बहुआयामी परिवर्तन द्वारा तनाव का सामना

खतरों के खिलाफ हमारी प्रतिक्रया आदिमानव जैसी ही है, मानो हम अभी भी शेर का सामना कर रहे हैं|

इस परिशिष्ट में तनाव के बारे में और तनाव से मुकाबले के बारे में एक वैज्ञानिक सोच पैदा करने की कोशिश की जाएगी। हम जानेंगे कि तनाव क्या है और क्या नहीं है? हम जानेंगे कि आधुनिक मनुष्य तनाव से क्यों इतना अधिक प्रभावित है? हम जानेंगे कि जीवनशैली का तनाव से क्या संबंध है? हम जानेंगे कि सोच का तनाव से क्या संबंध है? हम जानेंगे कि हमारे सामाजिक स्थान का तनाव से क्या संबंध है? हम जानेंगे क्यों अलग-अलग लोग तनाव से अलग-अलग सीमा तक प्रभावित होते हैं? हम जानेंगे कि तनाव का सामना कैसे किया जा सकता है? हम जानेंगे—मैं टैंशन नहीं लेता हूँ—यह सोच बदलना क्यों जरूरी है? और क्यों बहुआयामी परिवर्तन तनाव का सामना करने का सबसे अच्छा उपाय है?

तनाव क्या है?

मान लीजिए हम जंगल में हैं, और शेर का एक झुंड आ जाता है—अब हमारे शरीर में जो भी परिवर्तन होंगे वही तनाव है। हमारा शरीर भागने या लड़ने के लिए तैयार होगा। शरीर के कुछ अंगों का काम बढ़ेगा, जैसे कि हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क, और मांसपेशियां। बाकी के अंगों का काम घट जाएगा, जैसे कि गुर्दे और आंतें। यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है—भागने और लड़ने के लिए गैरजरूरी अंगों का काम घटेगा, जिससे भागने और लड़ने के लिए जरूरी अंगों का काम बढ़ाया जा सके। घटना और बढ़ना दोनों साथ-साथ होंगे, और शरीर की इस प्रतिक्रिया को हम उत्तेजना कहेंगे। उत्तेजना की एक चरम सीमा आएगी, फिर शेर से बचाव हो जाएगा, और उसके बाद हमारा शरीर धीरे-धीरे सामान्य अवस्था में आ जाएगा। इस सामान्य अवस्था को हम ठहराव की स्थिति कहेंगे। जाहिर है कि उत्तेजना की स्थिति तेजी से पैदा होती है और चरम सीमा पर पहुंच जाती है, और उसके बाद ठहराव धीरे-धीरे आता है।

आधुनिक मानव के जीवन में तनाव

शेर का सामना आदिकालीन मानव करता होगा, आधुनिक मानव के खतरे बिल्कुल अलग हैं—जैसे कि ट्रैफिक जाम, प्रदूषण, भीड़भाड़, अकेलापन, गरीबी, रिश्तों में कड़वाहट, और धोखाधड़ी। यह भी समझ लें कि आदिकालीन मानव कभी-कभी ही खतरों से रूबरू होता होगा, लेकिन आधुनिक मानव चौबीस घंटे इन खतरों से घिरा रहता है। परंतु रोना इस बात का है कि आधुनिक खतरों का सामना भी हम उस लाखों साल पुराने तरीके से ही करते हैं—मतलब तनाव की शारीरिक प्रतिक्रिया नहीं बदली है। इन नए खतरों के मुकाबले के लिए भी हमारा शरीर उत्तेजित होता है, उत्तेजना चरम सीमा पर पहुंचती है, और जब खतरे का अहसास कम होने लगता है तो ठहराव की स्थिति धीरे-धीरे आती है।

लेकिन आधुनिक मानव के जीवन में ठहराव की स्थिति शायद आती ही नहीं है, क्योंकि एक के बाद दूसरा खतरा लगा ही रहता है। ठहराव की स्थिति न आ पाने के कारण, शरीर के कुछ अंग तेजी से काम करते रहते हैं, और बाकी अंग धीमी गति से काम करते रहते हैं। इसके कारण शरीर में टूट-फूट होती है, और तनाव के दुष्परिणाम होते हैं। ये दुष्परिणाम तेज होने वाले अंगों जैसे हृदय और फेफड़ों में भी होते हैं, और धीमे हो जाने वाले अंगों जैसे गुर्दों और आंतों में भी होते हैं। एक दोपहिया या चारपहिया वाहन की कल्पना करिए। वाहन को यदि बार-बार भगाएंगे और ब्रेक लगाएंगे, तो वाहन में टूट-फूट अधिक होगी। कुछ ऐसा ही आधुनिक मानव शरीर में भी हो रहा है।

करोड़ों वर्ष पुरानी यह शारीरिक प्रतिक्रिया बदलेगी नहीं

तनाव की इस शारीरिक प्रक्रिया (उत्तेजना, चरम सीमा, और फिर ठहराव) की शुरुआत लगभग चालीस करोड़ वर्ष पूर्व सागर की मछलियों के शरीर में हुई थी। तब से लेकर अब तक इस प्रतिक्रिया में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है। इसलिए निकट भविष्य में हमारे शरीर की यह प्रतिक्रिया बदलने की कोई संभावना नहीं है, और हमें इस प्रतिक्रिया के साथ ही जीना पड़ेगा। इसका मतलब है कि हमें कोई दूसरा ही रास्ता निकालना पड़ेगा। वह रास्ता केवल अपनी मानसिक सोच को बदलने का ही हो सकता है।

हमारी सोच का तनाव पर प्रभाव

कई प्रकार से, हमारी सोच तनाव की शारीरिक प्रतिक्रिया और तनाव के दुष्परिणामों को प्रभावित करती है। ये प्रभाव सकारात्मक भी हो सकते हैं, परंतु हम नकारात्मक प्रभाव डालने वाली सोच के बारे में अधिक जानकारी रखते हैं। नीचे के बिंदुओं में भी उसी की छाया दिखाई देती है।

सोच (विचारों) और भावनाओं के बीच गहरा संबंध है। खतरे का अहसास एक सोच है। चिंता, क्रोध, डर, और उदासी जैसी भावनाएं, हमारी इस सोच से पैदा होती हैं। ये भावनाएं ही हमारे शरीर में तनाव की शारीरिक प्रतिक्रिया की शुरुआत (उत्तेजना और चरम सीमा) करती हैं। जैसे-जैसे खतरे का विचार और उससे जुड़ी भावनाएं समाप्ति की ओर जाने लगती है, तनाव की शारीरिक प्रतिक्रिया का भी अंत (ठहराव) आने लगता है। जाहिर है कि सोच और तनाव की शारीरिक प्रतिक्रिया का चोली दामन का साथ है। लेकिन सोच को ही तनाव मान बैठना हमारी भूल है। यह भूल, मैं टैंशन नहीं लेता हूँ जैसे वाक्यों से, प्रकट होती है। यह दिखता है कि हम मुश्किलों का सामना करने के बदले, उनसे मुंह छिपाने की कोशिश कर रहे हैं|

हम क्या कर रहे हैं: मुश्किलों का सामना या फिर मुश्किलों से दूर भागना?

हम सभी यह भली-भांति जानते हैं कि सोच और भावनाएं तनाव की शारीरिक प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार हैं। इसलिए हम सोच के माध्यम से अपनी भावनाओं को बदलने की कोशिश करते हैं। आधुनिक मनुष्य के जीवन में, सोच और भावनाओं को बदलने की यह कोशिश कई रूप ले सकती है—जैसे कि तम्बाकू या दूसरे नशों का प्रयोग, कुछ मीठा कुछ नमकीन तला भुना स्वादिष्ट खाना, टीवी गेम्स और इंटरनेट, और बेहिसाब सैक्स। हम यह नहीं जानते हैं कि अच्छा लगने के लिए की गईं ये सारी कोशिशें तनाव रूपी आग में घी का ही काम करती हैं। मतलब हमारी सोच जीवनशैली को प्रभावित करती है, और जीवनशैली तनाव की प्रतिक्रिया को बढ़ाने का काम कर सकती है। तनाव से बचने के लिए हम क्या उपाय अपनाते हैं, इस पर ध्यान देना भी जरूरी है।

सामाजिक विषमता को दूर कर पाना मुश्किल है|

आधुनिक मानव समाज में समानता नहीं हैं। बहुत सारे लोग सबसे नीचे के पायदान पर हैं, और कुछ लोग बीच वाले और सबसे ऊपर के पायदानों पर खड़े हैं। तनाव के हमारे ऊपर होने वाले प्रभावों की मात्रा को हमारी सामाजिक स्थिति सीधे तौर पर निर्धारित करती है।

सामाजिक स्थिति के दस पायदान मान लीजिए। पहला पायदान सबसे ऊपर का है, और उस पायदान पर सबसे कम लोग हैं—इस पायदान के लोग तनाव के दुष्परिणामों से सबसे कम प्रभावित होंगे। दूसरे पायदान वाले, पहले पायदान वालों से अधिक प्रभावित होंगे, लेकिन वे तीसरे पायदान वालों से कम प्रभावित होंगे। तीसरे पायदान वाले दूसरे पायदान वालों से अधिक लेकिन चौथे पायदान वालों से कम प्रभावित होंगे। यह सिलसिला पायदान दर पायदान चलता जाएगा, और दसवें पायदान वाले ऊपर की सभी पायदान से अधिक प्रभावित होंगे।

अब मान लीजिए कि सभी दस पायदान वाले लोगों को भरपूर खाना, वस्त्र, रहने का स्थान, और एक जैसी मेडिकल सुविधाएं मिल रही हैं। क्या अब भी तनाव सामाजिक स्थिति के अनुसार पायदान दर पायदान हमें प्रभावित करेगा। जी हां, एक जैसी सुविधाएं होने पर भी तनाव सामाजिक स्थिति में ऊपर लोगों को कम प्रभावित करेगा, और यह सिलसिला चलता रहेगा। सामाजिक स्थिति हमारी सोच को प्रभावित करती है। और यह सिलसिला सोच से जुड़ा माना जाता है। इस सोच को हम बदल सकते हैं, और यही एकमात्र रास्ता है|

काबुल के गुरुद्वारा पर आतंकी हमला|

सूचना का बेतहाशा फैलाव रोक पाना मुश्किल है|

टीवी, मोबाइल फोन, और इंटरनेट द्वारा सूचना का बेतहाशा फैलाव—यह भी हमारी सोच को प्रभावित कर रहा है। किसी सुदूर देश में भूकंप आता है, आग लग जाती है, आत्मघाती टैरर अटैक होता है, या बाढ़ आ जाती है—इन सभी दुर्घटनाओं के विशद और सजीव चित्र हम अपने टीवी स्क्रीन पर देखते हैं। ये घटनाएं सीधे तौर पर हमें प्रभावित नहीं कर रही हैं, फिर भी हम सिहर जाते हैं। आज के युग में जिनके बारे में हम सोचते हैं, ऐसे बहुत सारे खतरे हमारे से सीधे तौर पर नहीं जुड़े हैं: हमारे बच्चों का क्या भविष्य होगा? टाइगर का क्या होगा? हमारे जंगलों का क्या होगा? ग्लेशियरों का क्या होगा? हम प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग के बारे में चिंतित हो जाते हैं। पृष्ठभूमि में पैदा होने वाली इन समस्याओं और उससे पैदा होने वाली सोच और भावनाओं का हमारे पास कोई समाधान नहीं है, फिर भी हम इनसे लगातार घिरे रहते हैं। संचार माध्यमों द्वारा किए जा रहे सूचना अतिक्रमण को रोक पाना संभव नहीं है। अपनी सोच को बदलकर हम संचार माध्यमों से दूरी बना सकते हैं और सूचना के अतिक्रमण से बच सकते हैं—और यही एकमात्र रास्ता है|

हमारी सोच बदलना जरूरी है|

हमारी खुद की, समाज की, और विश्व की समस्याओं के समाधान को लेकर हमारी क्या सोच है? एक व्यक्ति को डायबिटीज है, लेकिन वह इसका टैंशन नहीं लेता है और सब कुछ खाता है। एक और व्यक्ति को डायबिटीज है, और वह इसे नियंत्रित रखने के लिए सारी सावधानियां लेता है। प्रदूषण से निबटने के लिए, क्या हम अपने घर का सूखा और गीला कचड़ा अलग-अलग इकट्ठा करते हैं? ईंधन का प्रयोग कम करने के लिए और ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ जंग में भागीदारी करने के लिए क्या हम जहां तक हो सके दोपहिया वाहन या साइकिल का प्रयोग करते हैं, और विमान के बदले रेलगाड़ी से यात्रा करते हैं? जाहिर है कि हमारी सोच हमारी, समाज की, और विश्व की समस्याओं के समाधान से और तनाव की हमारी शारीरिक प्रक्रिया से जुड़ी हुई है।

कोरोना जैसे नए और वैश्विक खतरे, मानवजाति के लिए गंभीर संकट पैदा कर रहे हैं|

तनाव का सामना करने के लिए बहुआयामी परिवर्तन

ऊपर के विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि सोच बदलना और समस्याओं का सही तरीके से सामना करना ही तनाव से मुकाबले का सही उपाय है। नीचे के बिंदुओं से यह साफ हो जाएगा कि बहुआयामी परिवर्तन इन दिशाओं में आगे बढ़ने के लिए अपनाया जा सकने वाला सबसे सशक्त हथियार साबित हो सकता है।

  • बहुआयामी परिवर्तन स्थिरता पाने की लड़ाई है। अब जरा गहराई से सोचें—हमें स्थिरता और ठहराव एक समान लगेंगे। मतलब बहुआयामी परिवर्तन ठहराव पाने के लिए है। तनाव की शारीरिक प्रतिक्रिया की शुरुआत उत्तेजना से होती है, और इसका अंत ठहराव से होता है—इसलिए बहुआयामी परिवर्तन तनाव की शारीरिक प्रतिक्रिया का अंत करने की कोशिश करता है।
  • बहुआयामी परिवर्तन द्वारा हम जीवनशैली सुधार सकते हैं। अच्छी जीवनशैली तनाव के दुष्परिणामों से बचे रहने का बेहतर उपाय है।
  • बहुआयामी परिवर्तन चिंता, उदासी, और क्रोध जैसी भावनाओं और मानसिक बीमारियों पर नियंत्रण का अच्छा उपाय है।
  • बहुआयामी परिवर्तन द्वारा हम खुद पर बेहतर नियंत्रण रख सकते हैं, और संचार माध्यमों से हो रहे सूचना के अतिक्रमण से बच सकते हैं।
  • कोरोना जैसे नए और वैश्विक खतरे, मानवजाति के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर रहे हैं| कोरोना के संक्रमण से हर कोई प्रभावित हो सकता है, और इसके खिलाफ लड़ाई में हर किसी को योगदान देने की जरूरत है| बहुआयामी परिवर्तन एक बड़े स्तर पर ऐसे संकटों का सामना करने के लिए हमें तैयार कर सकता है|
  • तीसरे चरण के अध्यायों को देखें। बहुआयामी परिवर्तन द्वारा हम आगे बढ़ सकते हैं, विफलताओं को पार कर सकते हैं, और अपनी समाज की और विश्व की समस्याओं के समाधान का रास्ता निकाल सकते हैं। बहुआयामी परिवर्तन से हमारी सोच बदलती है। हम अपने जीवन में अधिक खुशी पा लेते हैं। अपने आप से, परिवार से, समाज से, विश्व से, और पूरे ब्रह्मांड से जुड़ने की कोशिश करते हैं।

 

 

बीमारियों का सामना करने के लिए तनाव की आग बुझाना जरूरी

खिचड़ी पकाने के लिए क्या-क्या सामग्री चाहिए? हमारा उत्तर होगा दाल, चावल, नमक, मिर्च, मसाले, तेल वगैरा-वगैरा|मगर एक चीज हम भूल जाएंगे, वह है आग| हमारे पास सब कुछ है, परन्तु आग नहीं है तो खिचड़ी नहीं पाक पाएगी| अब इसी को बीमारियों पर लागू करते हैं| तम्बाकू के प्रयोग से, शारीरिक व्यायाम न करने से, और तला-भुना मीठा नमकीन खाने से बीमारियाँ पैदा होती हैं| लेकिन यहाँ भी बीमारी तभी पैदा होगी जब तनाव रुपी आग मौजूद होगी| बिना तनाव की मौजूदगी के बीमारी पैदा होने की संभावना बहुत कम हो जाएगी| इसलिए किसी भी बीमारी का सामना करने के लिए तनाव की आग को बुझाना जरूरी है|आज के युग की बड़ी-बड़ी बीमारियों जैसे हृदयरोग, मधुमेह, कमर-दर्द, अस्थमा, और डिप्रैशन पर भी यही बात लागू होती है|





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