स्थिरता आगे ले जाने के लिए अपनी ताकत को पहचानना

हमारी सौ कदम चलने की ताकत हो तो सौ कदम जरूर चलें

... और १०१वाँ कदम बढ़ाने की कोशिश करते रहें

पहले चरण का समापन: इस अध्याय में हमें अपनी स्थिरता को पहचानने की बात कही गई है। लेकिन बहुआयामी परिवर्तन की यह स्थिरता एक गतिमान यानी बदलते रहने वाली स्थिरता है| यह एक वृक्ष की स्थिरता है, जिसमें रोज नई कोपलें निकलती हैं, और कुछ साल बीतने के बाद फल भी लगने लगते हैं| यह एक बालक की स्थिरता है जो रोज नई एक्टिविटीज सीखता है|

एक बालक बड़ा हो रहा है, और उसकी ताकत रोज बढ़ रही है| अपनी बढ़ रही ताकत को वह बालक रोजाना पहचानने की कोशिश करता है, और कल की ताकत भूलकर आज की ताकत के अनुसार आचरण करने की कोशिश करता है| बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के बाद, हमारी ताकत भी नियमित रूप से बढ़ेगी, और हमें इस बढ़ी हुई ताकत को पहचानकर, उसके अनुसार आचरण करने की जरूरत होगी| हममें अगर सौ कदम चलने की ताकत हो तो हमें सौ कदम रोजाना चलना चाहिए| कल हम १०१वाँ कदम जरूर बढ़ा सकेंगे|

हम कह सकते हैं कि अपनी ताकत को पहचानना और उसके हिसाब से काम करना हम सभी के लिए जरूरी है। परंतु बहुआयामी परिवर्तन के शुरू के दिनों में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसलिए इन दिनों में अपनी ताकत को पहचानने पर खास ध्यान देना पड़ता है।

आज की ताकत के अनुसार, हम अपना आज का लक्ष्य निर्धारित करेंगे

आज की ताकत के अनुसार, हम अपना आज का लक्ष्य निर्धारित करेंगे| इसी प्रकार से कल की ताकत के अनुसार, हम अपना कल का लक्ष्य निर्धारित करेंगे| यह क्रम चलता रहेगा| एक महीने बाद अपनी ताकत पहचानकर, हम अपना उस समय का लक्ष्य निर्धारित करेंगे| एक साल के बाद अपनी ताकत पहचानकर, हम अपना उस समय का लक्ष्य निर्धारित करेंगे| जैसे-जैसे हमारी ताकत बढ़ेगी, हमारा लक्ष्य भी आगे बढ़ेगा| बहुआयामी परिवर्तन की शुरुआत में, इस प्रकार का अनुभव आम तौर पर होता है|

अपनी ताकत जाने बिना गुजारा नहीं है

हम कितने घंटे रोज काम कर सकते हैं?

प्रधानमंत्री मोदी रोजाना अठारह घंटे काम करते हैं| कई दशकों से मोदी ने एक भी छुट्टी नहीं ली है| एक साधारण व्यक्ति के लिए तो रोजाना आठ घंटे काम करना भी मुश्किल होता है| क्या हम बता सकते हैं कि हम कितने घंटे रोज काम कर सकते हैं? क्या हम अपनी ताकत पहचानते हैं? अपनी ताकत बढ़ाना जरूरी हो सकता है, लेकिन अपनी ताकत पहचाने बिना गुजारा नहीं है|

आम जीवन से दो उदाहरण:

✓ मनोहर दिन में आठ घंटे काम पर जाता है। काम से लौटने के बाद, वह बच्चों के साथ कुछ समय बिताता है। तब तक बीना घर आ जाती है। दोनों मिलकर सब काम निबटाते। नौ बजे खाना खाकर मनोहर दस बजे तक सो जाता था. लेकिन वह सवेरे सात बजे से पहले नहीं उठता था। रविवार और छुट्टी के दिन, पूरे सप्ताह की थकान उतारने के लिये, वह दोपहर तक सोता था।

✓ गणेश सवेरे चार बजे उठता, फिर एक कप चाय पीकर अखबार बांटने के लिये निकल जाता, और आठ बजे तक लौटता था। फिर दस बजे ऑफिस के लिये निकलता, जहां से पांच बजे लौटता। वह एम-ए कर रहा था, इसलिए आठ बजे पढ़ने के लिए बैठ जाता था। वह ग्यारह बजे के पहले नहीं सो पाता था। रविवार के दिन भी उसे अखबार बांटने के लिए चार बजे उठना ही पड़ता था।

मनोहर और गणेश दोनों को ही अपनी-अपनी ताकत का पता है।

मनोहर और गणेश दोनों ही के जीवन में स्थिरता है। हम कह सकते हैं, गणेश के जीवन में अधिक स्थिरता है, क्योंकि वह छुट्टी के दिन भी बाकी दिन जितना ही काम करता है। साथ ही साथ हम यह भी कह सकते हैं, गणेश की काम करने की क्षमता अधिक है—क्योंकि गणेश केवल पांच घंटे सोता है, जबकि मनोहर नौ घंटे से कम नहीं सोता।

मनोहर और गणेश की ताकत भले ही अलग-अलग है, लेकिन उन दोनों को अपनी-अपनी ताकत का पता है। गणेश को पता है, वह पांच घंटे सोकर अपना काम चला सकता है—जबकि मनोहर के लिए नौ घंटे सोना जरूरी है। गणेश रोजाना पंद्रह से बीस किलोमीटर साइकिल चलाता है, जो मनोहर के लिये सम्भव नहीं है। दोनों को अपनी-अपनी ताकत का सही अनुमान है, और वे उस ताकत के अंदर ही काम करते हैं।

 

बहुआयामी परिवर्तन की शुरुआत में

अपनी ताकत पहचानना रस्सी पर चलने जैसा कठिन भी हो सकता है।

दो प्रकार के उदाहरण, हमें देखने को मिल सकते हैं:

हम बहुआयामी परिवर्तन की शुरुआत की बात कर रहे हैं| पहला चरण समाप्त हो चुका है, और हम दूसरे चरण के शुरू में हैं| अब हमें अपनी ताकत को पहचानना है| दो प्रकार के उदाहरण, हमें देखने को मिल सकते हैं:

  • अखिल की बहुत सारी लंबे समय की परेशानियां बहुआयामी परिवर्तन के द्वारा एकाएक दूर हो गई हैं, परंतु वह उत्साहित नहीं है। कुछ वर्ष पहले उसकी पत्नी चल बसी थी. बच्चे उससे अलग रहते हैं। अखिल की किसी से भी घनिष्ठता नहीं है. उसे अकेलापन सताता है, और उसे लगता है, मैं जीवन में कुछ भी क्यों करूं और किसके लिये करूं? उसे अभी भी लगता है, उसके पास कुछ भी करने की ताकत नहीं है।
  • सोनाली अभी-अभी बहुआयामी परिवर्तन के दूसरे चरण में पहुंच गई है। कुछ ही दिनों में उसकी लंबे समय से चलने वाली बहुत सारी परेशानियां दूर हो गई हैं—जैसे कि कब्ज की शिकायत, पैरों में दर्द, उदासी, चिड़चिड़ाहट, नींद न आना, और किसी काम को करने की इच्छा न होना। सोनाली डिप्रैशन के लिए गोलियां खा रही थी, जो एकाएक बंद हो गई हैं। ऑफिस और घर के काम में अब उसका मन लगता है। कुछ दिन पहले तक सोनाली को लगता था, वह कुछ भी नहीं कर सकती है। पर अब उसे लगने लगा है, वह सब कुछ कर सकती है। वह बहुत कुछ करना चाहती है, पर असलियत में सोनाली को अपनी ताकत का सही अंदाजा नहीं है।

सोनाली और अखिल दोनों को ही अपनी ताकत पहचानने की जरूरत है:

दस, बीस, तीस साल से — या उससे भी अधिक समय से — गंभीर समस्याओं से जूझ रहे लोग भी बहुआयामी परिवर्तन का लाभ उठाते हैं| लेकिन ऐसे व्यक्तियों में से कुछ के लिए, अपनी ताकत पहचानने का काम रस्सी पर चलने जैसा कठिन हो सकता है| लंबे समय से ऐसे लोगों ने केवल असामान्य स्थिति देखी है| सामान्य स्थिति से उनका परिचय नहीं है, और सामान्य व्यवहार उनके लिए संभव नहीं हो पाता है| वे जिस रास्ते पर चल रहे हैं, उस रास्ते से जरा सा भी हटने से डरते हैं| उन्हें विश्वास होना मुश्किल होता है कि वे कुछ बेहतर कर सकते हैं| अखिल इसका उदाहरण है|

अखिल के विपरीत, सोनाली अपनी अवस्था में आए सुधर से अति-उत्साहित है| लेकिन उसके पास अनुभव की कमी है| उत्साह में वह कुछ ऐसे कदम उठा सकती है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं| सोनाली की अपने पति से नहीं बनती थी| एक दिन उसने अपने पति से खूब झगड़ा किया, और उसे तलाक देने का फैसला कर लिया, लेकिन उसके माँ-पिता ने बीच बचाव करके दोनों में सुलह करवा दी|

सोनाली और अखिल दोनों को ही अपनी ताकत पहचानने की जरूरत है, और यह बेहद जरूरी है। कारण, बहुआयामी परिवर्तन के शुरू के दिनों में, एक बहुत बड़ा परिवर्तन एकाएक हमारे अंदर आता है। इतने बड़े परिवर्तन से हमारी ताकत बढ़ जाती है। इस बढ़ी हुई ताकत को ठीक से पहचानने की जरूरत होती है। बिना पहचाने यह ताकत किसी कम की नहीं है। कुछ अखिल जैसे लोग, इस ताकत को कम करके आंकते हैं। सोनाली जैसे लोग, इस ताकत को बढ़ाकर भी आंक सकते हैं।

अपनी ताकत पहचानना सीढ़ी चढ़ने जैसा आसान भी हो सकता है।

अगर हमारी परेशानी थोड़े समय की है| और उस परेशानी से पहले हमारा जीवन सामान्य था| ऐसी स्थिति में हमारे लिए अपनी ताकत पहचानने का काम बहुत आसान होगा| हमें केवल अपने पिछले जीवन को याद करना है, जब हमें कोई परेशानी नहीं थी| हमारे पास अपने पुराने अनुभवों का भी सहारा है| बहुत सारे काम हम तुरंत शुरू कर सकते हैं| जिससे हमारा आत्म-विश्वास बढ़ेगा| इसके बाद हम और भी काम हाथ में ले सकेंगे|

  • एक सड़क दुर्घटना में प्रीति की मृत्यु हो गई| उसके पति राजेश ने अपने आप को संभालने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुआ| वह उदास रहने लगा, जिससे उसकी नौकरी छूट गई| इसके बाद, उसने आत्म-हत्या करने की कोशिश की| बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के बाद, उसकी हालत में तेजी से सुधार आया| पुरानी नौकरी उसे वापस मिल गई, और प्रीति की मृत्यु होने के एक वर्ष बाद उसने दूसरी शादी भी कर ली|

एक ही व्यक्ति के चार वीडियो देखिए

बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के तुरंत बाद कितनी जल्दी-जल्दी बदलाव आते हैं?

कैलाश चन्द्र — बी एस सी, पी जी डी सी ए — एक प्राइवेट कंपनी में बतौर शिफ्ट इंचार्ज काम कर रहा था| बहुआयामी परिवर्तन अपनाते समय उसकी उम्र छत्तीस साल थी, और वह पंद्रह सालों से परेशान था| पैनिक अटैक्स, नींद की कमी, और उदासी को दूर करने के लिए वह डिप्रैशन की गोलियां कई वर्षों से ले रहा था| नीचे के वीडियो में वह अपने अकेलेपन, असामाजिक और हिंसक व्यवहार, एवं असंतोष के बारे में बता रहा है|

बहुआयामी परिवर्तन के बाद सभी मानसिक और शारीरिक लक्षण समाप्त हो गए| डिप्रैशन और नींद की गोलियां बंद हो गईं| उसकी तरक्की हुई और लोगों के साथ संबंध सुधरे| उसने एम बी ए में भी दाखिला ले लिया| यह सब तीन-चार महीने के अन्दर संभव हुआ|

हमारी जरूरतों की सीढ़ी या पिरैमिड?

क्या निचले धरातल की इच्छाएँ पूरी होने के बाद ही हम ऊपर जा सकते हैं?

पाश्चात्य विचारक मानते हैं कि हमारी इच्छाएँ सीढ़ी या पिरैमिड की तरह हैं| निचले धरातल की इच्छाएँ पूरी करना आसान है| ऊपरी धरातलों की इच्छाएँ पूरी करना मुश्किल है| ऊपरी धरातल की इच्छाएँ पूरी न होने पर हम अपना रुख निचले आसान धरातलों की ओर कर लेते हैं|यह एक तरह का कंपनसेशन यानी नुकसान भरपाई है| पढ़ाई में कमजोर एक युवक, इसी नुकसान भरपाई के लिए, कपड़ों की ओर या अपने दोस्तों की ओर अधिक ध्यान दे सकता है| नुकसान भरपाई हमें संतुलित के बदले स्वादिष्ट भोजन की ओर झुका सकती है| जिससे हम मोटे हो सकते हैं| बीमार भी हो सकते हैं|

क्या निचले पायदान पर असफल होने से हम ऊपरी पायदान का रुख कर सकेंगे?

एक विद्यार्थी जिसे खाने पीने की तंगी है, क्या वह इसकी भरपाई, पढ़ाई में मन लगाकर, और परीक्षा में प्रथम आकर कर सकता है? क्या एक गरीब व्यक्ति के सामाजिक संबंध मजबूत हो सकते हैं? क्या एक दिहाड़ी मजदूर की संतान कुछ बड़ा करने और बड़ा पाने में सफल हो सकती है? क्या एक गरीब किसान, खेती में प्रयोगों के द्वारा, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर सकता है? क्या एक अनाथाश्रम में पलने वाला बालक बड़ा उद्योगपति बन सकता है? क्या एक सामान्य कम पढ़ी-लिखी महिला एक उपन्यास लिखकर प्रसिद्धी पा सकती है?

पश्चिमी विचारधारा के अनुसार अगर निचले पायदान की इच्छाएँ पूरी न हों तो इन निचले पायदानों से जुड़ी इच्छाएँ और अधिक बढ़ जाती हैं| और हम निचले पायदानों की इच्छाएँ पूरी करने में ही फंसे रहते हैं| परन्तु बहुआयामी परिवर्तन के अनुसार, निचले धरातल की इच्छाएँ पूरी न हों तो भी हम ऊपरी धरातल की इच्छाओं की ओर अपना रुख करते हैं, और ऊपरी धरातल की इच्छाएँ पूरी करने में सफलता पा सकते हैं|

बहुआयामी परिवर्तन का गोला

अपनी जरूरतों को हम अपने अनुसार बदल सकते हैं

ऊपर हम बहुआयामी परिवर्तन का गोला देख रहे हैं| इस गोले के तीन हिस्से हमारी तीन प्रकार की इच्छाएँ, जरूरतें, या एक्टिविटीज को दिखाने के लिए हैं| एक हिस्से में (मान लेते हैं हरा) सोना, आराम करना, खाना-पीना, टीवी देखना, गप्पें मरना, घूमना-फिरना, सिगरेट और शराब का प्रयोग, और सेक्स - ये सब आ जाते हैं| दूसरे हिस्से में (मान लेते हैं लाल) पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की मजबूती के लिए अपने आप को ढालने का काम आता है| अगर हमें कोई रोग है, जैसे कि डाइबिटीज, उस रोग के अनुसार अपने आप को ढालने का काम आता है| अगर हम या हमारे परिवार में कोई दिव्यांग है, उसके अनुसार अपने आप को ढालने का काम आता है| मतलब सब तरह के एडजस्टमेंट इस हिस्से में आते हैं| बाकी बचे नीले हिस्से में आते हैं - पढ़ना-लिखना, पैसा कमाना और तरक्की करना| एक उद्योगपति अगर नया कारखाना लगाता है, तो यह उसके लिए तरक्की है| एक विद्यार्थी के लिए अगली कक्षा में जाना तरक्की होगी| एक साधारण व्यक्ति के लिए पगार बढ़ना तरक्की मानी जाएगी|

जरूरतों को गोले की शक्ल में देखने के लाभ

हमारी एक्टिविटीज, जरूरतों, या इच्छाओं को गोले के रूप में समझना तर्क और सिद्धांत की दृष्टि से बेहतर है| हम सारी जरूरतों या इच्छाओं को एक साथ पूरा नहीं कर सकते हैं| इसलिए हमें निर्धारित करना पड़ेगा - किन जरूरतों को हम पूरा करना चाहते हैं, और किनको टालना चाहते हैं? मतलब हम जरूरतों की प्राथमिकता निर्धारित करेंगे, और उसके अनुसार चलेंगे| हर व्यक्ति यही करने की कोशिश करता है, चाहे वह उसमें सफल हो सके या नहीं|

अब अपनी जरूरतों को इस तिरंगे गोले की शक्ल में देखते हैं| एक रंग से जुड़ी जरूरतें कम होंगी, तभी दूसरे रंग से जुड़ी जरूरतें पूरी करने की ओर हम अधिक ध्यान दे सकेंगे| उदाहरण के लिए हमारी नींद, आराम, और टीवी देखने की जरूरत कम हो सकती है, और इसके बदले हमारा ध्यान लोगों से मित्रता करने, शारीरिक व्यायाम, और लिखने-पढ़ने की ओर जा सकता है| बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के बाद, हम अनावश्यक को छोड़ने, और आवश्यक को अपनाने की कोशिश अधिक मजबूती के साथ करने लगते हैं|बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के बाद, हम अनावश्यक को छोड़ने, और आवश्यक को अपनाने में अधिक मजबूती और आत्म-विश्वास के साथ आगे बढ़ सकते हैं|

इस नई ताकत को जानने की जरूरत है

ऊपर के तिरंगे गोले को फिर से देखते हैं| बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के बाद, क्या अब हमें यह लग रहा है कि हम मनचाहे ढंग से इस गोले में बदलाव ला सकते हैं| क्या हम हरे हिस्से को कम कर पा रहे हैं, जिसमें सोना, आराम करना, खाना-पीना, टीवी देखना, गप्पें मरना, घूमना-फिरना, सिगरेट और शराब का प्रयोग, और सेक्स - ये सब आ जाते हैं? क्या हम लाल और नीले हिस्सों को बढ़ा पा रहे हैं? हमें अपने अन्दर आ रहे इस परिवर्तन को पहचानने और इस प्रक्रिया को तेज करने की जरूरत हो सकती है|

एक प्रकार की जरूरतों को कम कर पाना, और दूसरे प्रकार की जरूरतों को बढ़ा पाना, यही बहुआयामी परिवर्तन का आधार है| यही वह रणनीति है, जिसकी चर्चा, बहुआयामी परिवर्तन का परिचय, इस अध्याय में की गई है|

हमारी अलग-अलग तरह की ताकतें

सभी तरह की ताकतें जरूरी हैं।

अपनी ताकत को पहचानना मुश्किल हो सकता है| अगर हम इन ताकतों को कुछ हिस्सों में बाँट दें तो यह काम आसन हो जाएगा| इसी उद्देश्य को सामने रखकर हमारी ताकतों को बांटा गया है| हमारी अलग-अलग तरह की ताकतों को समझने और पहचानने की कोशिश करें। इन सभी ताकतों को बढ़ाया जा सकता है। और सफलता के लिए, हमें इन सभी ताकतों की जरूरत होती है।

भावनाओं की ताकत

यह हम सभी जानते हैं कि भावनाओं में ताकत होती है। हम बहुत सारे काम भावनाओं के वश में होकर करते हैं। गुस्से से हम इस संसार को हिलाकर रख सकते हैं। प्यार में लोग जान दे भी देते हैं और जान ले भी लेते हैं। हमें अनेक उदाहरण आम जिंदगी से मिलेंगे। माता-पिता अनेक कष्ट उठाकर बच्चों को पालते हैं। इंसान ही नहीं जानवरों में भी भावनाएं होती हैं।

भावनाओं की इस ताकत को काबू में रखना जरूरी है। यह ताकत हमारा नुकसान भी कर सकती है, और हमारे लिए लाभप्रद भी हो सकती है। यह उस आग की तरह है जिस पर हमारा खाना पकता है, परंतु वही आग हमें जला भी सकती है। इसीलिए भावनाओं पर नजर रखना और सही भावनाओं का चुनाव करना जरूरी है, जिसकी चर्चा आगे के अध्याय में की गई है: रोजमर्रा के जीवन में विचारों और भावनाओं का सही चुनाव

क्रोध, डर, और चिंता जैसी भावनाओं को काबू में रखने लिए भावनात्मक क्षमता जरूरी है। इसलिए भावनात्मक रूप से ताकतवर व्यक्ति शांत रहता है। जल्दी चिढ़ता नहीं है, गुस्सा नहीं करता है, और अपने काम से काम रखता है। ऊपर कैलाश का उदाहरण दिया गया है। जाहिर है कि कैलाश में भावनाओं की ताकत कम है।

सामाजिक संबंधों का धन

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। हम सभी समाज में अपने लिए एक स्थान बनाने की कोशिश करते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया है कि सामाजिक रूप से सशक्त व्यक्ति स्वस्थ रहता है और लम्बी उम्र पाता है। इसके विपरीत सामाजिक रूप से कमजोर व्यक्ति अनेक प्रकार की बीमारियों से पीड़ित हो सकता है। सामाजिक संबंधों को बढ़ाने के लिए, सामाजिक क्षमताएं जरूरी हैं।

अंकित का उदाहरण देखें। अंकित अमीर मां-बाप का बेटा है. और वह मानसिक रूप से सशक्त है, लेकिन उसका कोई मित्र नहीं है। क्या अंकित जैसा व्यक्ति जीवन में सफल हो सकता है?

  • अंकित का इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश हो गया। उसे होस्टल में रहना पड़ा। अंकित के पिता के पास धन की कोई कमी नहीं थी। अंकित के लिए, एक कार और ड्राइवर होस्टल में रख दिया गया। अंकित पढ़ाई में होशियार था, लेकिन बेहद घमंडी भी था। किसी से मित्रता करना, उसे पसंद नहीं था। एक दिन वह गाड़ी में बैठकर होस्टल से निकल ही रहा था, और तभी होस्टल का एक दूसरा लड़का स्कूटर पर जा रहा था। अंकित की गाड़ी ने उसकी स्कूटर को ठोस मार दी। लड़के को मामूली चोट आई, लेकिन अंकित ने ड्राइवर से चलते रहने के लिए कहा। इस घटना के बाद, होस्टल में सभी ने अंकित से बात करना बंद कर दिया। उनकी उपेक्षा अंकित सहन नहीं कर पाया, और वह पढ़ाई छोड़ने पर आमादा हो गया। लेकिन उसके पिता ने उसे दूसरों के सुख-दुख में साथ देने और सामाजिक संबंधों का महत्व समझाया| इसके बाद अंकित सबके साथ मिलकर रहने लगा|

शारीरिक क्षमता

शारीरिक क्षमता का अर्थ हम सब समझते हैं। एक मजदूर या सफाई कर्मचारी अपनी शारीरिक ताकत का प्रयोग करता है। हम घूमने जाते हैं, साइकिल चलाते हैं, या सीढ़ी चढ़ते हैं—इन सभी कामों में शारीरिक शक्ति का प्रयोग होता है। एक खिलाड़ी या एथलीट के लिए शारीरिक क्षमता का बड़ा महत्व है। खिलाड़ियों और एथलीटों को घंटों शारीरिक व्यायाम करना पड़ता है। हमें खिलाड़ियों की नकल करने की जरूरत नहीं है, लेकिन हमें भी रोजाना आधे-एक घंटे साइकिल चलाने, सैर करने, या हॉकी बैडमिंटन जैसा कोई खेल खेलने की जरूरत है—जिससे हमारा शरीर स्वस्थ रहे, हमारा स्टेमिना बना रहे, और हम बिना थके अपना काम कर सकें। आगे दिए गए ज्ञान के उदाहरण से हमें यही सबक मिलता है।

मानसिक क्षमता

मानसिक क्षमता का अर्थ भी हम समझते हैं। एक विद्यार्थी शिक्षक को मानसिक शक्ति की जरूरत होती है। हमें अपने जीवन में अनेक निर्णय लेने पड़ते हैं, जिसके लिए मानसिक शक्ति जरूरी है। आज की दुनिया में मानसिक क्षमता को विशेष महत्व दिया जाता है। हरेक माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़ाई में आगे रहें। मानसिक काम करने वालों को अधिक पगार दी जाती है। दिमागी ताकत बढ़ाने के लिए दूध में मिलाने वाले पाउडरों और दवाइयों के विज्ञापन हम देखते रहते हैं। जाहिर है खाने की चीजों और दवाइयों से मानसिक क्षमता नहीं बढ़ाई जा सकती है। इससे भी बड़ी बात है कि हमारी मानसिक क्षमता आम तौर पर ठीक-ठाक होती हैं। एक स्कूल में पढ़ने वाले निन्यानवे प्रतिशत से अधिक बच्चों की मानसिक क्षमता अच्छी होती है या उसे सुधारा जा सकता है। परन्तु बहुत से बच्चे स्कूली पढ़ाई में कमजोर होते हैं।

  • विजय गोरा-चिट्टा और लम्बे कद का लड़का था। हर किसी से उसकी दोस्ती हो जाती थी। वह हमेशा हंसता रहता था, और कभी किसी से नाराज नहीं होता था। सारे दिन काम करने के बाद भी वह नहीं थकता था। परंतु पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता था। दसवीं की परीक्षा सामने थी, लेकिन विजय पढ़ाई के प्रति उदासीन बना हुआ था। विजय के शिक्षक और माता-पिता समझते थे कि वह पढ़ाई में कमजोर है।

किसी भी संस्था या फैक्ट्री का उदाहरण, हम ले सकते हैं। वहां पर भी कुछ लोग मानसिक रूप से अधिक सशक्त होते हैं। मानसिक रूप से सशक्त लोगों के ऊपर संस्था के बारे में निर्णय लेने की जिम्मेदारी डाली जाती है। ऐसे लोग ही संस्था को दिशा दे सकते हैं और उसे आगे ले जा सकते हैं। कोई भी संस्था मानसिक रूप से सशक्त लोगों को अपनी ओर आकर्षित करना चाहती है। बड़ी-बड़ी कम्पनियों में ऊंचे पद पर बैठे लोग करोड़ों रुपयों में पगार पाते हैं।

इन सभी ताकतों को साथ-साथ बढ़ाना जरूरी हैं।

ऊपर दी गई सभी ताकतों को साथ-साथ बढ़ाना जरूरी है| इन अलग-अलग ताकतों को कैसे बढ़ाएंगे? इसका विवरण आगे के अध्याय में दिया गया है: अब हम भी एक-एक करके सफलता की सीढ़ियां चढ़ सकते हैं| बहुत से विद्यार्थी केवल पढ़ाई की ओर ध्यान देते हैं, और बाकी सब छोड़ देते हैं| इसके बहुत बुरे परिणाम देखने को मिल सकते हैं|

  • ज्ञान बारहवीं में पढ़ रहा था। उसकी इच्छा डॉक्टर बनने की थी। अच्छे मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए, प्रवेश परीक्षा में बहुत अच्छे अंक पाने की जरूरत थी। ज्ञान कॉलेज से आता, तो ट्यूशन चला जाता। ट्यूशन से लौट कर आता, तो फिर से पढ़ने बैठ जाता था। पढ़ने के अलावा, उसे और किसी बात का होश नहीं रहता था। उसके मित्र उसे क्रिकेट खेलने के लिए बुलाते, तो वह टाल देता था। मां खाने के लिए कहतीं, तो भूख नहीं है कह देता था। इतनी मेहनत के बाद भी, अर्धवार्षिक परीक्षा में, ज्ञान को कोई विशेष सफलता हाथ नहीं लगी। वह घर लौट कर आया और रोने लगा।
    माता-पिता ने ज्ञान को समझाया। वह अपनी ताकत से अधिक मेहनत कर रहा था। उसका स्वास्थ्य बिगड़ रहा था और स्मरण शक्ति कमजोर होती जा रही थी। उसके लिए ठीक से खाना, खेलना-कूदना, और दोस्तों के साथ कुछ समय बिताना जरूरी था। ज्ञान ने अपने को बदला। उसने साइकिल से कॉलेज जाना शुरू किया। हर रविवार को दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलना शुरू किया। अपना खाना और सोना नियमित किया। और अपनी छोटी बहिन को थोड़े समय के लिए पढ़ाना शुरू किया। ज्ञान का मन पढ़ाई में पहले से अधिक लगने लगा। उसने अच्छे अंक प्राप्त किए, और अच्छे मेडिकल कॉलेज में उसका प्रवेश हो गया।

अन्य सभी ताकतें—जैसे धन, संपत्ति, और प्रतिष्ठा

इसके ऊपर चार प्रकार की ताकतों का वर्णन किया गया है: भावनाओं की ताकत, सामाजिक संबंधों का धन, शारीरिक बल, और मानसिक क्षमता। अन्य सभी ताकतें, इन चार प्रकार की ताकतों के द्वारा प्राप्त की जा सकती हैं। धन, संपत्ति, और प्रतिष्ठा को भी इन चार ताकतों के द्वारा पाया जा सकता है, लेकिन धन और प्रतिष्ठा पाने में समय लग सकता है—इसलिए आज के समय में जिस व्यक्ति के पास धन और प्रतिष्ठा है, वह ताकतवर है।

भाग्य या दैवी शक्ति

कुछ लोग भाग्य या दैवी शक्ति में भी विश्वास करते हैं। इसीलिए कहावत है: खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान। लेकिन बहुआयामी परिवर्तन की यह मार्गदर्शिका हमें भाग्य या दैवी शक्ति में विश्वास करना नहीं सिखाती है—बल्कि यह सिखाने की कोशिश करती है कि कड़ी मेहनत और लगन के बल पर भाग्य को भी बदला जा सकता है।

ताकत को पहचानने के मार्ग में आने वाली कठिनाइयाँ

भाग्य या दैवी शक्ति में बहुत अधिक विश्वास

भाग्य या दैवी शक्ति में बहुत अधिक विश्वास अपनी ताकत को पहचानने के मार्ग में गंभीर समस्याएँ पैदा कर सकता है| हम सही रास्ते पर चलकर सफलता पाने के बदले पूजा-पाठ और धर्म-गुरुओं के चक्कर में पड़ सकते हैं| दैवी शक्ति ही हमें अपनी ताकत लगेगी तो बाकी कुछ करने की जरूरत कम हो जाएगी|

पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों को छोड़ देना जरूरी

पूर्वाग्रहों को छोड़ देना बहुत जरूरी है। यहां पूर्वाग्रह का अर्थ समझ लेना चाहिए। पूर्वाग्रह को अंग्रेजी में प्रीजुडिस कहते हैं। हम गोरी चमड़ी को सुंदरता का प्रतीक मान लेते हैं, या अंग्रेजी न जानने वाले को मूर्ख समझ लेते हैं। ये हमारे पूर्वाग्रह हैं। इसी प्रकार के और भी पूर्वाग्रह हो सकते हैं, जो बहुआयामी परिवर्तन के परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। पूर्वाग्रह के विपरीत दुराग्रही व्यक्ति जन-बूझकर गलत बात पर अड़ा रहता है|

हमारी ताकत भले ही बढ़ गई हो, पर हमारा सोचने का तरीका बदलने में कठिनाई हो सकती है — जैसा नीचे के उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगा।

  • सुदीक्षा को मधुमेह था। उसे रोजाना घूमने जाने की जरूरत थी—पर उसके पैरों में दर्द होता था, और उसे लगता था कि उसके पैरों की नसें कमजोर हो गई हैं। इसलिए वह घूमने न जाती थी। बहुआयामी परिवर्तन के बाद पैरों का दर्द ठीक हो गया, लेकिन उसकी भावना न गई कि उसके पैरों की नसें कमजोर हो गई हैं, और उसने घूमने जाना शुरू नहीं किया।
  • रामदास को लगता था, उसे सभी खट्टी चीजों से अलर्जी है। खट्टी चीज खाने के बाद उसे छींक आना या खांसी आना शुरू हो जाता था, या तो फिर उसका पेट गड़बड़ हो जाता था। बहुआयामी परिवर्तन के बाद उसकी ये सभी तकलीफें तो तुरंत दूर हो गईं, लेकिन उसका खट्टी चीजों का परहेज बंद होने में कई साल लगे। इसलिए कई सालों तक रामदास अपने स्वास्थ्य के बारे में चिंतित बना रहा।
  • प्रीति की आर्थिक स्थिति अच्छी न थी। वह छोटे-मोटे काम करके अपना पेट पालती थी। उसे दमा था, और इस बीमारी को काबू में रखने के लिए वह मुनक्का खाती थी। उसे किसी ने बता दिया था, मुनक्का खाना मत छोड़ना। यह एक महंगा इलाज साबित हो रहा था, लेकिन प्रीति इससे चिपकी हुई थी। बहुआयामी परिवर्तन के बाद दमा तो ठीक हो गया, लेकिन प्रीति का मुनक्का खाना न छूटा।

कम जरूरी या गैर-जरूरी कामों को छोड़कर ताकत का आकलन करें

कम जरूरी या गैर-जरूरी कामों को छोड़ दें। जो काम दूसरों से करवा सकते हैं, वह दूसरों के सुपुर्द कर दें। इस प्रकार से हमारा समय और शक्ति बचेंगे, और उसके बाद ही जरूरी काम के लिए हमारे पास कितनी शक्ति है इसका अनुमान लगाएँ|

सभी ताकतों में परिवर्तन का एक साथ आकलन जरूरी

बहुआयामी परिवर्तन के दौरान, हम मुख्य रूप से चार आयामों में परिवर्तन अनुभव कर सकते हैं—शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, और सामाजिक। हम आगे चलकर देखेंगे, ये सभी क्षमताएँ एक दूसरे पर निर्भर हैं। और सभी कामों को करने में एक से अधिक क्षमता की जरूरत होती है। इसलिए यह बंटवारा केवल सुविधा के लिए है।

अकसर कई प्रकार की क्षमताएं एक साथ प्रभावित होती हैं, और बहुआयामी परिवर्तन के दौरान सभी क्षमताओं में एक साथ सुधार होता है। हम बीना का उदाहरण पढ़ चुके हैं। यहां कुछ बातें दोहरा देते हैं: वह कमर-दर्द से परेशान थी। बहुआयामी परिवर्तन से उसका कमर-दर्द ठीक हुआ। इसके बाद, बीना को एक नहीं, कई क्षेत्रों में अपनी ताकत का अनुमान लगाना था। उसका घूमना-फिरना और साइकिल चलाना बढ़ा। साथ ही साथ, वह बच्चों पर कम गुस्सा करने लगी। उसे बच्चों को पढ़ाना आसान लगने लगा। और मित्रों और संबंधियों का उसके घर आना-जाना बढ़ गया।

बीना को कमर-दर्द केवल एक साल से था। उसे लगा, एक साल पहले वह जो करती थी, अब पुन: कर सकेगी। इस प्रकार से बीना के लिए अपनी ताकत का अनुमान लगाना आसान था। लेकिन कुछ लोगों के लिए यह काम मुश्किल भी हो सकता है। अधिक मुश्किल सामने आती है, जब परेशानियां बहुत सालों से लगातार चल रही हों—और हमें अपनी सामान्य अवस्था की याद ही न हो। तब हमें गुस्सा ‘न करना’ एक नई बात लगेगी। बच्चों को आराम से पढ़ा पाना एक नई बात लगेगी, और मित्रों का घर आना जाना भी एकाएक शुरू नहीं हो पाएगा। उदाहरण के लिए लम्बे डिप्रैशन से ठीक होने के बाद, अपनी सभी ताकतों में परिवर्तन का एक साथ अनुमान लगाना, बहुत मुश्किल हो सकता है।

जरूरतों में परिवर्तन का आकलन करने में चूक

इस तिरंगे गोले को हम देख चुके हैं| बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के बाद, हम अपनी जरूरतों में भारी परिवर्तन ला सकते हैं| एक रंग से जुड़ी जरूरतों को कम कर सकते हैं, और दूसरे रंग से जुड़ी जरूरतों को बढ़ा सकते हैं|जरूरतों में आए इस परिवर्तन का आकलन करने में हम चूक सकते हैं|

बहुआयामी परिवर्तन अपनाने में चूक

बहुआयामी परिवर्तन अपनाने में चूक हो सकती है, या और किसी कारण से एकाएक हमारी क्षमता फिर से कम हो सकती है। ऐसे में हमें यह परिवर्तन पुन: ठीक ढंग से अपनाना पड़ेगा।

✓ रमेश ने बहुआयामी परिवर्तन को अपनाया। उसे बहुत फायदा लग रहा था, लेकिन उसने सांस का व्यायाम, तनाव-मुक्ति का आसन, और यौन क्रियाओं पर नियंत्रण को छोड़ दिया। कुछ दिन के बाद उसकी बढ़ी हुई ताकत कम हो गई। उसे बहुआयामी परिवर्तन को ठीक से अपनाना पड़ा।

✓ मुक्ता और रमाकांत पति-पत्नी थे, पर वे अपने बीच के शारीरिक संबंधों की सीमा तय नहीं कर पा रहे थे। मुक्ता बहुआयामी परिवर्तन के दम पर डिप्रैशन से उबर रही थी, और वह शारीरिक संबंधों को महीने में एक-दो बार तक सीमित रखना चाहती थी—इससे उसे नींद ठीक आती थी, और डिप्रैशन की गोली खाने की जरूरत महसूस नहीं होती थी। रमाकांत चाहता था कि मुक्ता डिप्रैशन की गोली खाती रहे, जिससे उसे शारीरिक संबंधों को किसी सीमा में बांधना न पड़े। मुक्ता को गोलियों के साइड-इफैक्ट्स अनुभव होते थे, और वह गोलियों के बल पर जीना नहीं चाहती थी। पति-पत्नी के बीच कोई समझौता नहीं हो पा रहा था। मुक्ता अपनी ताकत का ठीक से अनुमान लगाना सम्भव नहीं हो रहा था।

अपनी क्षमताओं का निरंतर आकलन

बहुआयामी परिवर्तन की सफलता का अर्थ है, हमारी क्षमताओं में लगातार परिवर्तन होता रहेगा। और हमें निरंतर इन क्षमताओं का आकलन करते रहना पड़ेगा। बहुआयामी परिवर्तन के बिना भी हमारी क्षमता में निरंतर परिवर्तन होता रहता है, और हमें अपनी ताकत के बारे में अनुमान लगाना पड़ता है। पर यह प्रक्रिया बहुआयामी परिवर्तन के बाद कुछ अधिक तेज हो सकती है।

यह अध्याय बहुआयामी परिवर्तन के दूसरे चरण को विशेष रूप से ध्यान में रखते हुए लिखा गया है। इस बात को ध्यान में रखकर लिखा गया है कि हमारी क्षमता में एकाएक बड़ा परिवर्तन आया है। हमें इस बड़े परिवर्तन का भी आकलन करना पड़ेगा, और अपनी क्षमता में होने वाले छोटे-छोटे परिवर्तनों को भी जांचना पड़ेगा।

बहुआयामी परिवर्तन के बाद हम सोचें कि हम एक नए व्यक्ति बन गए हैं। इस प्रकार से पुरानी बहुत सारी बातें हमारे ऊपर लागू नहीं होती हैं। हम पुरानी तकलीफों को भूल चुके हैं, और एक नही शुरुआत करना चाहते हैं| इसलिए भी अपनी क्षमताओं का आकलन हमें नए सिरे से करना होगा।

इसके पहले के प्रयोगों में खतरा कम था

बहुआयामी परिवर्तन द्वारा बताए गए, इसके पहले के प्रयोगों में खतरा कम या नहीं के बराबर था| पहले चरण के दौरान हमने धीमा और नियंत्रित सांस, तनाव-मुक्ति का आसन, पैरासिटामौल का उपयोग, शारीरिक व्यायाम, सेक्स क्रियाओं पर पूर्ण नियंत्रण, और तम्बाकू का निषेध जैसे प्रयोग किए| इन प्रयोगों में खतरा नहीं के बराबर था| दूसरे चरण में अब तक, हमने पिछले जीवन से जुड़े दर्द को भूल जाना और स्थिरता आगे ले जाने के लिए, यौन क्रियाओं में बारीकी लाना — ये दो प्रयोग किए| इन दोनों प्रयोगों में भी, हमने कोई विशेष खतरा अनुभव नहीं किया होगा|

अब हमें खतरा उठाने की जरूरत हैं

असफल होने के बाद ही सफलता मिलती है

अब हमें अपनी ताकत को पहचानना है| ताकत को पहचानने के लिए ताकत का प्रयोग करना पड़ेगा| यह सच है कि हम असफल होने से डरते हैं, इसलिए प्रयास करना बंद कर देते हैं| लेकिन अब हमें डर को मन से निकाल देने की जरूरत होगी| ऊपर के उदाहरणों को फिर से देखें: सुदीक्षा को नसों की कमजोरी का डर मन से निकालकर सैर करना शुरू करना होगा| रामदास को खट्टी चीजों से अलर्जी का डर मन से निकालना होगा| प्रीति को मुनक्का खाना छोड़कर देखना होगा कि अस्थमा फिर से आता है या नहीं|

अब पहले जैसी तकलीफ हमें कभी नहीं होगी — यह सबक हम सीख चुके होंगे| अगर नहीं तो हमें पिछले जीवन से जुड़े दर्द को भूल जाना — इस अध्याय को दोहराने की जरूरत है| इसके बाद असफलता का डर हमारे मन से निकल जाना चाहिए| अब हम विफलता का सामना कर सकते हैं, और सफलता पा सकते हैं — हमें इस आगे आने वाले अध्याय को भी पढ़ने की जरूरत है, जिससे हम समझ सकेंगे कि 'असफल होने के बाद ही सफलता मिलती है' यह महज एक नारा नहीं है|

स्थिरता आगे ले जाने के लिए अपनी ताकत को पहचानना

यह अध्याय केवल अपनी ताकत को पहचानने की जरूरत के बारे में है| इस पहचान का उद्देश्य ताकत का प्रयोग हो सकता है, या फिर ताकत को बढ़ाना हो सकता है| लेकिन ताकत का इस्तेमाल और ताकत बढ़ाना अलग नहीं हैं, क्योंकि ताकत के इस्तेमाल से ताकत बढ़ती है| और ताकत का इस्तेमाल रोक दें तो ताकत घट जाती है| अलग-अलग तरह की ताकतों को बढ़ाने के बारे में अगले अध्यायों में बताया जा रहा है|

हमें एक-एक करके कदम बढ़ाना होगा| थोड़ा-थोड़ा खतरा उठाकर, अपनी ताकत को बढ़ाने के बारे में प्रयोग शुरू करने होंगे|





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