अब हम विफलता का सामना कर सकते हैं, और सफलता पा सकते हैं

एक भयानक दुर्घटना भी संदीप सिंह को लक्ष्य से डिगा नहीं सकी

विफलता का सामना करने के लिए हमें आशा और उम्मीद चाहिए, और अपने पर भरोसा होना चाहिए। जल्दी से निराश हो जाने वाले लोग, असफलता के कारणों को जानने का और उन्हें दूर करने का काम नहीं कर पाते हैं। उन्हें लगता है कि उनके अंदर कुछ कमी है, जिसे दूर कर पाना असंभव है, और उस कमी के चलते, उन्हें कभी सफलता नहीं मिलेगी। कई बार हम अपनी कमजोरी का विश्लेषण नहीं कर पाते हैं, और अपनी असफलताओं के लिए दूसरों को दोषी ठहराने लगते हैं। परिशिष्ट-एक में सुकेशी का उदाहरण देखिए।

इसके विपरीत, आशा रखने वाले लोग, असफलता मिलने पर नए सिरे से कोशिश करते हैं। वे बार-बार असफलता मिलने पर भी हार नहीं मानते हैं। उन्हें लगता है कि किसी काम में असफल होना कोई बड़ी बात नहीं है, और असफलता से घबराने की जरूरत नहीं है। असफलता ऐसे लोगों को अधिक मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है, जैसा कि संदीप सिंह ने किया।

संदीप 2004 में भारतीय हॉकी टीम में शामिल हुआ| वह सफलता के शिखर की ओर बढ़ रहा था — लेकिन 2006 में रेलवे सुरक्षा बल के एक जवान के हाथों से गोली चल गई, और गोली लगने के कारण संदीप के दोनों पैर लगभग बेकार हो गए| वह लगभग एक साल तक व्हीलचेयर पर रहा| उसका हॉकी खेलना असंभव माना जा रहा था| लेकिन संदीप हार मानने वालों में से नहीं था| वह उठ खड़ा हुआ| वर्ष 2009 में वह भारतीय हॉकी टीम का कप्तान चुना गया| उसने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की| और उसे अर्जुन पुरस्कार के अलावा और कई पुरस्कारों से नवाजा गया|

बिओंडी खराब फीडबैक से हतोत्साहित नहीं हुआ था

मार्क स्पिट्ज ने 1972 के ओलिम्पिक खेलों में तैराकी में सात में से सात स्वर्ण पदक लेकर एक विश्व कीर्तिमान बनाया था। बारह वर्ष के बाद, 1984 के मास्को ओलिम्पिक में मैट बिओंडी से भी यह उम्मीद की जा रही थी कि वह भी तैराकी प्रतियोगिताओं में सात के सात स्वर्ण पदक जीतेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और वह पहली प्रतियोगिता में कांस्य, और दूसरी में रजत पदक ही जीत पाया। सभी को लगा कि बिओंडी पहली दो असफलताओं से निराश हो जाएगा, और बाकी पांच प्रतियोगिताओं में कुछ अधिक नहीं कर पाएगा। परंतु बिओंडी ने बाद की पांचों प्रतियोगिताओं में एक के बाद एक स्वर्ण पदक हासिल करके सबको आश्चर्यचकित कर दिया।

परंतु बिओंडी की इस सफलता से, उसके कोच को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। ओलिम्पिक के कुछ दिन पहले, कोच ने सालिगमान के साथ मिलकर बिओंडी पर एक प्रयोग किया था। एक प्रतियोगिता के दौरान, बिओंडी का प्रदर्शन बहुत अच्छा था, परंतु उसे जानबूझकर खराब बताया गया। लेकिन बिओंडी इस खराब फीडबैक से हतोत्साहित नहीं हुआ, और कुछ मिनटों के बाद वह फिर पानी में कूदा और पिछले प्रदर्शन से भी अच्छा प्रदर्शन किया। यही प्रयोग कुछ दूसरे तैराकों के साथ दोहराया गया। इन दूसरे तैराकों में से अधिकतर खराब फीडबैक से हतोत्साहित हो गये, और उनका प्रदर्शन बिगड़ गया।

सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुंचने के लिए भी जरूरी हैं कि हम असफलता से निराश न हों। ऊपर के उदाहरण से यही बात निकल कर आती है। लेकिन आम जिंदगी पर भी यही बात लागू होती है। हममें से बहुत सारे लोग शिक्षक, विद्यार्थी, या अभिभावक होंगे, और हमने अनुभव किया होगा कि एक बार फेल हो जाने के बाद विद्यार्थी, अगली परीक्षा में कुछ बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं। फेल होने से पैदा हुई निराशा उनके ऊपर हावी हो जाती है। इस निराशा को अपने ऊपर हावी न होने देना, यह एक बहुत बड़ी विशेषता है। क्या हम इस अच्छाई को अपने अंदर पैदा कर सकते हैं?

अब हम सब भी असफलता का सामना कर सकते हैं

हम सबमें एक संदीप सिंह मौजूद है| हम सबमें एक मैट बिओंडी भी मौजूद है| हम सब भी संदीप सिंह और मैट बिओंडी जैसे ही हैं — या हम उन जैसे हो सकते हैं। बहुआयामी परिवर्तन अपनाने के बाद, अब हम सब भी असफलता का सामना कर सकते हैं|

प्रथम एम बी बी एस की परीक्षा में फेल हो गए कुछ विद्यार्थियों को बहुआयामी परिवर्तन की ट्रेनिंग दी गई। वे सभी एक ही मेडिकल कॉलेज से थे, और एक ही सत्र में फेल हुए थे। छ: महीने के बाद, वे सभी फिर से प्रथम एम बी बी एस की परीक्षा में बैठे, और अबकी बार सभी पास हो गए। परीक्षकों से इन विद्यार्थियों के दूसरी बार के प्रदर्शन के बारे में पूछा गया और पहली बार के प्रदर्शन से तुलना करने के लिए कहा गया। कुछ तथ्य सामने आए। पहली बार से दूसरी बार का प्रदर्शन अच्छा था, और सभी विद्यार्थी अपनी योग्यता के आधार पर पास हुए थे। सभी परीक्षक बहुत अनुभवी थे, और उनके अनुसार दूसरी बार परीक्षा में बैठने वाले कम ही विद्यार्थी अपने प्रदर्शन को बेहतर बना पाते थे।

बहुआयामी परिवर्तन हमारी मदद कैसे करता है?

आशा — सफलता का मनोवैज्ञानिक आधार

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि असफल लोगों की एक अलग समझ होती है—यानी असफल लोग मानते हैं कि उनमें कुछ कमजोरी है, जो सदैव उनके साथ रहने वाली है। यही कमजोरी उनकी विफलता का करण है, और इस कमजोरी को दूर कर पाना संभव नहीं है। इसके विपरीत सफल लोग यह मानते हैं कि वे विफलता का कारण को दूर कर सकते हैं, चाहे वह कुछ भी हो, और कितना भी बड़ा हो। मनोवैज्ञानिक इसी गुण को आशा कहते हैं| उनके अनुसार सफल लोग आशावान होते हैं, और असफल लोग जल्दी निराश हो जाते हैं।

बहुआयामी परिवर्तन आशा को जन्म देता है

एक स्थिर व्यक्ति असफलता के कारणों को जानने की कोशिश कर सकता है, और उन कारणों को दूर कर सकता है, जैसा कि ऊपर के चित्र में दिखाया गया है| हम एक नए लक्ष्य से प्रारंभ करते हैं| पूरी मेहनत और लगन से किए गए विश्लेषण, योजना, तैयारी, और क्रियान्वयन के बाद भी हम असफल हो सकते हैं| ऐसी हालत में आशा ही वह गुण है, जिसके कारण असफलता के कारणों की जाँच करने और फिर से प्रयत्न करने के लिए तैयार हो जाते हैं| और हम सफल होने तक प्रयत्न करते रह सकते हैं|

बहुआयामी परिवर्तन हमें स्थिरता देता है, और स्थिरता पाने के बाद हम विफलता से जुड़े दर्द को सहन कर पाने में समर्थ होते हैं। यानी विफलता के बाद भी हम अपनी स्थिरता बनाए रख पाते हैं, और फिर से प्रयत्न कर पाते हैं। हम सभी जानते हैं कि किसी भी काम में एक बार में सफलता नहीं मिलती है, और सफलता पाने के लिए बार-बार कोशिश करनी पड़ती है। स्थिर व्यक्ति ही विफल होने पर भी लगातार कोशिश कर सकता है। असफल व्यक्ति विफलता के दर्द को सहन कर पाने में असमर्थ होते हैं| विफलता का दर्द एक डर को जन्म देता है — असफल होने का डर — और इस डर के कारण फिर से प्रयत्न कर पाना मुश्किल हो जाता है|

बहुआयामी परिवर्तन अपनाकर हम पिछली विफलताओं से जुड़े दर्द को भूल सकते हैं| इस प्रकार से हम असफल होने के डर से छुटकारा पा सकते हैं, और बार-बार प्रयत्न कर सकते हैं|

बहुआयामी परिवर्तन हमें यथार्थवादी बनाता है

यह सच ही कि बहुआयामी परिवर्तन को अपनाने के बाद, हम स्थिरता पाते हैं, और बार-बार प्रयत्न करना सीखते हैं। इस प्रकार से निराशा और असफलता पर विजय पाते हैं। यह सच है कि बहुआयामी परिवर्तन आशा को जन्म देता है| लेकिन आशा से भी बढ़कर यह हमें यथार्थवादी बनाता| अंधी या बिना लगाम वाली आशा, निराशा से भी अधिक खतरनाक हो सकती है| यथार्थवादी होने का अर्थ है कि हम अपने लक्ष्य से हमेशा या कुछ समय के लिए पीछे हट  सकते हैं| और नए लक्ष्यों को अपना सकते हैं , जो यथार्थ के अधिक नजदीक हों|

ख़ुशी अपने माँ-पिता की इकलौती संतान थी| उसके पिता आई पी एस अधिकारी थे और अपनी बेटी को आई ए एस बनाना चाहते थे| कई बार कोशिश करने के बाद भी ख़ुशी सफल नहीं हुई| वह अपने पिता का निराश चेहरा नहीं देखना चाहती थी| उसने आत्महत्या की असफल कोशिश की| बहुआयामी परिवर्तन के बाद खुशी को लगा कि आई ए एस में असफल होना जीवन का अंत नहीं है| उसने कानून की पढ़ाई करने का तय किया|

इस नजरिए से देखें तो केवल एक किरण नहीं, बहुआयामी परिवर्तन को हम आशा का सूरज मान सकते हैं।





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