पिछले जीवन से जुड़े दर्द को भूल जाना

मगर पहले भूलना पड़ेगा, तभी हम माफ कर सकेंगे|

हम माफ करने की और भूल जाने की कोशिश करते हैं| परन्तु बहुत कम लोग अपने इस प्रयास में सफल हो पाते हैं|दर्द जितना गहरा होता है, उसे भूला पाना उतना ही मुश्किल होता है, और किसी बड़े अपराध को माफ कर देना, यह तो दुनिया में बहुत कम लोगों के लिए संभव है| इस स्थिति को बहुआयामी परिवर्तन उलटा करके देखता है — मतलब पहले भूलना पड़ेगा, तभी हम माफी दे सकेंगे। पूरे मसले को दार्शनिक दृष्टि से न देखकर, बहुआयामी परिवर्तन इसे एक वैज्ञानिक और सैद्धांतिक दृष्टिकोण से देखकर ही इस नतीजे पर पहुंचता है|

अधिकतर लोग पिछले जीवन से जुड़े दर्द को भूल सकते हैं

दूसरे चरण का उद्देश्य स्थिरता को आगे ले जाना है। और इस चरण की शुरुआत, पिछले जीवन से जुड़े दर्द को भूलने से की जा रही है—हमें इस दर्द को भूल जाना जरूरी है, अगर हमें पहले चरण में प्राप्त की गई स्थिरता को आगे बढ़ाना है। पिछले जीवन से जुड़े दर्द को भूल जाना—इसका सबसे अधिक महत्त्व है, इसलिए इसकी चर्चा से यह चरण शुरू किया जा रहा है| माफ कर देना भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उसकी चर्चा कई अध्यायों के बाद आएगी|

इस अध्याय को पढ़ना, समझना, और अपने ऊपर लागू करना बेहद जरूरी है, अगर हम सचमुच में बहुआयामी परिवर्तन का लाभ उठाना चाहते हैं|

पिछले जीवन से जुड़े दर्द को भूलना क्यों जरूरी है?

ऊपर के चित्र में पहले के जीवन से जुड़ी तकलीफ भूलने का महत्व बताया गया है। बड़ी आकृति आज अनुभव किए जा रहे संपूर्ण दर्द का सूचक है। अंदर की छोटी आकृति आज की जिन्दगी में मौजूद तकलीफों के कारण होने वाले दर्द का सूचक है। बाकी का अनुभव होने वाला दर्द (जो बहुत बड़ा हिस्सा है) पुरानी तकलीफों से जुड़ा है, जो आसानी से भुलाया जा सकता है। दर्द के इस बड़े हिस्से को भुला पाने से हमें अनेक स्थितियों में चमत्कारी परिणाम मिल सकते हैं|

 

पुरानी तकलीफ भला कोई कैसे भूल सकता है?

मनोहर और बीना के साथ चर्चा

मनोहर और बीना पति-पत्नी थे। वे बहुआयामी परिवर्तन का पहला चरण पूरा कर चुके थे, और स्थिरता का अनुभव कर रहे थे। मनोहर ने पूछा, “स्थिरता और शांतता और बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए?”

मैंने कहा, “ हमेशा यह याद रखिए, कि पहले जैसी तकलीफ आगे कभी नहीं होगी।”

“मतलब?”

“तकलीफ तो होगी, पर पहले जैसी तकलीफ आगे कभी नहीं होगी। इसलिए आप पुरानी तकलीफ को भूल सकते हैं।”

मनोहर पिछले जीवन में बेरोजगारी और कर्ज का बोझ जैसी अनेक तकलीफों से गुजरा था। इसलिए पुरानी तकलीफ की बात सुनकर वह एकाएक उत्तेजित हो गया, और बोला, “मैं तो पुरानी बातों को कभी याद नहीं करता हूँ।”

“यह तो बहुत अच्छा है,” मैंने कहा और उसे एक चित्र दिखलाया। “इस चित्र को देखो। आज की तकलीफ कम है, और पुरानी तकलीफ अधिक है। जब हम पुरानी तकलीफ याद करते हैं तो आज की तकलीफ में पुरानी तकलीफ को जोड़ लेते हैं। इस प्रकार से आज कि तकलीफ को न चाहते हुए भी बढ़ा लेते हैं। इसलिए पुरानी तकलीफ को भूलना बहुत जरूरी है।”

मनोहर फिर से उत्तेजित हो गया। “मैंने कहा ना, कि मैं पुरानी बातों को भूल चुका हूँ।” फिर उसने अपनी पत्नी की ओर देखकर कहा, “बीना तुम ही डॉक्टर को बताओ ना, कि मैंने अपने पुराने जीवन को गले हुए अंग की तरह काट कर फेंक दिया है।”

बीना चुप रही।

मैंने कहा, “मनोहर यह बात सच है कि तुम्हें आज पुरानी बातें याद नहीं आती हैं। इसका कारण है कि आज तुम खुश हो। लेकिन जिस दिन तुम्हारे सामने कोई परेशानी खड़ी हो जाएगी, जिसका समाधान दिखाई नहीं पड़ रहा होगा, उस दिन तुम्हें पुरानी तकलीफ याद आने लगेगी।”

अबकी बार मनोहर चुप रहा, पर बीना पूछ बैठी, “आप यह बताइये, पुरानी तकलीफ भला कोई कैसे भूल सकता है?”

❐ स्पष्टीकरण— मनोहर ने पुरानी तकलीफ को भूलने के लिए आम रास्ता अपनाया था, और वह उतने से ही खुश था। उसे पता नहीं था कि वह सचमुच में पुरानी तकलीफ नहीं भूला है।

मनोहर ने आम रास्ता अपनाया था

केवल इच्छा-शक्ति पर आधारित होता है। हम घटना पर से अपना ध्यान हटाने की कोशिश करते हैं। जब भी हमें पुरानी घटना और उससे जुड़ी तकलीफ याद आने लगती है, हम अपने मन को दूसरी तरफ हटाने की कोशिश करते हैं। हम सोचते हैं, धीरे-धीरे पुरानी घटनाओं और उनसे जुड़ी तकलीफ को भूल सकेंगे। ऐसा होने भी लगता है, पर जब कोई नई मुश्किल सामने आ जाती है, पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं—और पहले की तकलीफ फिर से गहरी हो जाती है। जाहिर है, यह रास्ता बहुत प्रभावकारी नहीं है।

 

पुरानी तकलीफ हम क्यों नहीं भूल पाते है?

स्मरण शक्ति का भावनाओं से गहरा नाता है

चिंता, क्रोध, और डर जैसी भावनाएं, हमारे मस्तिष्क पर एक अमिट प्रभाव छोड़ जाती हैं। जो घटनाएँ इन भावनाओं के साथ जुड़ी हों, वे हमें हमेशा के लिए याद हो जाती हैं।

आज भी मुझे याद है—इंदिरा गांधी की हत्या की खबर सुनते समय मैं ट्रेन में बैठकर दिल्ली से सेवाग्राम जा रहा था। अस्सी-नब्बे वर्षीय अमेरिकन नागरिक, जॉन एफ कैनेडी की हत्या के समय पर, वे कहाँ थे और क्या कर रहे थे—आज भी यह बता देते हैं। जबकि इस घटना को साठ साल से अधिक हो चुके हैं।

हमें अपनी गाड़ी का नंबर भले ही याद न रहे, पर अगर कोई एक्सीडेंट हुआ हो, तो उसकी तारीख और समय याद रहता है। हमारे बच्चों ने दसवीं कब पास की वह याद करना मुश्किल है, पर अगर वे कभी गंभीर रूप से बीमार हुए होंगे, तो उसका दिन व महीना भी हमें याद होगा।

क्या हमने कभी सोचा है? ऐसा क्यों होता हैं?

तीव्र भावनाओं की उपस्थिति में, कुछ रसायन मस्तिष्क में बनते हैं, जो उस समय की घटनाओं की एक पक्की छाप मस्तिष्क पर छोड़ने का काम करते हैं।

इस जानकारी का हमारे लिए क्या उपयोग है?

जब हम किसी घटना के बारे में तीव्र भावनाओं के साथ सोचेंगे, उस घटना की याद पक्की हो जाएगी। किसी बात को भूलने के लिए, उससे जुड़ी भावनाओं की तीव्रता को कम करें।

पुरानी दर्द भरी यादों को भूलने का यह वैज्ञानिक तरीका यहाँ सुझाया गया है।

जब भी हम यह कहते हैं या सोचते हैं, “मुझे अब कभी भी पहले जैसी तकलीफ नहीं होगी।”—हम अपनी भावनाओं की तीव्रता को कम करते हैं।

❐ स्पष्टीकरण— जब भी हम तीव्र भावनाओं से जुड़ी पुरानी घटनाओं को फिर से याद करते हैं, वही भावनाएं फिर से जागृत हो जाती हैं, और उन घटनाओं की याद को फिर से पक्का कर देती हैं। इस प्रकार से किसी घटना को भूलने के लिए उससे जुड़ी तीव्र भावनाओं को कम करना जरूरी है।

 

पुरानी तकलीफ भूला देने का बहुआयामी परिवर्तन वाला तरीका

कोई घटना भूलने के लिए, उस घटना को कई बार मन ही मन दोहराना पड़ेगा

☞ दूसरा रास्ता पुरानी घटनाओं को दर्द भरे अनुभवों से अलग कर देता है। हमें पुरानी घटनाएँ याद रहती हैं, पर हम उनसे जुड़ा हुआ दर्द भूल जाते हैं।

❐ स्पष्टीकरण—बहुआयामी परिवर्तन सफलतापूर्वक पूरा करने का अर्थ है—अब हमें पहले जैसी तकलीफ नहीं होगी| पहले चरण का समापन—क्या हम दूसरे चरण में जाने के लिए तैयार हैं?: इस अध्याय को देखिये। यह विश्वास कि अब हमें पहले जैसी तकलीफ नहीं होगी, धीरे-धीरे दृढ़ होता जाता है। हम अपने आप को संभाल सकते हैं, यह विश्वास भी दृढ़ होता जाता है।

इस विश्वास को जल्दी दृढ़ करने का एक रास्ता है, जो हम अपना सकते हैं। जीवन की किसी दर्द भरी घटना को याद करें, और फिर सोचें—अगर वही घटना फिर से होगी, क्या हमें फिर से उतनी ही तकलीफ देगी, या कम तकलीफ देगी? अगर वही घटना फिर से होगी, क्या हम अपने आप को संभाल सकेंगे, या नहीं? जाहिर है, इसका उत्तर हमें हाँ में मिलेगा।

अब जब भी वह घटना या और कोई भी दर्द-भरी घटना याद आएगी, हम अपने मन में दोहराएंगे, “मुझे अब कभी भी पहले जैसी तकलीफ नहीं होगी—इसलिए मैं पहले की तकलीफ को भूल सकता हूँ। घटना को भूलना जरूरी नहीं है, लेकिन दर्द को भूल सकता हूँ।”

इसके साथ ही, हम बहुआयामी परिवर्तन को पकड़ कर रखेंगे, और पहले जैसी तकलीफ नहीं होने देंगे। हम समझ सकते हैं—यह रास्ता प्रभावकारी है, अगर हम मुसीबत में भी अपने को पहले जैसी तकलीफ नहीं होने देते हैं।

व्यवहार में भी यह रास्ता अत्यंत प्रभावकारी पाया गया है। परन्तु एक बात हमें याद रखनी है: हमें पहले जैसी तकलीफ नहीं होने देनी है| मतलब हमें बहुआयामी परिवर्तन अपने जीवन में लगातार लागू रखना पड़ेगा, तभी हम उम्मीद कर सकते हैं कि हमें पहले जैसी तकलीफ नहीं होगी|

 

मनोहर पुरानी तकलीफ सचमुच ही भूल गया

मनोहर ने बहुआयामी परिवर्तन का पहला चरण पार कर लिया। फिर उनसे तय किया, वह अपने बीते हुए कल की तकलीफें भूल कर ही रहेगा।

मनोहर ग्रेजुएट था, लेकिन बेरोजगार था। दो बच्चों का पेट भरने के लिए, उसने कई काम पकड़े—जैसे छोटी मोटी नौकरी, मजदूरी, सब्जी-भाजी का ठेला, स्कूटर मैकेनिक। अंत में उसकी किस्मत ने बदलाव लिया, और उसे एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क की नौकरी मिल गई।

आर्थिक परेशानियाँ तो दूर हो हैं। लेकिन मनोहर को बीते हुए कल की याद आती थी। पत्नी के ताने याद आते थे, नौकरी नहीं थी तो शादी क्यों किया? बच्चों के ताने याद आते थे, पैसे नहीं थे तो हमें पैदा क्यों किया? ठेकेदार की गालियां याद आती थीं। उसे रात को नींद नहीं आती थी, और सवेरे काम पर जाने की इच्छा नहीं होती थी।

एक दिन मनोहर ने घर में कहा, उसकी नौकरी छूट गई थी। हालाँकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था, और उसने ऑफिस से केवल कुछ दिन की छुट्टी ले ली थी।

अब मनोहर मजदूरी करने के लिए गया। ठेकेदार की गालियां सुनीं। घर में, पत्नी और बच्चों के उलहने फिर से सुने। वह मन ही मन मुस्कराता रहा। उसे पहले जैसी तकलीफ नहीं हुई।

एक सवाल उसके मन में बना हुआ था। अगर सचमुच नौकरी छूट जाये, तब भी क्या पहले जैसी तकलीफ नहीं होगी? तभी उसका एक बच्चा बीमार पड़ गया। मनोहर ने अनुभव किया, बच्चा बीमार होने पर भी उसका मन शांत रहा, और वह काम पर जाता रहा। मनोहर समझ गया था। अब उसे कभी भी पहले जैसी तकलीफ नहीं होगी। उसने अपनी पत्नी बीना से सब-कुछ सच-सच बता दिया।

अब मनोहर ने पुरानी घटनाओं को बार-बार मन ही मन दोहराना शुरू किया| वह अकेला बैठ जाता था, और आँखें बंद करके पुरानी बातों को याद करता था| उसने स्पष्ट अनुभव किया कि पुरानी बातों को याद करते समय, उसे पहले जैसी तकलीफ नहीं हो रही थी| अब उसने मन में दोहराना शुरू किया: "पहले जैसी घटनाएं हो सकती हैं, लेकिन अब मुझे पहले जैसी तकलीफ नहीं होगी| मेरे हाथ का काम नहीं छूटेगा, और मैं कोई न कोई रास्ता निकाल लूंगा|" इस तरह के वाक्यों को मनोहर दिन में सैकड़ों बार दोहरा रहा था|

अब मनोहर का आत्म-विश्वास बढ़ने लगा था| वह छोटी-मोटी घटनाओं को या कड़वी बातों को सहन कर पा रहा था| वह अपना काम करता रहता था और थोड़ी देर में उस घटना को या कड़वाहट को भूल जाता था| मनोहर पुरानी घटनाओं को तो नहीं भूला था, लेकिन उन घटनाओं से जुड़े दर्द के अहसास को पूरी तरह से भूल चुका था|

 

 

आज की और बीते कल की, यौन संबंधों की अधूरी इच्छाओं से जुड़ी तकलीफों को भूलना

सेक्स भी जीवन की बाकी जरूरतों की तरह है, मतलब इसमें कुछ खास नहीं है

कोई भी अधूरी इच्छा तकलीफ देती है। यौन सम्बन्धों की इच्छा हमें बाकी इच्छाओं से कुछ अलग लगती है। इस इच्छा के अधूरी रहने से तकलीफ भी कुछ अधिक हो सकती है। इस प्रकार की तकलीफ कुछ लोग विवाह से पहले अनुभव करते हैं। लेकिन तकलीफ का यह अनुभव हमें बाद के जीवन में भी याद रहता है—और यौन सम्बन्धों के प्रति हमारे नजरिये को जिंदगी भर प्रभावित करता रहता है। इस अनुभव को पूरी तरह से भूलने के बाद हम यौन सम्बन्धों को एक दूसरे नजरिये से देख सकते हैं—मतलब यौन सम्बन्धों की खासियत चली जाती है। यौन संबंध मामूली बात है, और कुछ खास नहीं है—यह दूसरा नजरिया हमारे स्वास्थ्य के लिए जरूरी हो सकता है। नीचे का बॉक्स देखें— यौन क्रियाओं का स्वास्थ्य पर प्रभाव और बहुआयामी परिवर्तन।

❐ स्पष्टीकरण—इस अध्याय में बताया गया है, हम बीते कल की तकलीफों को कैसे भूल सकते हैं। वही अधूरी यौन इच्छाओं से जुड़ी तकलीफों पर भी लागू होता है। मतलब बीते कल की सारी तकलीफें भूलने का रास्ता एक ही है। हम सोचें—हमें पहले जैसी तकलीफ कभी नहीं होगी। अगर हमें कुछ हो जाएगा, या हमारे जीवनसाथी को कुछ हो जाएगा, और हमारी सेक्स लाइफ खतम भी हो जाएगी। तब भी हमें पहले जैसी तकलीफ नहीं होगी। हम सहन कर लेंगे।

इसके अतिरिक्त, सेक्स संबंधी तकलीफों को भूलने के लिए यह भी जरूरी है—हम सेक्स को खास समझना बंद कर दें, और कोई डर अगर हमारे मन में बैठा हो तो उसे भी निकाल दें। नीचे का बॉक्स देखें— यौन क्रियाओं का स्वास्थ्य पर प्रभाव और बहुआयामी परिवर्तन।

 

यौन क्रियाओं का स्वास्थ्य पर प्रभाव और बहुआयामी परिवर्तन

सेक्स एक दबा ढका विषय है, लेकिन बहुआयामी परिवर्तन इस बारे में खुलकर चर्चा करता है

हम अकसर यौन सम्बन्धों के बारे में खुलकर चर्चा करने से कतराते हैं, लेकिन बहुआयामी परिवर्तन के दौरान इस विषय पर विचार-विमर्श जरूरी समझा जाता है। दूसरे चरण के शुरू में, या पहले चरण के दौरान भी नीचे लिखे बिन्दुओं को चर्चा में शामिल किया जाता है।

☞ यौन इच्छाओं को मानव समाज में एक विशेष दर्जा प्राप्त है। एक तरफ तो उन्हें सामाजिक, नैतिक, धार्मिक, और कानूनी व्यवस्थाओं और मूल्यों द्वारा काबू में रखने का प्रयत्न किया जाता है। दूसरी ओर फिल्म और मीडिया में यौन-आकर्षण को एक बड़े आकर्षण के रूप में प्रयोग किया जाता है।

मनुष्यों में यौन आकर्षण की शुरुआत कम उम्र में हो जाती है, लेकिन यौन इच्छाओं की पूर्ति देरी से होती है। फासला दस-बीस वर्ष या उससे अधिक भी हो सकता है। इतना लंबा फासला होने से (खाना, पीना, सोना इत्यादि बाकी की जरूरतों के मुकाबले) यौन सम्बन्धों में कुछ विशेषता लगने लगती है। इसलिए हम यौन सम्बन्धों को एक विशेष नजर से देखने लगते हैं।

☞ आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में, पति-पत्नी के बीच होने वाले शारीरिक सम्बन्धों को किसी सीमा में बांधने की जरूरत नहीं समझी जाती है। इसे पति-पत्नी का व्यक्तिगत मामला समझकर, डॉक्टर के लिए आगे बढ़कर इसमें हस्तक्षेप करना मुनासिब नहीं समझा जाता है। जब तक कि पति-पत्नी स्वयं ही इसकी चर्चा न करें|

☞ सेक्स एक दबा-ढका विषय है। सेक्स का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव होता है? इस बारे में वैज्ञानिक जानकारी सीमित है। इसलिए हमारी सेक्स लाइफ हमारे शारीरिक सामर्थ्य, इच्छाओं, और व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित होती है। पशुओं के मुकाबले, हमें (विशेषकर विवाह होने के पश्चात) शारीरिक सम्बन्धों के मामले में कहीं अधिक स्वतंत्रता है। इस स्वतंत्रता का स्वास्थ्य पर क्या असर होता है? इस बारे में खुली सामाजिक चर्चा का अभाव है।

☞ स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए, नॉर्मल शारीरिक सम्बन्धों को भी बदलने की जरूरत हो सकती है। इसके दो पहलू हैं, शारीरिक सम्बन्धों की गिनती और गुणवत्ता—मतलब हम महीने में या हफ्ते में कितनी बार यौन संबंध करते हैं, और हर बार हमें यौन सम्बन्धों से कितना संतोष मिलता है। बहुआयामी परिवर्तन में गिनती के बदले संतोष का महत्व है। स्पष्ट है कि बहुआयामी परिवर्तन यौन सम्बन्धों को नैतिकता के चश्मे से न देखकर केवल स्वास्थ्य और स्थिरता को पाने और बनाए रखने के एक साधन की दृष्टि से देखता है।

☞ यौन क्रियाओं का एक और पहलू है। हल्के से स्पर्श से लेकर पूर्ण शारीरिक संबंध तक, सभी यौन क्रियाएँ हैं—मतलब यौन क्रियाओं का एक इंद्रधनुष है। हम अगर किसी के बारे में सोचते हैं, और हमारे अंदर सेक्स की भावना पैदा होती है—इसका भी हमारे स्वास्थ्य पर अच्छा या बुरा प्रभाव होता है। इसलिए बहुआयामी परिवर्तन की दृष्टि से सेक्स के बारे में सोचने या आकृष्ट होने को भी यौन क्रिया माना जाता है। कहने का अर्थ है, यौन क्रियाओं में बारीकी की जरूरत होती है। बारीकी का मतलब है, कभी कम कभी ज्यादा, कभी थोड़ी देर तो कभी अधिक देर, कभी हल्का सा स्पर्श तो कभी चरम सीमा तक जाने तक का शारीरिक संबंध।

☞ बहुआयामी परिवर्तन यौन क्रियाओं की बारीकी को समझने और इस बारीकी को अपने जीवन में लागू करने में हमारी मदद करता है।

☞ इसके अलावा, बहुआयामी परिवर्तन यौन सम्बन्धों और उनकी जरूरत को किसी विशेष नजर से न देखने में हमारी मदद करता है। मतलब यौन संबंध हमारे लिए, खाना पीना, सोना इत्यादि, बाकी की जरूरतों जैसे हो जाते हैं। उनकी विशेषता कम हो जाती है, या गायब हो जाती है।

☞ सेक्स लाइफ से जुड़े निराधार डर हमारे मन में होते हैं—उदाहरण के लिए हम डर सकते हैं। अगर मेरे जीवन-साथी को कुछ हो गया, मेरी सेक्स लाइफ खतम हो जाएगी, और शादी से पहले अनुभव की गई पीड़ा फिर से शुरू हो जाएगी। जाहिर है हम पुरानी पीड़ा को भूल नहीं पाते हैं। बहुआयामी परिवर्तन अधूरी रह गईं सेक्स की इच्छाओं से जुड़ी, बीते हुए जीवन की, इस पुरानी पीड़ा को भूलने में भी मदद करता है।





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