अब हम भी एक-एक करके सफलता की सीढ़ियां चढ़ सकते हैं

बहुआयामी परिवर्तन के परिचय पर फिर से आते हैं

मार्गदर्शिका के प्रारंभ में बहुआयामी परिवर्तन का परिचय दिया गया है। इसे फिर से पढ़ लेने की जरूरत है| यह परिचय इस प्रकार से शुरू होता है:

बहुआयामी परिवर्तन हमारी रोजाना की सामान्य क्रियाओं और कार्यों में, सोची समझी रणनीति के अनुसार, किया गया परिवर्तन है—जिससे हम आसानी से एक बड़े और मनचाहे परिवर्तन की ओर बढ़ सकते हैं|

लगातार घिसने से पत्थर पर भी रस्सी का निशान बन जाता है| कोई भी काम लगातार करने से, उस काम में महारत हासिल होती है| परन्तु हम कौन सा काम हाथ में लें, यह निश्चित करना पड़ेगा| अपनी जरूरत और अपनी क्षमताओं को ध्यान में रखना पड़ेगा, तभी हमें जो चाहिए वह हासिल हो सकेगा|

कोई भी काम लगातार करने के लिए, स्थिरता चाहिए| लेकिन केवल स्थिरता से काम नहीं चलेगा, साथ में असफलता के कारणों को समझने, और उसके अनुसार अपना रास्ता बदलने की ताकत भी चाहिए| बड़े लक्ष्य को पाने के लिए, बड़े लक्ष्य को छोटे-छोटे भागों में बांटकर, उन छोटे लक्ष्यों को एक-एक करके पाना पड़ता है|

बहुआयामी परिवर्तन हमें वह सभी कुछ देता है—अपने लक्ष्यों को पाने के लिए, जिसकी जरूरत है| इसे अपनाकर हमें स्थिरता मिलती है| हम क्या करें (और क्या न करें), यह निश्चित करने की क्षमता विकसित होती है| साथ ही साथ, असफलता के कारणों को समझाने और उसके अनुसार अपना रास्ता बदलने की ताकत पैदा होती है| इन सभी ताकतों को हम बहुत आगे ले जा सकते हैं| और असंभव लगने वाले लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं|

धीरे-धीरे आगे बढ़ें

स्थिरता आगे ले जाने के लिए अपनी ताकत को पहचानना: इस अध्याय को पढ़कर, हम अपनी ताकत को पहचानने का महत्व समझ चुके होंगे। कुछ छोटे-छोटे मगर जरूरी काम नियमितता से कर सकने के बाद, हमारा आत्मविश्वास बढ़ गया होगा। इस प्रकार के कामों के कुछ उदाहरण देखिए। हम सभी के लिए, खास तौर पर मधुमेह के रोगियों और मोटे व्यक्तियों के लिए, सैर करना छोटा मगर जरूरी काम है। एक आदमी के लिए, घर के कामों में अपनी पत्नी की मदद कर देना, जरूरी हो सकता है। ब्लड प्रैशर के रोगी के लिए, अपनी दवाई समय पर खा लेना जरूरी है। एक मां के लिए, अपने बच्चों को समय से स्कूल के लिए तैयार कर देना, और उनका डिब्बा बना देना जरूरी है। इन छोटे लगने वाले कामों को नियमितता से करने का महत्व कोई कम नहीं है|

अब हम कुछ बड़े कामों में सफलता की भी बात करेंगे। उदाहरण के लिए—व्यवसाय में सफलता कैसे प्राप्त करें? वैवाहिक जीवन में यदि कड़वाहट है, उसे कैसे दूर करें? पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी, अपने को कैसे ऊपर उठाएँ? सामाजिक जीवन में सफलता कैसे हासिल करें?

हम क्या करना चाहते हैं? यह फैसला करने के लिए हमें अपनी ताकत का अहसास होना जरूरी है। हम अपनी ताकत के अनुसार पहले एक छोटा लक्ष्य अपने सामने रखेंगे। उस लक्ष्य में सफलता के बाद हमारी ताकत बढ़ जाएगी और हम और बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ सकेंगे। सफलता की इन सीढ़ियों को चढ़ते समय, हमें हर कदम पर अपनी ताकत को पहचानता होगा, और उसी के अनुसार एक लक्ष्य अपने सामने रखना होगा।

एक बड़े लक्ष्य को भी, हमें छोटे-छोटे कदमों से तय करना पड़ता है। एक किशोर जो बड़ा होकर तैराकी में विश्व चैम्पियन बनना चाहता है, उसे पहले स्थानीय, क्षेत्रीय, और राष्ट्रीय स्तरों पर सफलता अर्जित करनी पड़ेगी। हर स्तर पर उसे अपनी ताकत को पहचानना होगा, और कमियों को दूर करना होगा, तभी बड़ी सफलता मिल पाएगी। यहां यह समझना जरूरी हो सकता है: ताकत को पहचानने का मतलब, कमजोरी या कमी को पहचानना भी है।

कुछ लोग लगातार आगे बढ़ते रहते हैं, और लंबा सफर तय करते हैं। हम अपने आस-पास ऐसे अनेकों उदाहरण देख सकते हैं। वे सभी व्यक्ति, अनेक दृष्टियों से अलग दिखेंगे, परंतु कुछ बातें सभी में एक जैसी होंगी। वे सभी स्थिरता के धनी होंगे, और सभी में अपनी ताकत को पहचानने और ताकत के अनुसार धीरे-धीरे आगे बढ़ने का गुण होगा। बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के बाद, हम भी इन सफल व्यक्तियों जैसे बन सकते हैं, और जीवन में बहुत आगे बढ़ सकते हैं।

अपने लिए कुछ बड़े लक्ष्य निर्धारित करें

बहुआयामी परिवर्तन का परिचय: इस अध्याय को फिर से पढ़ें| इसे पढ़ने के बाद हम अपने एक या एक से अधिक बड़े लक्ष्य निर्धारित कर सकेंगे| हमारे लक्ष्य कुछ इस प्रकार के हो सकते हैं:

  • क्या हम अपनी बीमारियों पर काबू चाहते हैं?
  • क्या हम अपनी कार्य-कुशलता बढ़ना चाहते हैं?
  • क्या हम पक्का करना चाहते हैं कि अब तम्बाकू या शराब जैसे नशों को फिर नहीं अपनाएंगे?
  • क्या हम पारिवारिक और सामजिक संबंधों को मजबूत बनाना चाहते हैं?
  • क्या हम खेलों में या और किसी क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय ख्याति पाना चाहते हैं?

अपने लिए लक्ष्य निर्धारित करने के बाद, उन्हें एक कागज पर लिख लें| कुछ दिन के बाद उस कागज को फिर से पढ़ें, और कुछ परिवर्तन करना हो तो कर लें| मन पक्का होने के बाद, उस लिस्ट को दीवार पर चिपका दें या टेबल पर कांच के नीचे रख दें| आगे चलकर हम इस लिस्ट में फिर से परिवर्तन कर सकते हैं|

सभी ताकतों को साथ-साथ आगे बढ़ाएं

निर्धारित लक्ष्यों को पाने के लिए क्या हमारे पास हैं और क्या नहीं है?

अधिकतर लक्ष्यों को पाने के लिए हमें शारीरिक और मानसिक बल, बेहतर रिश्ते, और भावनाओं की क्षमता चाहिए| इन चारों ताकतों का परिचय पहले दिया जा चुका है: देखें — स्थिरता आगे ले जाने के लिए अपनी ताकत को पहचानना|

जो ताकत नहीं है, उस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है

मानसिक या शारीरिक क्षमता की कमी, बहुत कम लोगों में लक्ष्य पूरा न हो पाने का कारण बनती है| अधिकतर लोगों में भावनाओं और सामाजिक संबंधों की ताकत कम होती है, जिसके कारण वे असफल हो जाते हैं| इसलिए हमनें से अधिकतर लोगों को अपनी भावनाओं और संबंधों में सुधार की ओर ध्यान देने की जरूरत होती है|

सभी प्रकार की ताकतों को साथ-साथ आगे बढ़ाएं

सभी ताकतों को बढ़ाए बिना, किसी भी क्षेत्र में, हम बहुत आगे नहीं जा सकते हैं। इस अध्याय में दिए गए उदाहरणों से यही स्पष्ट होता है। विजय में सारी अच्छाइयां हैं, परंतु वह पढ़ाई पर कम ध्यान देता है। इसके विपरीत, अंकित केवल पढ़ाई पर ध्यान देता है। विजय और अंकित दोनों को ही, अपनी-अपनी कमजोरियों को दूर करने की जरूरत है।

क्रिकेट, हॉकी, या फुटबाल जैसे खेलों का उदाहरण लेते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन खेलों में दम-खम की जरूरत होती है—पर केवल दम-खम से काम नहीं चलता है। किसी भी खेल में बहुत आगे जाने के लिए, भावनात्मक संतुलन और तेज दिमाग भी चाहिए। उन सभी खेलों में जहां एक टीम खेलती है, आपसी समझबूझ और आपसी रिश्तों का बड़ा महत्व होता है। मतलब कि खेलों में भी सभी प्रकार की ताकतों की जरूरत होती है।

यही बात, उद्योग जगत पर भी लागू होती है। तेज दिमाग, भावनात्मक संतुलन, और आपसी रिश्तों में समझदारी के बिना उद्यमियों का काम चल पाना भी नामुमकिन है। डॉक्टरों और इंन्जीनियरों के ऊपर भी यही सिद्धांत लागू होते हैं।

यह कहा जा सकता है कि हम सभी को सारी ही ताकतें अपने में विकसित करने की जरूरत है। हममें से कुछ के मन में, खास तौर पर विद्यार्थियों के मन में यह भावना आ सकती है: अभी हम पढ़ाई कर लें, और बाकी को बाद में देखेंगे। विद्यार्थियों की यह सोच बिल्कुल भी ठीक नहीं है, क्योंकि पढ़ाई में सफलता के लिए भी भावनात्मक संतुलन, शारीरिक स्वास्थ्य, और आपसी रिश्तों का बड़ा महत्व है।

शरीर को स्वस्थ कैसे रखें?

यह जानकारी शारीरिक क्षमता बढाने के बारे में न होकर, केवल शरीर को स्वस्थ रखने के बारे में है| शारीरिक क्षमता बढाने की जरूरत शारीरिक खेंलों और एथलेटिक्स में होती है, जबकि शारीर को स्वस्थ रखने की जरूरत हम सबको है|

इस मार्गदर्शिका के पहले चरण में ही, शरीर को स्वस्थ रखने की बारे में संकेत दिए गए हैं। शारीरिक व्यायाम की शुरुआत — इस अध्याय में शारीरिक व्यायाम के बारे में चर्चा शुरू की गई है। इसे फिर से पढ़ें। बहुआयामी परिवर्तन के मूल सिद्धांतों का पालन करते रहें, और इसके साथ-साथ सैर करना, साइकिल चलाना, या फिर हॉकी, फुटबाल, कबड्डी जैसा कोई खेल खेलते रहें। बूढ़े व्यकियों के लिए रोजाना सैर करना अच्छा है| मधुमेह के रोगियों के लिए भी रोज एक जैसा व्यायाम करने की सलाह दी जाती है| ब्लड प्रैशर, हृदय रोग, डाइबिटीज, और मोटापा इत्यादि से पीड़ित लोगों के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी है। यह बदलाव भी बहुआयामी परिवर्तन की मदद से एक बड़ी सीमा तक सम्भव है।

हम अपने शारीरिक सामर्थ्य को कितना आगे ले जा पाते हैं? यह हमारी उम्र, व्यवसाय, इच्छाशक्ति, किसी बीमारी की उपस्थिति, साधनों, और जरूरत के हिसाब से ही तय होगा।

भावनाओं पर नियंत्रण कैसे स्थापित करें?

जीवन में स्थिरता के लिए, और बहुआयामी परिवर्तन की सफलता के लिए, भावनाओं पर नियंत्रण स्थापित करना जरूरी है। इस मार्गदर्शिका में शुरू से ही, हम भावनाओं पर नियंत्रण की बात करते आ रहे हैं। भावनाओं को नियंत्रित करने के सभी बिंदुओं को यहां दोहराया जा रहा है।

इस मार्गदर्शिका के पहले और दूसरे चरण में दिए गए सुझाव भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए और तनाव को सीमित रखने के लिए, अत्यंत उपयोगी हैं| नियमित शारीरिक व्यायाम जरूरी है। सेक्स भी एक प्रकार की भावना है| इसलिए सेक्स क्रियाओं और भावनाओं पर नियंत्रण और सेक्स क्रियाओं में बारीकी लाए बिना, बाकी की भावनाओं पर नियंत्रण असंभव है| धीमा और नियंत्रित सांस और तनाव-मुक्ति का आसन, ये दोनों भी भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए उपयोगी हैं| पुराने जीवन की तकलीफ भूल जाना और अपनी ताकत को पहचानना भी जरूरी है| इन उपायों द्वारा, हमारी भावनाएँ बहुत हद तक नियंत्रण में रहेंगी।

विचारों और भावनाओं पर गहरी नजर रखना सीखें

रोजमर्रा के जीवन में विचारों और भावनाओं का सही चुनाव — इस अध्याय को पढ़ें| हर क्षण सही चुनाव करते रहने के लिए, हर पल भावनाओं पर नजर रखने की जरूरत होती है| विचार और भावनाएँ परस्पर जुड़ी हैं। इस अध्याय पर अमल करके हम अपने नियंत्रण को आगे ले जा पाएंगे।

भावनाएँ किसी गहरे कारण से जुड़ी हो सकती हैं।

ऊपर लिखे गए उपायों को अपनाने के बाद भी, हो सकता है कि हम अपनी भावनाओं को नियंत्रित न कर पा रहे हों। ऐसी दशा में, भावनाएँ किसी गहरे कारण से जुड़ी हो सकती हैं। और उन भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए हमारी सोच में एक बड़े बदलाव की जरूरत हो सकती है यहां कुछ ऐसे ही उदाहरण दिए जा रहे हैं।

सुनंदा आनंद से प्रेम करती थी, परंतु माता-पिता के दबाव के कारण उसे किरण से विवाह करना पड़ा। किरण छोटा व्यापारी था, इसलिए सुनंदा को घर का खर्च चलाने में भी कठिनाई होती थी। ऐसे में सुनंदा की दो साल की बेटी चल बसी। सुनंदा के ऊपर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा। उसने आत्महत्या की कोशिश की, लेकिन उसे बचा लिया गया। मौत के मुंह से निकलने के बाद, सुनंदा को लगा कि उसे अपने बचे हुए जीवन का सदुपयोग करना चाहिए। उसने वास्तविकता के अनुसार, अपने जीवन को ढालने की कोशिश शुरू कर दी। उसने किरण के साथ सहयोग करना शुरू किया, और अपने माता-पिता को माफ कर दिया। इस प्रकार से, अपनी सोच में बदलाव के द्वारा, सुनंदा अपनी भावनाओं से ऊपर उठ सकी।

सुदीक्षा के पति रोहन को फेफड़े का कैंसर था। एक वर्ष से अधिक जीने की कोई संभावना नहीं थी। कैंसर का इलाज महंगा था, जबकि सुदीक्षा की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। रोहन के जाने के पश्चात, उसे अपने दो छोटे बच्चों को भी पालना था। ऐसे में, सुदीक्षा और रोहन ने मिलकर तय किया कि कैंसर के इलाज पर अधिक खर्च नहीं करेंगे। यह एक मुश्किल निर्णय था, लेकिन मृत्यु के समय रोहन को संतोष था कि अपने परिवार के लिए जो कुछ कर सका उसने किया।

कुलदीप की इच्छा डॉक्टर बनने की थी, परंतु बारहवीं के बाद उसका किसी मेडिकल कालेज में प्रवेश नहीं हो पाया। कुलदीप बहुत उदास हो गया। उसका किसी भी काम में मन नहीं लगता था। कुलदीप की मां ने उसे समझाया। वह डॉक्टर बनकर लोगों की मदद करना चाहता था, लेकिन वह वकील या शिक्षक बनकर भी लोगों की सेवा कर सकता था। कुलदीप को मां की बात समझ आ गई, और उसने वकील बनने का तय कर लिया। इसके बाद वह दूने उत्साह से पढ़ाई में जुट गया।

विशाल होशियार था और समझदार भी। उसमें एक कमजोरी भी थी, वह थी बात-बात पर गुस्सा करना। अगर खाना उसकी पसंद का न हो तो वह गुस्सा हो जाता था। स्कूल में बच्चे उसे मोटा-मोटा कहकर चिढ़ाते थे, और वह मार-पीट पर उतर आता था। गुस्से के कारण, उसकी पढ़ाई पर बुरा असर हो रहा था। विशाल को यह बात समझ आ रही थी, और उसने अपने गुस्से को नियंत्रित करने का फैसला कर लिया। इस फैसले के बाद अगर कोई उसे मोटा कहकर चिढाने की कोशिश करता तो वह हंसकर अपने मोटापे को स्वीकार कर लेता था|उसने खाने पर नियंत्रण किया और फुटबाल खेलना शुरू किया| कुछ महीनों में उसका मोटापा गायब हो गया, और बच्चों ने उसे चिढाना बंद कर दिया|

शिव और उसका बेटा मिलकर व्यापार करते थे। घर में दो ही लोग थे। बेटे अनुज की शादी दीपिका से हो गई, तो दो से तीन लोग हो गए। केवल आठ महीने बाद ही, अनुज का एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया। शिव बहुत बूढ़ा हो चला था, और उसका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता था। ऐसे में उसे व्यापार का सारा काम अपने कंधों पर लेना पड़ा। दीपिका अनुज से बहुत प्यार करती थी। उसके ऊपर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा। फिर भी उसने शिव को संभालने की कोशिश की। वह शिव का बहुत खयाल रखती थी, और व्यापार की जिम्मेदारी धीरे-धीरे अपने ऊपर लेना चाहती थी। पर शिव दीपिका को देखकर दुखी हो जाता था। अंत में शिव ने दीपिका की दूसरी शादी करने का तय किया, और बड़ी खुशी से अपने हाथों से उसका कन्यादान किया। इस प्रकार से शिव ने अपने दुख को खुशी में बदल दिया।

योगिता का पति कश्यप बहुत गुस्से वाला था, और आगा-पीछा देखे बिना मार-पीट कर बैठता था। कई बार तो वह, बच्चों और योगिता पर भी हाथ उठा देता था। योगिता के माता-पिता को यह बिल्कुल भी पसंद नहीं था। वे चाहते थी कि योगिता कश्यप से अलग हो जाए। योगिता को भी अपने पति का व्यवहार पसंद नहीं था, लेकिन वह अपने माता-पिता पर आश्रित नहीं होना चाहती थी, और नहीं चाहती थी कि उसके बच्चे ननिहाल में रहकर बड़े हों। उसने सोचा कि कश्यप बच्चों से प्यार करता है, पढ़ाई में उनकी मदद करता है, नई-नई बातें सिखाता है, और हर तरह से उनका खयाल रखता है। उसने कश्यप के मारने-पीटने को माफ कर दिया, और समझा-बुझाकर उसे सही रास्ते पर लाने की ठानी। उसने आगे पढ़ने का भी तय किया, जिससे वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सके।

ऊपर के उदाहरणों में यह देखने को मिलता है कि भावनाओं को काबू करने के लिए और उदासी अथवा गुस्से जैसी भावनाओं को खुशी में बदलने के लिए, हमें अपनी सोच और जीवन की दिशा में गहरा बदलाव लाने की जरूरत हो सकती है। इस प्रकार का बदलाव लाना, आम तौर पर मुश्किल होता है—परंतु बहुआयामी परिवर्तन अपनाने वालों के लिए ऐसा बदलाव लाना आसान है।

बहुआयामी परिवर्तन को पूर्ण रूप से अपनाएँ

भावनाओं को पूरी तरह से नियंत्रित करने के लिए हमें बहुआयामी परिवर्तन को पूरी तरह से अपनाने की जरूरत होगी। जैसे-जैसे हम बहुआयामी परिवर्तन अपनाने की दिशा में आगे बढ़ते जाएंगे, और जैसे-जैसे हम अपने लक्ष्यों को पाते जाएंगे—हमारी स्थिरता बढ़ेगी, और हमारा अपने विचारों और भावनाओं पर नियंत्रण मजबूत होगा|

अगर इतना सब भी हमारे लिए काफी नहीं है तो क्या करें? — इस अध्याय में भी, उदासी, निराशा, एवं विचलित मन को काबू में करने के लिए कुछ उपाय सुझाए गए हैं। इन उपायों को भी अपने जीवन में लागू करके देखें। नींद की गुणवत्ता बढ़ाएं। लोगों से जुड़ने की कोशिश करें। अपनी ताकत बढ़ाएं, और हमारे अंदर जो भी कमजोरी दिखाई दे रही हो, उसे दूर करने की कोशिश करें।

अब हम विफलता का सामना कर सकते हैं, और सफलता पा सकते हैं — इस अध्याय में, हम विफलता का सामना करने का महत्व और इसका तरीका समझ सकते हैं। विफलता का सामना करना सीखने से, हमारा आत्मविश्वास बढ़ेगा, और हमें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण स्थापित करने में मदद मिलेगी।

सामाजिक संबंधों को कैसे सुधारें?

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। हम सभी के लिए, सामाजिक सम्बंध जरूरी हैं, लेकिन बहुत से लोग परिवार और समाज से जुड़े नहीं होते हैं। हम अगर जुड़े भी हों, तो भी हमें अपने सामाजिक सम्बंधों को सुदृढ़ करने की जरूरत हो सकती हैं। यहां सामाजिक सम्बंधों को सुधारने के बारे में कुछ सुझाव दिए जा रहे हैं।

शांति और स्थिरता का व्यवहारिक महत्त्व — इस परिशिष्ट को फिर से पढ़ें। शांति और स्थिरता के बिना, हमारा विश्वास दूसरों पर से उठ जाता है, और हमारे सम्बंधों की नींव खोखली हो जाती है। हमारे सामाजिक सम्बंध अगर टूट चुके हैं, हमें उन्हें फिर से बनाने की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए हमें नीचे लिखे बिंदुओं को अपनाने की जरूरत हो सकती है।

अपने व्यवहार में स्थिरता लाएं

यहाँ हम अपने अन्दर की स्थिरता की नहीं, अपने बाहर से दिखाई देने वाले व्यवहार की बात कर रहे हैं|

लम्बे समय तक डिप्रैशन से पीड़ित रहने के बाद, सुनील ने बहुआयामी परिवर्तन को अपनाया, और वह डिप्रैशन से उबरने लगा। सुनील ने रमेश को अपना मित्र बनाने की ठानी, जो उसके ही ऑफिस में काम करता था। कुछ सोचकर उसने रमेश को सपरिवार अपने घर बुलाया, और घर पर उसकी खूब आवभगत की। सुनील को लगता था कि रमेश बदले में उसे घर आने का निमंत्रण देगा, परंतु सुनील की यह अपेक्षा पूरी नहीं हुई, और उसके रमेश के साथ संबंध कुछ आगे नहीं बढ़े। यह देखकर सुनील ने एक नई रणनीति अपनाई। अब वह रमेश से जब भी मिलता, उससे मुसकराकर एक दो बातें करता और आगे बढ़ जाता। कई महीने बीतने के बाद ही यह रणनीति कारगर साबित हुई। रमेश और सुनील के बीच गाढ़ी दोस्ती हो गई।

खाने पर अपने घर बुलाने मात्र से किसी के साथ हमारी दोस्ती नहीं हो जाती है। सामाजिक संबंधों को बनाने और बढ़ाने में समय लगता है। सुनील ने लगातार रमेश की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। उसने कभी भी रूखापन या कड़वाहट नहीं दिखाई। हम अपना व्यवहार अच्छा रखने की कोशिश करते हैं—लेकिन हमारी परेशानियों के चलते बीच-बीच में रूखापन आ ही जाता है। यह बीच-बीच का रूखापन, हमारे सामाजिक संबंधों के लिए एक बड़ी रुकावट है। सामाजिक संबंधों को बढ़ाने के लिए स्थिरता की जरूरत होती है। परिशिष्ट-एक में सुकेशी का उदाहरण फिर से पढ़ें। अनियमित व्यवहार के कारण सुकेशी की मित्रता बहुत थोड़े समय तक ही चल पाती थी।

अपने व्यक्तित्व के मजबूत बिंदुओं को आगे बढ़ाएं

सुनेत्रा कुछ कम पढ़ी थी और गरीब परिवार में पली थी। उसके पति की अच्छी नौकरी थी। पति के सहकर्मियों और उनकी पत्नियों का महिला के घर आना-जाना होता था। पर सुनेत्रा उनसे सहज होकर बात नहीं कर पाती थी। चुपचाप बैठी रहती थी या हाँ-हूँ में जवाब देती थी। पति-पत्नी में अकसर इस बात को लेकर झगड़ा हो जाता था। बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के बाद सुनेत्रा सबके सामने खुल गई। उसे गाने का शौक था, और खाना भी वह बहुत अच्छा बनाती थी। इन गुणों के कारण वह जल्दी हो बहुत लोकप्रिय हो गई।

हमारे व्यक्तित्व में कोई न कोई प्रभावशाली बिंदु अवश्य होंगे। इन बिंदुओं को आगे बढ़ाएं। अपने व्यक्तित्व में कुछ न कुछ आकर्षण पैदा करने की कोशिश करें। इस आकर्षण के द्वारा, हम अपने संबंधों को आगे ले जा सकेंगे।

दूसरों के लिए उपयोगी बनें

अखिलेश बैंक में अफसर था। बहुआयामी परिवर्तन के बाद उसका दमा ठीक हो गया। पहले उसका बहुत सा समय, बीमारी के कारण बेकार चला जाता था, इसलिए अखिलेश को खालीपन लगने लगा। उस समय बैंक ऑनलाइन हो रहे थे, और बहुत से कर्मचारियों को ट्रेनिंग की जरूरत थी। अखिलेश ने अपने साथियों को ट्रेनिंग देना शुरू किया। बैंक के अधिकारियों को अखिलेश का काम पसंद आया, और अखिलेश को बैंक की दूसरी शाखाओं में भी भेजा जाने लगा। जल्दी ही अखिलेश की तरक्की हो गई। आज बैंक में अखिलेश को उसके सहकर्मी और अधिकारी बहुत मानते हैं।

प्रीति बड़ी मुश्किल से अपने दो बच्चों को पाल रही थी। वह किराए के घर में रहती थी। उसे लग रहा था कि मकानमालिक किराया बढ़ाने की बात करेगा, और तब उसे घर छोड़ना पड़ेगा। वह अधिक किराया नहीं दे सकती थी, और उस घर को छोड़ना भी नहीं चाहती थी। मकानमालिक का बेटा चौथी कक्षा में था और पढ़ाई में कमजोर था। प्रीति ने उसे अपने पास बिठाकर पढ़ाना शुरू कर दिया। प्रीति की मेहनत से, बच्चा आगे बढ़ गया। मकानमालिक इस बात से खुश हो गया, और प्रीति को दूसरा घर नहीं देखना पड़ा।

दूसरों की भावनाओं को समझकर अपने व्यवहार को बदलें

रोजमर्रा के जीवन में विचारों और भावनाओं का सही चुनाव  इस अध्याय में, अपनी और दूसरों की भावनाओं पर लगातार नजर रखने का ढंग भी बताया गया है। हम समझ सकते हैं कि दूसरों की भावनाओं को ध्यान में रखना सामाजिक सम्बंधों को मजबूत करने के लिए जरूरी है। अगर कोई व्यक्ति गलती कर रहा है, लेकिन गुस्से में है, तो उसका गुस्सा शांत होने का इंतजार करें, और इसके बाद उसकी गलती उसे समझाऐं। अगर कोई व्यक्ति चिंतित या उदास है, तो हम उसका मन बहलाने की कोशिश करें, और उसकी चिंता और उदासी दूर करने की कोशिश करें—और इस प्रकार से दूसरों का व्यवहार अपने प्रति अनुकूल बनाने की कोशिश करें।

अपनी मानसिक क्षमता को आगे बढ़ाएं

अगर आई-क्यू का मतलब स्मार्टनेस है तो हम अधिक स्मार्ट बन साकते हैं|

क्या इंटेलीजेंस यानी आई-क्यू को बढ़ाया जा सकता है? कुछ लोग मानसिक क्षमता या इंटेलीजेंस को स्थिर मानते हैं। इस मत के अनुसार मानसिक क्षमता को आगे बढ़ाना सम्भव नहीं है। परंतु शोध के अनुसार इंटेलीजेंस घटती-बढ़ती रहती हैं| बहुआयामी परिवर्तन के द्वारा, हम एक बड़ी सीमा तक अपनी मानसिक क्षमता को बढ़ा सकते हैं। अगर आई-क्यू का मतलब स्मार्टनेस है तो हम अधिक स्मार्ट बन साकते हैं|

पढ़ाई में आगे बढ़ने के लिए, विद्यार्थी नीचे लिखे बिंदुओं को अपनाएँ।

बहुआयामी परिवर्तन के पहले चरण का पालन जारी रखें।

यौन क्रियाओं पर पूर्ण नियंत्रण विधिपूर्वक अपनाने के बाद, बहुत सारे विद्यार्थियों को पढ़ाई में अप्रत्याशित लाभ होते हुए देखा गया है। हल्का लेकिन नियमित शारीरिक व्यायाम तनाव को दूर करता है, शरीर में स्फूर्ति आती है, और पढ़ाई में मन लगने लगता है। तनाव-मुक्ति का आसन भी पढ़ाई में मन लगाने के लिए अत्यंत उपयोगी है। तीस मिनट तक इस आसन को करने के बाद, पढ़ाई करने के लिए बैठें।

मन को शांत और भावनाओं को नियंत्रित रखें

इस अध्याय में हम पहले ही, भावनाओं को काबू में रखने की बात कर चुके हैं।

कोई भी मानसिक काम करने के लिए, मन स्थिर होना जरूरी है। हमने अनुभव किया होगा कि उदासी के समय भी और खुशी के समय भी पढ़ाई में मन नहीं लग पाता है। मानसिक काम जैसे पढ़ाई करते समय, अगर हमारी भावनाएं बाधक होती हैं, या हमारा ध्यान इधर उधर जाता है, तब हमें अपने मन को स्थिर करने की जरूरत हो सकती है।

रमाकांत अपने माता-पिता की अकेली संतान था। पिता चाहते थे कि रमाकांत दुकानदारी में उनका हाथ बटाए, परंतु रमाकांत ने जिद करके इंजीनियरिंग में प्रवेश ले लिया। अब बाप-बेटे की आपस में ठन गई। बाप रमाकांत की हर बात पर आलोचना करता और उसकी हर मांग कि लिए न कर देता। पिता के व्यवहार से रमाकांत क्रोधित था, और उसका मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था, क्योंकि उसे हर समय पिता का बुरा व्यवहार याद आता था। रमाकांत की मां पढ़ी लिखी समझदार महिला थी। उसने अपने पति को समझाया, जिससे बाप-बेटे के बीच की कड़वाहट दूर हो गई, और उनका आपसी व्यवहार ठीक हो गया। अब रमाकांत का मन पढ़ाई में लगने लगा।

सामाजिक संबंधों की मदद लेने की सोचें

मानसिक क्षमता को आगे ले जाने के लिए, सामाजिक संबंधों की गुणवत्ता को बढ़ाएं यहां गुणवत्ता का अर्थ है थोड़े पर गहरे सामाजिक संबंध, और ऐसे संबंध जिन पर भरोसा किया जा सकता हो। फिर हम इन सामाजिक संबंधों की मदद बेहतर पढ़ाई के लिए कर सकते हैं|

कला अपनी दो साल की बेटी वर्षा के साथ रहती थी। तीन साल पहले, पति ने उसे छोड़ दिया था। कला बी एड कर रही थी, जिससे उसे अच्छी नौकरी मिल सके। लेकिन वर्षा की चिंता उसे घेरे रहती थी, और उसका मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगता था। कला की अनुपस्थिति में एक नौकरानी वर्षा की देखभाल करती थी, लेकिन कला को नौकरानी पर भरोसा न था। उसे लगता था कि नौकरानी चोरी करती है, और वर्षा की देखभाल में लापरवाही बरतती है।

कला की मां कुछ दिन के लिए, कला के पास रहने के लिए आई। मौका देखकर कला ने मां को अपनी परेशानी बताई। कला चाहती थी कि मां बी एड पूरा होने तक उसके पास ही रहे, परंतु यह मां के लिए सम्भव नहीं हो पा रहा था। पर मां ने एक दूसरा रास्ता निकाल लिया। उसने पड़ौस के एक घर में मित्रता बढ़ाई। अब कला, वर्षा और नौकरानी को, पड़ौस के घर में छोड़कर जाती है। साथ में बच्ची का खाना पीना और कपड़े भी रहते हैं। पड़ौस की महिला घर पर ही रहती है, और नौकरानी पर निगरानी रखती है। अब कला को वर्षा की चिंता नहीं है, और उसकी पढ़ाई अच्छे से चल रही है।

भूषण होस्टल में रहकर एम बी ए कर रहा था, लेकिन उसका मन पढ़ाई में नहीं लगता था। वह अब भी पढ़ने बैठता, उसके मन में तरह-तरह के विचार आने लगते थे, और उसका मन पढ़ाई से उचट जाता था। समय बीतता जा रहा था, और भूषण की चिंता बढ़ती जा रही थी। अंत में भूषण ने किशोर से बात की। किशोर की भी वही समस्या थी। दोनों ने साथ बैठकर पढ़ने का निश्चय किया, और यह भी तय किया कि मन को भटकने नहीं देंगे। एक दूसरे की मदद से, दोनों की समस्या सुलझ गई।

 





मार्गदर्शिका