एक बड़े परिवर्तन का वैज्ञानिक और सैद्धांतिक परिपेक्ष्य ... (2)

मनुष्य हमेशा से अपनी एक्टीविटीज को बदलने के प्रति सजग रहा है| लेकिन अधिकाँश लोग अपनी एक्टीविटीज को बदलना बेहद मुश्किल पाते हैं| नया वर्ष हो, जन्मदिन हो, या विवाह् की बरसी हो—हम कुछ नया करने का और अपने को बदलने का निश्चय करते है, और उसपर अमल करने की कोशिश भी करते हैं|परन्तु बहुत कम लोग अपने लक्ष्य तक पहुँच पाने में कामयाब हो पाते हैं| ऐसे में बहुआयामी परिवर्तन के बारे में हमें शंका होगी| एक ही एक्टीविटी बदलना तो मुश्किल है, बहुत सारी एक्टीविटीज कैसे बदलेंगे? इस शंका का एक कारण और भी है| बहुआयामी परिवर्तन से मिलने वाले लाभ हमें किसी दूसरी दुनिया के लगते हैं| एक सवाल हमारे मन में उठता है: क्या केवल एक्टीविटीज को बदलकर इतने बड़े लाभ मिल पाना संभव हो सकता है?

मोना लिसा-छोटी उम्र का चित्र

गंभीर बीमारी से पीड़ित होते हुए भी बहुआयामी परिवर्तन अपनाना आसान है|

एक ही एक्टीविटी बदलना तो मुश्किल है, बहुत सारी एक्टीविटीज कैसे बदलेंगे?

बहुआयामी परिवर्तन के दौरान अनेक एक्टीविटीज को एक साथ बदला जाता है| बहुआयामी परिवर्तन के दौरान आने वाली दिक्कतों का अनुमान लगाने का एक तरीका इस प्रकार हो सकता है| बहुआयामी परिवर्तन के दौरान आने वाली दिक्कतें = एक्टीविटी-1 की दिक्कतें + एक्टीविटी-2 की दिक्कतें + एक्टीविटी-3 की दिक्कतें ... + आखिरी एक्टीविटी की दिक्कतें| बहुआयामी परिवर्तन से होने वाले लाभों का अनुमान लगाने का एक तरीका इस प्रकार हो सकता है| बहुआयामी परिवर्तन से होने वाले लाभ = एक्टीविटी-1 के लाभ + एक्टीविटी-2 के लाभ + एक्टीविटी-3 के लाभ ... + आखिरी एक्टीविटी के लाभ| इस प्रकार से अनुमान लगाने से हमें लगेगा कि बहुआयामी परिवर्तन अपनाने में बहुत दिक्कतें आने वाली हैं, और इसकी तुलना में लाभ बहुत कम मिलने वाले हैं|

एक पेंटिंग केवल उसमें इस्तेमाल किए गए रंगों का कुल योग नहीं है|

क्या हम यहाँ दिखाई गई मोना-लिसा की पेंटिंग का वर्णन इस प्रकार से कर सकते हैं? लाल ३० प्रतिशत + हरा ३२ प्रतिशत + नीला ३८ प्रतिशत| क्या हम यह तर्क देने की ज़रा सी भी कोशिश करेंगे कि सारी पेंटिंग्स इन तीन प्रारंभिक रंगों से ही बनाई जा सकती हैं? जाहिर है नहीं करेंगे| ऐसे और भी उदाहरण दी जा सकते हैं| पानी ऑक्सीजन और हाइड्रोजन से मिलकर बना है, लेकिन पानी के गुण, उसके अवयवों के गुणों से बिलकुल अलग हैं| निर्धन और धनवान के बीच का अंतर केवल संपदा कम-अधिक होने तक सीमित नहीं है|

ऊपर के तीनों उदाहरण रिडक्शनिज्म की नाकामयाबी दिखाते हैं

रिडक्शनिज्म एक दर्शानशास्त्र का सिद्धांत है, जिसके अनुसार किसी वस्तु के गुण उसके अवयवों के गुणों को जानकर जाने जा सकते हैं| इसकी कमियों के बावजूद, यह सिद्धांत विज्ञान और चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में लोकप्रिय है| आधुनिक चिकित्साशास्त्र की जड़ें रिडक्शनिज्म पर ही टिकी हैं| अपने दैनिक जीवन में भी रिडक्शनिज्म का उपयोग अज्ञात चीजों को समझने के लिए आम तौर पर हम करते हैं| परन्तु बहुआयामी परिवर्तन को समझने के लिए, हमें रिडक्शनिज्म के प्रयोग से बचना चाहिए|

बहुआयामी परिवर्तन जिन लाभों का दावा करता है, उन लाभों को कैसे समझा जाएगा?

इस वेबसाईट पर हमें बहुआयामी परिवर्तन के लाभों का वर्णन मिलेगा| अस्थमा, एंजाइना, कमर-दर्द, और डिप्रेशन जैसी कई बीमारियाँ हैं, जिनमें मिलने वाले लाभों को चमत्कार भी माना जा सकता है| यह चमत्कार इसलिए भी बन जाता ही क्योंकि आज इन बीमारियों का कोई पक्का उपचार उपलब्ध नहीं है| और बहुआयामी परिवर्तन से फायदा भी कुछ दिनों में ही दिखाई देने लगता है| वैज्ञानिक आधार पर इन लाभों की व्याख्या करने की कोशिश यहाँ की जा रही है|

बीमारी को शुरू करने वाले कारण और बीमारी को चालू रखने वाले कारण अलग-अलग हो सकते हैं

उदाहरण केलिए अस्थमा की शुरुआत अलर्जी से हो सकती है| लेकिन अलर्जी का स्रोत एक दो दिन में चला जाएगा| जैसे एक दिन कुछ अलर्जी वाला खाना खा लिया, लेकिन रोज-रोज तो वह नहीं खा रहे हैं| एक दिन धुल में चले गए, लेकिन रोजाना तो नहीं जा रहे हैं| फिर अस्थमा एक बार शुरू होने के बाद चलता क्यों रहता है? माना जाता है कि अस्थमा शुरू होने का कारण अलर्जी हो सकता है| लेकिन उसके बाद अस्थमा तानाव के कारण चालू रह सकता है| इसीलिए अस्थमा के रोगियों को तनाव के प्रतिकार की सलाह दी जाती है|

अस्थमा के अलावा, एंजाइना, कमर-दर्द, और डिप्रेशन—इन बीमारियों में भी तनाव और दूसरे मानसिक कारण, तथा अस्वस्थ जीवनशैली यही सब सातत्य के लिए जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं| ध्यान देने योग्य है कि बहुआयामी परिवर्तन इनही बीमारियों में असाधारण लाभ पहुंचाने का दावा करता है| इसके विपरीत कैंसर और मधुमेह जैसी बीमारियों में सातत्य अस्वस्थ जीवनशैली और तनाव से जुड़ा नहीं है| कैंसर और मधुमेह में बहुआयामी परिवर्तन अपनाने से असाधारण लाभ जैसे बीमारी ठीक होने की आशा करना बेकार है|

ऐसा होने की संभावना है कि बहुआयामी परिवर्तन सातत्य के कारणों को निर्णायक रूप से बदलकर बीमारी ठीक होने का मार्ग प्रशस्त करता है| लेकिन बहुआयामी परिवर्तन ऐसा दावा केवल उन्ही बीमारियों के लिए करता है, जिनमें सातत्य के कारणों को निर्णायक रूप से बदला जा सकता है|

शुरुआत के और सातत्य के कारण अलग हो सकते हैं

 

केवल सातत्य के कारण हटाने से बीमारी ठीक हो सकती है

 

बहुआयामी परिवर्तन व्यक्तित्व को बदलकर भी स्वास्थ्य लाभ का मार्ग प्रशस्त कर सकता है|

 

केवल जोखिम भरे व्यवहारोंसे आगे बढ़कर—पूरे व्यक्तित्व तक

बहुयामी परिवर्हतन सारी एक्मटीविटीज को बदलने के बारे में हैं| लेकिन आम तौर पर केवल जोखिम भरे व्यवहारों को बीमारी का कारण माना जाता है|मतलब हमारा ध्यान केवल कुछ एक्टीविटीज पर है, और बाक़ी को हम नजरअंदाज कर रहे हैं| जिन पर हमारा ध्यान है, उन्हें तीन श्रेणियों में बांटा जाता है: बीमारी पैदा करने वाले व्यवहार, काम-काज की जगह का वातावरण, और मानसिक स्वास्थ्य| बीमारी पैदा करने वाले व्यवहारों की श्रेणी में प्रमुख हैं: तम्बाकू का प्रयोग, तला-भुना खाना, व्यायाम की कमी, शराब, और असुरक्षित यौन सम्बन्ध|

होवार्ड फ्रीडमैन कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के डिस्टिंगुइश्ड प्रोफेसर की तरह काम कर रहे हैं| फ्रीडमैन ने लम्बी आयु पाने वाले लोगों के बारे में एक अनोखा अध्ययन किया है—द लोंगेविटी प्रोजेक्ट| उनके अनुसार हमें जोखिम भरे व्यवहारों से आगे बढ़कर, सम्पूर्ण व्यक्तित्व के बारे में सोचना चाहिए| फ्रीडमैन दो प्रकार के व्यक्तित्वों की बात करते हैं—पहला अपने को स्वस्थ रख सकने वाला व्यक्तित्व,और दूसरा बीमारी की जोखिम वाला व्यक्तित्व| फ्रीडमैन का मानना है कि हमारा व्यक्तित्व पत्थर का बना नहीं है—मतलब हम इसे बदल सकते हैं|

व्यक्तित्व हमारी सारी एक्टीविटीज को मिलाकर बनता है| बहुआयामी परिवर्तन हमारी सारी एक्टीविटीज को बदलता है| इसका मतलब बहुयामी परिवर्तन हमारे व्यक्तित्व को बदलने का रास्ता बनाता है| इस रास्ते पर चलकर बीमारी की जोखिम वाला व्यक्ति स्वस्थ रह सकने वाला व्यक्ति बन पाने की लगातार चेष्टा करता है| बहुआयामी परिवर्तन के दौरान यही पाया गया है| बहुआयामी परिवर्तन अपनाने वालों का एक बहुत बड़ा प्रतिशत यह दावा करने लगता है कि उन्हें पहले जैसी तकलीफ फिर कभी नहीं होगी—क्योंकि उन्हें स्वस्थ रहने का तरीका समझ आ गया है|

मस्तिष्क, प्रतिरोधक क्षमता, एवं हारमोंस—इन नियंत्रकों का बेहतर काम-काज

स्वस्थ मस्तिष्क के साथ ही शरीर स्वस्थ रह सकता है| हम मानते हैं कि मस्तिष्क ही हमारे शरीर को नियंत्रित करता है| परन्तु मस्तिष्क, प्रतिरोधक क्षमता, और हारमोंस—ये सब एक साथ मिलकर ही, हमारे सभी अंगों का नियंत्रण करते हैं|| नियंत्रित करने वाले ये सिस्टम कमजोर हो सकते हैं| ऐसे में पूरा शरीर गड़बड़ा जाता है, किसी भी अंग की बीमारी पैदा हो सकती है|

नियंत्रण करने वाले ये सिस्टम कैसे कमजोर पड़ते हैं, और इनकी कमजोरी को कैसे दूर किया जा सकता है| आम तौर पर माना जाता है कि मानसिक बीमारी या तनाव एवं अस्वस्थ जीवनशैली इस कमजोरी का कारण बनते हैं| लेकिन मानसिक रूप से स्वस्थ और अच्छी जीवनशैली वाले लोगों को भी बीमारियाँ होती हैं| इसलिए मानसिक रोगों एवं अस्वस्थ जीवनशैली के अलावा भी कुछ और है जो नियंत्रण करने वाले सिस्टम्स को कमजोर कर सकता है|

अभी तक हमारे पास ऐसी कोई दवाई या सीधा उपचार नहीं है, जिससे इन नियंत्रकों के काम में सुधार लाया जा सके| केवल जीवनशैली और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार, लाकर एवं बाकी एक्टीविटीज को बदलकर ही इन नियंत्रकों को बेहतर किया जा सकता है|

बहुआयामी परिवर्तन अपनाकर कई बीमारियाँ ठीक होती हैं| संभव है कि एक्टीविटीज को एक साथ सही दिशा में बदलने से नियंत्रण करने वाले सिस्टम्स का काम-काज बेहतर होता है, और बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं|

 

मानसिक और शारीरिक—दोनों पर एक जैसा ध्यान जरूरी है|

 

मानसिक और शारीरिक रोग हाथ से हाथ मिलाकर चलते हैं|

इसका सबसे अच्छा उदाहरण एंजाइना और डिपैशन हैं|डिपैशन एंजाइना के लिए जिम्मेदार हो सकता है, और एंजाइना डिपैशन को जन्म दे सकता है| यही बात मधुमेह पर भी लागू होती है| अस्थमा जैसी और भी बहुत सारी बीमारियों पर भी यही बात लागू होती है| एंग्जाइटी और शारीरिक बीमारियों का रिश्ता भी देखा गया है| सैद्धांतिक तौर पर शारीरिक बीमारी से जुड़ी मानसिक बीमारी पर भी बराबर का ध्यान देने की सिफारिश की जाती है| लेकिन व्यवहार में मानसिक तकलीफ अनदेखी रह जाती है| ऐसी स्थिति में जाहिर है रोगी को कम लाभ मिल पाता है|

बहुआयामी परिवर्तन किसी (शारीरिक या मनसिक) रोग के उपचार का लक्ष्य लेकर नहीं चलता है| इस समग्र हस्तक्षेप व्यक्ति में बदलाव है| फिर बीमारी चाहे मानसिक हो या शारीरिक, या फिर दोनों—इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है| इसलिए मानसिक तकलीफ अनदेखी रहने की कोई भी संभावना नहीं है, और रोगी को अधिकतम लाभ मिलने की संभावना है| बहुआयामी परिवर्तन से मिलाने वाले असाधारण लाभों का यह भी एक कारण है|





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