क्या सेक्स हमारी बाकी जरूरतों से अलग या कुछ खास नहीं है?

सेक्स मूलभूत जरूरत है, जिसकी चर्चा मना है

हमारी मूलभूत जरूरतों पर एक नजर डालते हैं—रोटी, कपड़ा, और मकान, और शायद सेक्स। सारे प्राणी जगत की मूलभूत जरूरतें भी यही हैं—भोजन, सुरक्षा, और सेक्स। हमारी संसद में बहस हो, टीवी पर कमेंटरी हो, या किसी राजनेता का भाषण हो, हमें केवल रोटी, कपड़ा, और मकान की आवाज सुनाई देती है। शायद ही कभी कोई सेक्स के बारे में चर्चा करता हुआ दिखलाई देता है। फिल्मों में वास्तविक सेक्स के दृश्यों को दिखलाने पर रोक लगाई जाती है। स्कूलों में सेक्स एजुकेशन को लागू किया जाता है, तो एक बड़ा तबका बच्चों को सेक्स संबंधी जानकारी देने का मुखर विरोध करता हुआ दिखलाई देता है। हमारे घरों की चारदीवारी के अंदर भी सेक्स एक निषिद्ध विषय है। इंसान की सेक्स प्रवृत्तियों और रुझानों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी न के बराबर है।

इतने प्रतिबंधों के बावजूद भी, सेक्स बाहर निकल कर आता है। एच आई वी और एड्स इसका सबसे भयंकर स्वरूप है, कि हम अपने आप को रोक नहीं पाते हैं। फिल्मों में यथार्थ दिखलाने पर रोक होने पर भी, हीरो-हीरोइन के कपड़ों से, नाच-गाने से, दो अर्थ वाले संवादों से, और गीत के बोलों से, सेक्स छलांगे लगाता हुआ नजर आता है। यही टीवी के सीरियलों पर भी लागू होती है। इंटर्नेट का बहुत बड़ा भाग सेक्स से जुड़ा हुआ है। विज्ञापनों में सेक्स अपील पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस सबका नतीजा होता है कि हम अपनी सेक्स संबंधी जरूरतें विकृत रूप में पूरी करते हैं। सेक्स के प्रति हमारी विकृत मानसिकता का ही प्रभाव होता है कि हम यह समझने लगते हैं कि रोटी कपड़ा और मकान जैसी बाकी जरूरतों से अलग सेक्स कुछ खास है।

सेक्स संबंधी इन विकृतियों को बढ़ावा देने में कुछ और भी कारक सहायक होते हैं। मनुष्यों में सेक्स की इच्छा पैदा होने से विवाह होने के बीच कई वर्षों का एक लम्बा अंतराल होता है। इस अंतराल में सेक्स की जरूरतें प्राकृतिक रूप से पूरी होना सम्भव नहीं हो पाता है। बहुत से लोग काम-धंधे के लिए घर-परिवार से लम्बे समय तक अलग रहने पर मजबूर होते हैं। बहुत से परिवार एक कमरे के घर में रहते हैं, जिसमें उनके रसोईघर से लेकर बेडरूम तक सभी होता है। बच्चों या बूढ़ों की उपस्थिति में, ऐसे अनेक युगल सेक्स की जरूरतों को पूरा कर पाने में, अपने आप को असमर्थ पाते हैं। और हम यही समझने लगते हैं कि रोटी कपड़ा और मकान जैसी बाकी जरूरतों से अलग सेक्स कुछ खास है।

रोटी, कपड़ा, और मकान की तरह सेक्स एक मूलभूत जरूरत है

बहुआयामी परिवर्तन सेक्स को खास नहीं मानता है|

बहुआयामी परिवर्तन, हमारे जीवन के अनेक आयामों को एक साथ बदलने की बात करता है। जाहिर है कि सेक्स के प्रति हमारे दृष्टिकोण में बदलाव इस बहुआयामी परिवर्तन का एक जरूरी हिस्सा होना चाहिए। यह मार्गदर्शिका सेक्स क्रियाओं में जरूरी बदलाव के मार्ग सुझाती है — देखिए: सैक्स क्रियाओं और भावनाओं पर एक सप्ताह तक पूर्ण नियंत्रण, और स्थिरता आगे ले जाने के लिए, यौन क्रियाओं में बारीकी लाना। बहुआयामी परिवर्तन सेक्स को खास नहीं मानता है, और हमारी सोच की विकृतियों को दूर करना जरूरी समझता है।

पति-पत्नी के बीच सेक्स के बारे में खुली चर्चा को जरूरी है—हमें सेक्स का आनंद भी लेना है, और उस आनंद को सीमाओं में बांधना भी है। हम सीमित मात्रा में भोजन करते हैं, सीमित मात्रा में सोते हैं, सीमित मात्रा में सब काम करते हैं। इसलिए सेक्स को भी सीमा में बांधने की जरूरत है, और यह सीमा पति-पत्नी मिलकर ही तय करेंगे। जहां पर परिवार एक कमरे के घर में रहते हैं, और सेक्स के लिए अवसर सीमित हैं—ऐसी स्थिति में पति-पत्नी परस्पर संवाद द्वारा ही, संतोषजनक सेक्स के अवसर पैदा कर सकते हैं। बहुआयामी परिवर्तन सेक्स को किसी बुर्जुआ शिकंजे में न जकड़कर, एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करने का तरीका बताता है।





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