनती नहीं थी। यहाँ तक कि बेटे बाप का मुंह भी देखना नहीं चाहते थे। महेंद्र की पत्नी सावित्री एक सीधी-सादी घरेलू स्त्री थी। महेंद्र जोर डालता था कि उसकी पत्नी भी बेटों से कोई संबंध न रखे—इसलिए सावित्री पति से छिपाकर बेटों को फोन करती थी, और बेटों, बहुओं, तथा पोते-पोतियों से उसका प्रत्यक्ष मिल पाना बहुत कम होता था। इसके अलावा भी महेंद्र ने सावित्री पर कई बंधन लगाए हुए थे, पर सावित्री कुछ कह न पाती थी। पिता दीनानाथ भी महेंद्र के साथ ही रहते थे। वे अस्सी वर्ष से ऊपर थे, और बीमार रहते थे—परंतु महेंद्र अपने पिता से सीधे मुंह बात नहीं करता था। महेंद्र का रुझान देखकर नौकर भी दीनानाथ की बातों को अनसुना कर देते थे। महेंद्र की अपने पिता से नाराजगी पुरानी थी। महेंद्र जब छोटा था, उस समय दीनानाथ उसके साथ सख्ती से पेश आते थे, और कभी-कभी पिटाई भी कर देते थे। महेंद्र जब अठारह साल का हुआ, उसकी माँ चल बसी। एक वर्ष के अंदर दीनानाथ ने महेंद्र का विवाह सावित्री से कर दिया। महेंद्र उस समय शादी नहीं करना चाहता था, और सावित्री तो उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं थी—पर दीनानाथ के अनुसार घर चलाने के लिए एक स्त्री की जरूरत थी, और इस काम को सावित्री ने बहुत कुशलता से किया। पर दीनानाथ और महेंद्र में टकराव शुरू हो गया, जो बंद होने का नाम नहीं ले रहा था। दीनानाथ ने कई बार महेंद्र से माफी भी मांगी, पर महेंद्र के सिर पर तो एक भूत सवार था। ऑफिस में भी महेंद्र को कोई पसंद नहीं करता था। पर सब उससे डरते थे, क्योंकि वह एक सख्त अफसर था। उसकी सख्ती में ईमानदारी नहीं थी, बल्कि वह अपना फायदा देखकर काम करता था। केवल जी-हुजूरी करने वाले कर्मचारी ही उसे खुश रख सकते थे। ऑफिस से लौटने के बाद महेंद्र अपना अधिकतर समय दोस्तों के साथ सिगरेट और शराब पीने और जुआ खेलने में बिताता था।

एक शाम अचानक महेंद्र को सीने में दर्द उठा, और उसे अस्पताल ले जाया गया। यह दर्द हार्ट अटैक के कारण था, और बहुत मुश्किल से महेंद्र की जान बच पाई। चार दिन के बाद अस्पताल से छुट्टी हो गई। घर में अधिकतर समय, महेंद्र को अपनी पत्नी के साथ बिताना पड़ता था। दीनानाथ भी बीच-बीच में उसका हाल पूछने के लिए आ जाते थे। सिगरेट, शराब, और जुआ प्रतिबंधित हो गया था। उसे सादा खाना खाने, सैर करने, और गुस्सा न करने की सलाह दी गई थी। पर वह छिप-छिपकर सिगरेट पीता था, और हर समय नाराज रहता था। वह अपने हार्ट अटैक के लिए भी सावित्री और दीनानाथ को ही दोषी ठहराता था। ऑफिस जाना बंद था। दोस्तों का आना-जाना और पार्टियाँ भी बंद थीं। महेंद्र का समय काटे न कटता था—यहाँ तक कि उसे अपने जीवन का अंत निकट लगने लगा था।

आखिर में, महेंद्र ने बहुआयामी परिवर्तन को अपनाया। केवल हफ्ते भर में, महेंद्र को जीवन में स्थिरता लगने लगी—ऐसी स्थिरता को उसने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था, और ऐसी स्थिरता पाने के लिए वह अनेक वर्षों से जूझ रहा था। सिगरेट, शराब, और पार्टियाँ, इस स्थिरता को पाने के लिए ही थीं। सावित्री और दीनानाथ को हर बात के लिए दोष देना भी, इस स्थिरता को पाने के लिए ही था। महेंद्र को और पैसे की जरूरत नहीं थी, फिर भी वह हर तरह से पैसा कमा रहा था—उसे समझ आ गया कि ऑफिस में अपने अधीनस्थ लोगों को दबाना और रिश्वत लेना भी इसी स्थिरता को पाने के लिए ही था। महेंद्र को अपनी गलतियों का अहसास हो गया था, और उन गलतियों को दूर करने की ताकत भी मिल गई थी।

अपने घर के सदस्यों से शुरुआत करें और फिर आगे बढ़ें

महेंद्र को अपनी स्थिरता को आगे ले जाना था। इसके लिए घर में और ऑफिस में सद्भाव का वातावरण बनाना जरूरी था। महेंद्र ने घर से शुरुआत की। उसने अपने दोनों बेटों को उनके परिवार के साथ बुलाया। सावित्री और दीनानाथ भी वहाँ मौजूद थे। सबके सामने महेंद्र ने अपनी गलतियों को स्वीकार किया। सिगरेट, शराब, और जुए पर निर्भरता ठीक नहीं थी, और इस प्रकार की पार्टियों से घर का वातावरण बिगड़ रहा था। महेंद्र ने माना कि सावित्री एक बहुत अच्छी महिला थी, और उसने अपनी पत्नी के साथ अन्याय किया था। महेंद्र ने माना कि उसे दीनानाथ की पुरानी गलतियों को बहुत पहले भुला देना चाहिए था, और पिता को आदर देना चाहिए था। महेंद्र ने स्पष्ट किया कि पांचों अंगुलियाँ बराबर नहीं होती हैं, घर के सब लोग बराबर योग्यता के नहीं हो सकते हैं। इसलिए उसे यह बहुत पहले भुला देना चाहिए था कि सावित्री कम पढ़ी-लिखी और शक्ल-सूरत में साधारण थी। कुछ दिन के बाद महेंद्र ने ऑफिस जाना शुरू कर दिया। उसने जो घर में किया था, वही ऑफिस में भी किया। वह मेहनत और ईमानदारी से काम करने लगा है, और उसने लोगों पर गलत काम करने के लिए दबाव डालना बंद कर दिया। अधीनस्थ लोगों की कमजोरियों और गलतियों पर अब वह गुस्सा नहीं होता है, बल्कि समझाकर ठीक रास्ते पर ले आता है।

अब महेंद्र को उसके ऑफिस और विभाग में सब पसंद करते हैं। उसे एक अच्छा अफसर माना जाने लगा है। घर लौटने के बाद, महेंद्र अपने पिता और पत्नी के साथ समय बिताता है। घर के बागीचे की देखभाल में भी रोजाना कुछ समय देता है। अपने बेटों और बहुओं के साथ हँसता बोलता है, और पोते-पोतियों के साथ खेलता है। उसे सादा खाना स्वादिष्ट लगता है। उसका वजन घट रहा है, और स्वास्थ्य सुधर रहा है।

दिन भर में हम अनेक लोगों के साथ व्यवहार करते हैं। सभी की एक नजर से देख पाना, और उदारतापूर्वक उनकी गलतियों को माफ कर देना—यह परिवर्तन एकाएक अपने में ले आना, किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। इसलिए यह जरूरी है, हम अपने घर के सदस्यों से शुरुआत करें और फिर आगे बढ़ें।

 

क्या सजा देना जरूरी हो सकता है?

काम के प्रति ईमानदारी लाना जरूरी है|

ऊपर दिए गए उदाहरण में, दीपा अपने बेटों की हरेक गलती माफ कर देती है, और इसका बुरा असर होता है। जिसे माफी दी जा रही है, उस व्यक्ति को उसकी गलती का अहसास दिलाना जरूरी हो सकता है। गलती दोहरानी नहीं है—यह चेतावनी देना भी जरूरी हो सकता है। सजा देना भी जरूरी हो सकता है।

रामअवतार रेल विभाग में नौकरी करता था, और यूनियन का लीडर था—इसलिए कोई अफसर उसे कुछ नहीं कहता था। रामअवतार जब मर्जी आता था और जब मर्जी चला जाता था, और काम से उसका कुछ लेना-देना नहीं था। भीष्म की अधिकारी के रूप में नियुक्ति हुई, और पहली बार रामअवतार के बुरे दिन आ गए। भीष्म ने पहले उसे टोका, और फिर लिखित चेतावनी दे डाली। उसे बाद छुट्टी भी काटना शुरू कर दिया| बदला लेने के लिए, रामअवतार ने भीष्म के बारे में उलटी-सीधी अफवाहें फैलाना शुरू कर दिया। यूनियन की मीटिंग में वह भीष्म को खूब गालियाँ देता और उसका ट्रांसफर करवाने की मांग ऊपर भेजता था।

एक रात दो यूनियनों के बीच के झगड़े में एक व्यक्ति की मौत हो गई। इस घटना की जांच भीष्म को करनी थी। रामअवतार संदेह के घेरे में था, और यदि भीष्म चाहता तो उसे आसानी से फंसा सकता था। लेकिन भीष्म ने निष्पक्ष होकर जांच की, और रामअवतार को निर्दोष ठहराया। रामअवतार ने भीष्म के पैर पकड़ लिए, और माफी मांगने लगा। इसके बाद रामअवतार बिलकुल बदल गया, और उसने अपना काम ईमानदारी से करना शुरू कर दिया।

न्यायदृष्टि का अर्थ है कि हम व्यक्तिगत शत्रुता को भुला दें| लेकिन काम के प्रति ईमानदारी जरूरी है। भीष्म ने यही किया, और इसका अच्छा असर हुआ। अगर काम के प्रति ईमानदारी नहीं होगी तो सब जगह अव्यवस्था फैल जाएगी|

बड़ी चोट खाने से पहले ही अपने आप को बदल डालें

अपने और आस-पास के लोगों के प्रति ईमानदारी लाना जरूरी है|

ऊपर दिए गए उदाहरणों में, दीपा अपने बेटे द्वारा आत्महत्या के प्रयत्न के बाद संभलती है, और महेंद्र हार्ट अटैक होने के बाद संभलता है| लेकिन क्या बड़ी चोट खाना जरूरी है? समझदारी इसी में है कि हम वक्त रहते संभल जाएं, और अपने को बदलने का प्रयास शुरू कर दें|

इसके पहले के प्रयोगों में खतरा कम था| इस बारे में हम पिछले अध्याय में चर्चा कर चुके हैं| स्थिरता आगे ले जाने के लिए अपनी ताकत को पहचानना: यहाँ से प्रयोग कुछ मुश्किल हो रहे हैं| मतलब असफलता का खतरा बढ़ रहा है| अगले अध्यायों को पढ़ें| हमारी ताकत भी बढ़ रही है|

आस-पास के लोगों के प्रति अपने व्यवहार में धीरे-धीरे बदलाव लाएँ|





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